कांग्रेस के राज्यों में यूरिया, कोयला संकट का ये है असली कारण

मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस की नई सरकार बनते ही यूरिया संकट की खबरें आपने अखबारों में पढ़ी होंगी। कई जगहों पर लोगों को घंटों-घंटों यूरिया के लिए लाइन लगानी पड़ रही है। कई जगहों पर यूरिया के लिए किसानों के धरने-प्रदर्शन की भी खबरें सुनने को मिल रही हैं। बताया जा रहा है कि आने वाले कुछ दिनों में बिजली घरों में भी कोयले का संकट पैदा होने वाला है। खुद मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा है कि प्रदेश के थर्मल पावर स्टेशनों में एक से दो दिन का ही कोयला बचा है ऐसे में मध्य प्रदेश में बिजली संकट पैदा होने का भी खतरा है। हैरानी की बात यह है कि यूरिया और कोयला दोनों संकटों के लिए कांग्रेस केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहरा रही है। कांग्रेस नेता अहमद पटेल ने तो यहां तक कह डाला कि मोदी सरकार इन राज्यों की जनता से बदला ले रही है और यह संघीय ढांचे के खिलाफ है। जबकि केंद्रीय उर्वरक मंत्री सदानंद गौड़ा ने आंकड़े जारी करके साफ कर दिया है कि “मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में यूरिया की कोई कमी नहीं है, उनको मांग से ज्यादा यूरिया दिया गया है।”

संकट के पीछे असली कारण क्या?

एमपी, छत्तीसगढ़ और राजस्थान, तीनों ही राज्यों में यूरिया का सबसे अधिक संकट है। जबकि आसपास के ही दूसरे राज्यों में ऐसी कोई दिक्कत नहीं है। हमने इस बारे में इन दोनों ही राज्यों के कुछ जानकारों से बात की। एक बात जो सभी ने इशारा किया वो ये कि यूरिया के संकट के पीछे कोई और नहीं बल्कि दोनों राज्य सरकारें ही जिम्मेदार हैं। दावा किया जा रहा है कि केंद्र सरकार ने एमपी में सप्लाई होने वाला यूरिया दूसरे राज्यों में भेज दिया। लेकिन सप्लाई की प्रक्रिया को समझने वाले जानते हैं कि ऐसा संभव ही नहीं है। दरअसल सहकारी संस्थाओं जिनके जरिए यूरिया किसानों तक पहुंचाया जाता है वो कर्ज माफी की नई नीति से डरी हुई हैं। उन्हें लग रहा है कि जिन किसान क्रेडिट कार्ड पर वो यूरिया देंगे वो आगे चलकर उनके लिए गले की हड्डी बन सकता है। कांग्रेस की तीनों ही राज्य सरकारों ने अभी तक लोन माफी की अपनी नीति को साफ नहीं किया है और इसका एलान सिर्फ कागजों पर कर दिया। इससे पैदा भ्रम का नतीजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है।

कोयला संकट के पीछे असली वजह?

सीमेंट की तरह कोयला संकट के पीछे भी राज्य सरकार को ही वजह माना जा रहा है। कमलनाथ ने खुद ही कबूल किया कि राज्य में बस एक या दो दिन का कोयले का स्टॉक बचा है। इसके बाद बिजली उत्पादन रोकना पड़ सकता है। सवाल यह कि आखिर सारा कोयला अचानक खत्म हो गया। दरअसल कोयले का स्टॉक ज्यादा से ज्यादा हफ्ते भर का ही होता है। नई सरकार आने के बाद कोयले की खरीद पर ब्रेक लग गया क्योंकि फैसला लेने के लिए अभी तक कोई व्यवस्था नहीं बनाई गई है। मध्य प्रदेश सरकार ने इस कमी का ठीकरा केंद्र सरकार पर फोड़ कर कोयला खरीद में देरी शुरू कर दी। दरअसल कोयले की खरीद में भी कई तरह की कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार की गुंजाइश होती है। कई लोग दबी-जुबान में कह रहे हैं कि कमलनाथ सरकार कोयला संकट जानबूझकर खड़ा कर रही है। क्योंकि इसके आधार पर वो केंद्र सरकार पर आरोप लगा पाएंगे। लेकिन वो यह भूल जाते हैं कि अगर केंद्र सरकार कांग्रेस शासित बाकी राज्यों में कोयला संकट पैदा नहीं करवा रही है तो आखिर उसे सिर्फ मध्य प्रदेश से क्या दुश्मनी है। यह बात भी कही जा रही है कि लोकसभा चुनाव तक इन तीनों राज्यों को ही मोटी रकम ऊपरी कमाई के तौर पर हाईकमान को भेजनी है ताकि पार्टी लोकसभा चुनाव में जमकर पैसा खर्च कर सके। मौजूदा संकट का भी कहीं न कहीं इसी मानसिकता से लेना-देना है।

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