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कर्नाटक में 52 ‘गुलाम’ दलितों पर मौन क्यों हैं राहुल गांधी?

अनुसूचित जातियों और जनजातियों की सुरक्षा के लिए तमाम कड़े कानूनों के बावजूद आए दिन अत्याचार की दिल दहलाने वाली घटनाएं सुनने को मिलती रहती हैं। ताजा मामला कर्नाटक के हासन जिले में हुआ है। दलितों पर अत्याचार का ये एक ऐसा मामला है जिसकी किसी आजाद देश में कल्पना भी नहीं की जा सकती। यहां 52 दलितों और आदिवासियों को तीन साल तक गुलाम बनाकर रखा गया था। इनमें 16 महिलाएं और 4 बच्चे भी शामिल हैं। इन सभी को 16 दिसंबर रविवार के दिन छुड़ाया गया। गुलाम बनाकर रखे गए इन लोगों से ज्यादातर ईंट के भट्टों में काम करवाया जाता था। इसके अलावा उन्हें बिल्डिंगें बनाने के काम में भी लगाया जाता था। कहीं से भी लेबर की डिमांड होती थी तो ठेकेदार उन्हें फौरन ट्रैक्टर पर लादकर यहां-वहां ले जाया करता था। ये लोग इतने डरे हुए थे कि कहीं भी किसी से अपने आपबीती सुनाने की हिम्मत नहीं करते थे। इस मामले में कर्नाटक पुलिस की भूमिका शक के दायरे में है, क्योंकि स्थानीय लोगों का कहना है कि बिना पुलिस के संरक्षण के 52 लोगों को इस तरह बंधुआ बनाना संभव नहीं है। इस घटना को लेकर बेहद तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और कई केंद्रीय मंत्रियों ने न्याय की मांग करते हुए ट्वीट किए हैं। जबकि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अब तक चुप्पी साध रखी है।

क्या है ये पूरा मामला?

जो जानकारी सामने आई है उसके मुताबिक इन लोगों को पिछले तीन साल से बंधक बनाकर बेहद कम मजदूरी में काम करवाया जाता था। इन्हें वैसे रखा जाता था मानो वो कोई गुलाम हों। इनमें से ज्यादातर लोग दलित हैं जबकि बाकी अनुसूचित जनजातियों से संबंध रखते हैं। इन लोगों को गरीबी का फायदा उठाकर कर्नाटक के रायचूर, चिकमंगलुरू, तुमकुरु और चित्रदुर्ग जिलों से लाया गया था। कुछ लोग आंध्र और तेलंगाना के भी हैं। इन लोगों से रोज 19 घंटे काम कराया जाता था। अगर कोई विरोध करता था तो उसकी घोड़े के चाबुक से पिटाई की जाती थी। छुड़ाई गई लगभग सभी महिलाओं का बुरी तरह से यौन शोषण किया गया है। इन सभी लोगों को एक छोटे से टिन शेड में बेहद अमानवीय परिस्थितियों में रखा जाता था। इनमें से एक व्यक्ति किसी तरह 12 फीट ऊंची दीवार लांघकर भागने में कामयाब हो गया और उसी ने जाकर कुछ लोगों को अपनी आपबीती सुनाई, जिसके बाद पुलिस ने छापेमारी करके बाकी लोगों को छुड़ाया। इस मामले में अब तक 2 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। यह आरोप भी लग रहा है कि इस पूरे मामले के असली आरोपी को पुलिस बचाने की कोशिश में है। मामले में राजनीतिक संरक्षण की बातें भी सामने आ रही हैं।

जानवरों से बदतर जिंदगी

पीड़ितों में 62 वर्ष के बुजुर्ग से लेकर 6 साल की उम्र के बच्चे तक शामिल हैं। इन्हें मेहनताने के नाम पर सिर्फ तीन वक्त का खाना मिलता था। पुरुषों को कभी-कभी देसी शराब भी दी जाती थी। पुलिस ने मजदूरों को एक जगह से दूसरे जगह पर ले जाने में इस्तेमाल वाहन को भी सीज कर दिया है। रात के समय उन्हें जानवरों के बाड़े जैसी जगह पर बंद कर दिया जाता था। इस दौरान किसी को भी शौच या पेशाब के लिए भी बाहर जाने की छूट नहीं होती थी। शेड में एक पाइप लगी हुई थी जिसके जरिए रात में वो शौच या लघुशंका कर सकते थे। उनके लिए वैसे भी कोई अलग शौचालय नहीं था, बल्कि उन्हें अपने बाड़े के ही एक कोने में जानवरों की तरह नित्यक्रिया पूरी करनी होती थी। छुड़ाए गए लोगों से पूछताछ के आधार पर आरोपियों की पहचान हो गई है, हालांकि कर्नाटक पुलिस की ढिलाई के चलते ज्यादातर भागने में कामयाब हो गए।

हैरानी की बात है कि आजाद देश में इतनी भयानक घटना मीडिया की सुर्खियों से गायब है। माना जा रहा है कि मामला कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार से जुड़ा होने के कारण कई अखबार और चैनल इस खबर को दबाने की भी कोशिश में हैं। शनिवार को बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह समेत कई बड़े नेताओं ने इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी। यह सवाल भी उठ रहे हैं कि दलितों की हितैषी बनने का दावा करने वाली कांग्रेस अपने ही राज्य में दलितों को क्यों नहीं बचा पा रही है? कई बड़े नेताओं और आम लोगों ने यह सवाल सोशल मीडिया के जरिए उठाया भी है, लेकिन कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस घटना पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

अमित शाह ने अपने ट्वीट में लिखा है कि कांग्रेस के राज में दलितों और आदिवासियों को गुलाम बनाया जा रहा है और कांग्रेस-जेडीयू गठबंधन कैबिनेट विस्तार में व्यस्त है। उन्होंने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को मौके पर जाकर पीड़ितों की मदद करने को भी कहा है।

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