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बच्चों के दिमाग पर बुरा असर डाल रहा है सैंटा क्लॉज

अक्सर हम छोटे बच्चों को बताते हैं कि सैंटा क्लॉज़ वाकई होता है और वही उनके लिए क्रिसमस पर तोहफे लेकर आता है। लेकिन ऐसा करके आप अपने बच्चों की दिमागी सेहत के साथ खिलावाड़ कर रहे होते हैं। बच्चों के मनोविज्ञान पर सैंटा क्लॉज का बेहद बुरा असर पड़ता है। ब्रिटेन के प्रोफेशनल डॉक्टर्स के एसोसिएशन- रॉयल कॉलेज ऑफ जनरल प्रैक्टिशनर्स ने इस बारे में बाकायदा एक एडवाइजरी जारी की है। इसमें कहा गया है कि सैंटा क्लॉज बच्चों के मानसिक स्वास्थ पर बहुत बुरा असर डाल रहा है। डॉक्टरों की इस टीम ने एक सर्वे किया जिसमें उन बच्चों की मानसिक जांच की गई जिनको भरोसा था कि सैंटा क्लॉज सच में होता है। पाया गया कि ऐसे बच्चे अक्सर डरपोक और मतलबी होते हैं। वो दूसरों के साथ अपनी चीजें शेयर नहीं करते। दूसरी तरफ जिन बच्चों को शुरू से बताया गया कि सैंटा क्लॉज काल्पनिक होता है वो ज्यादा व्यावहारिक पाए गए। ऐसे बच्चों में मानसिक विकास सामान्य पाया गया। इस स्टडी को मेडिकल साइंस की मशहूर पत्रिका ‘लैंसेट’ में भी पब्लिश किया गया है।

बच्चों में आता है अनजान डर

स्टडी में बताया गया है कि “जिस तरह से भूत-प्रेत का डर बच्चों में अनजान व्यक्ति का डर डाल देता है ठीक वही असर सैंटा क्लॉज के साथ भी पाया गया।” सैंटा क्लॉज को सही मानने वाले ज्यादातर बच्चे मानते थे कि आधी रात के समय कोई भी उनके घर में घुस सकता है। इसका असर बच्चों की नींद पर पड़ता है। बच्चों को बताया जाता है कि अगर उनसे सैंटा क्लॉज खुश हुआ तो अच्छे तोहफे देगा और अगर खुश नहीं हुआ तो अच्छे तोहफे नहीं देगा। इसका असर ये होता है कि बच्चे बड़ों से अपनी बातें छिपाना शुरू कर देते हैं। उन्हें लगता है कि ऐसी कोई बात दूसरों को न पता चलने पाए जिससे सैंटा क्लॉज नाराज हो जाए। जब 8-9 साल होते-होते बच्चों को सच्चाई का पता चलता है कि सैंटा क्लॉज नहीं होता तो उनका अपने मां-बाप पर से भरोसा कम हो जाता है। फिर वो उनकी बातों को गंभीरता से लेना बंद कर देते हैं। अक्सर यही वो पहला मौका होता है जब बच्चे को पता चलता है कि मम्मी-पापा भी झूठ बोल सकते हैं। स्टडी में कई विशेषज्ञों ने माना है कि मज़ाक-मज़ाक में होने वाली ऐसी बातें बच्चों के दिमाग पर वो छाप छोड़ जाती हैं जिनका असर उन पर कई दशक तक बना रहता है।

सैंटा का सच बच्चों को बताएं

स्टडी से जुड़े मशहूर मनोवज्ञानिक क्रिस्टोफर बॉयल कहते हैं कि “आखिर आप अपने बच्चों से सैंटा का झूठ बोलते ही क्यों हैं? सैंटा सर्कस के जोकर की तरह है और उसे इससे ज्यादा महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। अगर आप उसे जीवित प्राणी बताएंगे तो बच्चों में उसे लेकर एक ऐसा लगाव पैदा हो सकता है जो आखिरकार मां-बाप पर भारी पड़ सकता है।” डॉक्टर क्रिस्टोफर के मुताबिक सैंटा क्लॉज ही नहीं, मैजिक के बारे में भी बच्चों को सच ही बताना चाहिए। यह सोचना गलत है कि अगर सच्चाई बता देंगे तो वो उसका पूरा मज़ा नहीं ले पाएंगे। बच्चों के मनोविज्ञान पर रिचर्ड डॉकिन्स की चर्चित किताब ‘द गॉड डेल्यूज़न’ (The God Delusion) में भी कहा गया है कि सैंटा क्लाज़ या परियों की कहानियां बच्चों की रचनात्मकता यानी क्रिएटिविटी पर बुरा असर डालती हैं। इस किताब में सलाह दी गई है कि छोटे बच्चों को कभी भी किसी नकली पात्र या नकली दुनिया को असली कहकर पेश नहीं करना चाहिए। क्योंकि इससे वो अपने वास्तविक परिवेश को बुरा समझ सकते हैं। अगर ऐसी स्थिति ज्यादा समय तक रहती है तो ऐसे बच्चे असली दुनिया से नफरत करना शुरू कर देते हैं। उन्हें लगता है कि वो अपने मां-बाप के बीच फंस गए हैं और उन्हें उस काल्पनिक दुनिया में जाना चाहिए जो ज्यादा सुंदर है।

स्टडी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू

इस अध्ययन में कुछ ऐसे मां-बाप और उनके बच्चों को भी शामिल किया गया था, जिनमें से किसी एक ने बच्चे को सैंटा की सच्चाई बता दी थी, जबकि दूसरा उनसे यह कहता रहा कि सैंटा वाकई में होता है और उसी ने क्रिसमस की रात तुम्हें तोहफे दिए हैं। पाया गया कि ऐसे बच्चे अपने उस मां या बाप पर ज्यादा भरोसा करते हैं जिन्होंने उसे सैंटा क्लॉज की सच्चाई समय रहते बता दी थी। जबकि सैंटा का झूठ बोलते रहने वाले मां या बाप के लिए उनके मन में सम्मान कम हो चुका था। जैसे कि मां ने समय रहते बच्चे को बता दिया कि सैंटा कुछ नहीं होता है तो बच्चे को पिता के मुकाबले मां पर ज्यादा भरोसा रहता है। उसका ये भरोसा तब तक कायम रहता है जब तक कि कोई दूसरी बड़ी घटना न हो जाए।

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