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जानिए मोदी पर जासूसी के आरोपों की सच्चाई क्या है

राफेल विवाद पर बुरी तरह से नाकाम रहने के बाद कांग्रेस के हाथ एक नया मुद्दा मिल गया है। उनका आरोप है कि मोदी सरकार लोगों की जासूसी करवा रही है। क्या वाकई ये आरोप सच है? या इसके पीछे भी राफेल वाली ही राजनीति है? इस रिपोर्ट में हम इसी बात को आसान भाषा में समझाएंगे। सबसे पहले हम आपको बता दें कि दुनिया की हर सरकार की एजेंसियां अपने नागरिकों की गतिविधियों पर नज़र रखती रही हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि किसी तरह के खतरे से बचाव किया जा सके। अपराधी और आतंकवादी हमेशा आम लोगों के बीच में ही छिपकर रहते हैं। पहले सरकारें लोगों के फोन कॉल पर नजर रखती थीं, लेकिन कंप्यूटर, मोबाइल जैसे उपकरण आने के बाद से ये काम बेहद जटिल हो गया है। इसी को देखते हुए मोदी सरकार ने 10 केंद्रीय जांच एजेंसियों को किसी संदिग्ध व्यक्ति के कंप्यूटर की निगरानी (Surveillance) का अधिकार दिया है। अभी तक इसके बिना जांच एजेंसियों को कोर्ट में अपराध साबित करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था।

विपक्ष के आरोपों में कितना दम?

आपको याद होगा कि कुछ समय पहले आधार को लेकर भी विपक्ष ने कुछ ऐसे ही आरोप लगाए थे। तब कांग्रेस ने यहां तक कह दिया था कि मोदी सरकार आधार डेटा का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ जासूसी और ताकझांक (snooping) के लिए कर सकती है। ये मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। लंबी जिरह और जांच-पड़ताल के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन आरोपों को खारिज कर दिया कि आधार नंबर से किसी की जासूसी की जा सकती है। कोर्ट ने आधार पर रोक लगाने से भी यह कहते हुए इनकार कर दिया कि किसी भी स्वतंत्र देश में ऐसी व्यवस्था जरूरी है और इससे भ्रष्टाचार को रोकने में मदद मिलती है। दरअसल यही कांग्रेस की समस्या भी है। उसे लग रहा है कि मोदी सरकार ने जिस तरह से आधार को लागू किया है उससे सब्सिडी और दूसरे सरकारी कार्यक्रमों में होने वाली लूट पर लगाम लग गई है।

निगरानी का असल मकसद क्या है?

सरकारी आदेश में साफ है कि उन्हीं लोगों की जांच की जा सकती है जिनकी देश-विरोधी गतिविधियों के पक्के सुराग मिले हों। यानी किसी भी आम व्यक्ति की निगरानी नहीं की जा सकती। अगर की गई तो ये गैर-कानूनी होगा। कोई एजेंसी चाहे तो अभी भी ये काम कर सकती है और अभी भी ये गैर-कानूनी ही होता है। निगरानी से मिली जानकारियां सिर्फ उन मामलों में ही सामने आएंगी, जिनमें राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला हो। याद रहे इस बात को कोर्ट में साबित भी करना होगा। आपको याद होगा कि मनमोहन सरकार के समय जांच एजेंसियों ने नीरा राडिया नाम की कॉरपोरेट दलाल की तमाम लोगों से फोन पर बातचीत को रिकॉर्ड किया था। वो रिकॉर्डिंग भी गैर-कानूनी तरीके से ही की गई थी और उस समय मनमोहन सिंह की सरकार हुआ करती थी।

इस आदेश पर क्या कहता है कानून?

दरअसल सरकार ने निगरानी का ये आदेश कानून के तहत कही गई बात को लागू करने के लिए ही जारी किया है। इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट 2000 के अनुच्छेद 69 के तहत केंद्र और राज्य सरकारों को ये अधिकार है कि वो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी होने पर किसी सूचना को इंटरसेप्ट और डीक्रिप्ट करने का आदेश दे सकती हैं। 2009 में मनमोहन सिंह सरकार ही Information Technology (Procedure and Safeguards for Interception, Monitoring and Decryption of Information) Rules लेकर आई थी। इसमें साफ-साफ कहा गया है कि बिना पूरी वैधानिक अनुमति के किसी की निगरानी नहीं की जा सकती है। लेकिन कांग्रेस के बनाए उस कानून में यह नहीं बताया गया कि है कि वो कौन सी एजेंसियां हैं जिनको निगरानी का वैधानिक अधिकार होगा। मोदी सरकार ने अपने ताजा आदेश में इस बात का भी ध्यान रखा और उन 10 सरकारी एजेंसियों के नाम साफ-साफ लिख दिए, जिनके पास निगरानी के अधिकार होंगे। यानी कोई मामला सामने आने पर साफ-साफ पता होगा कि किसने कहने पर निगरानी की गई। ये एजेंसियां हैं:

1. इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी)
2. नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो
3. एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ईडी)
4. सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज़ (सीबीडीटी)
5. डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलीजेंस (डीआरआई)
6. सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई)
7. नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए)
8. रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ)
9. डायरेक्टरेट ऑफ सिग्नल इंटेलीजेंस (सिर्फ जम्मू कश्मीर, नॉर्थ-ईस्ट और असम के लिए)
10. पुलिस कमिश्नर (दिल्ली पुलिस)

आम लोगों के लिए अच्छी खबर

सभी जानते हैं कि जांच एजेंसियां अभी भी संदिग्ध लोगों की निगरानी करती हैं। लेकिन अभी ये काम गैर-कानूनी तरीके से होता है। इस बारे में दिशानिर्देश साफ न होने का नतीजा है कि निगरानी के तरीकों का दुरुपयोग भी होता है। कोई एजेंसी अगर गैर-कानूनी तरीके से किसी आम व्यक्ति की निगरानी करती है तो उन अधिकारियों को इसके लिए दंडित किया जा सकेगा।

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