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तो चीन के कहने पर राफेल का दाम पूछ रहे थे राहुल!

राहुल और चीन के राजदूत की मुलाकात की तस्वीर।

राफेल लड़ाकू विमान सौदे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राहुल गांधी को करारा झटका लगा है। इस फैसले ने उनकी राजनीतिक गंभीरता पर एक बार फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं। इस मामले में शुरू से ही चीन का एंगल सामने आ रहा था। राजनीतिक गलियारों में कई लोग शक जता रहे थे कि इस आरोप-प्रत्यारोप के पीछे चाइनीज कनेक्शन है। इस सिलसिले की शुरुआत 2017 के जुलाई में हुआ था। जब राहुल गांधी चोरी-चुपके दिल्ली में चीन के दूतावास में गए थे। दरअसल यही वो समय था जब राफेल लड़ाकू विमान सौदे पर अमल के लिए भारत और फ्रांस के अधिकारियों की बैठकों का दौर चल रहा था। हालांकि पीएम मोदी ने सितंबर 2016 में ही इस डील पर दस्तखत कर दिए थे। मोदी के आने से पहले कांग्रेस सरकार इस सौदे पर काम कर चुकी थी। तब ये सौदा कमीशनखोरी के चक्कर में ही अटक गया था। मोदी ने आने के बाद बड़ी आसानी से सौदा पूरा कर लिया। ऐसे में कांग्रेस के कुछ दिग्गज नेताओं को लगा कि जरूर कमीशनखोरी हुई होगी। राहुल के आरोपों के पीछे चीन का हाथ होने की तरफ बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी इशारा किया था। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी को अपनी जानकारी के स्त्रोत के बारे में देश को बताना चाहिए। हालांकि मीडिया ने इस बात को लगभग दबा दिया।एक अपील: कृपया पोस्ट को कॉपी न करें, लिंक शेयर करें

चीन दूतावास जाने का राफेल कनेक्शन

बीजेपी के एक रणनीतिकार ने न्यूज़लूज़ को बताया कि कांग्रेस को कुछ समय राफेल सौदे के बारीकी से अध्ययन में लग गए। उन्हें इस बात पर भरोसा नहीं हो रहा था कि इतना बड़ा कोई हथियार सौदा बिना बिचौलियों की मदद के हो सकता है। मोदी सरकार के खिलाफ मुद्दे की तलाश में जुटे राहुल गांधी को इसी दौरान बताया गया कि अगर वो राफेल सौदे का दाम सरकार से पूछेंगे तो इसके अंदर का घोटाला सामने आ जाएगा। कांग्रेस के अलावा इस सौदे में चीन को भी बहुत दिलचस्पी रही है। क्योंकि राफेल वो विमान है जिससे भारतीय वायुसेना सीमा के अंदर रहते हुए चीनी ठिकानों पर हमला कर सकती है। चीन नहीं चाहता था कि भारत ऐसा कोई विमान खरीद सके। चीन हमेशा से चाहता है कि भारत रूस में बने सुखोई विमान ही खरीदे क्योंकि वो ऊंचाई वाली जगहों पर युद्ध की स्थिति में उड़ान नहीं भर सकते। सुखोई विमान पाकिस्तान के खिलाफ तो काम आ सकते हैं, लेकिन चीन के खिलाफ उनका इस्तेमाल काफी हद तक सीमित है। जुलाई 2017 में राहुल जब चीन दूतावास में गए तो उनके साथ उनके करीबी आनंद शर्मा भी थे जो आर्थिक और रक्षा से जुड़े मामलों की तकनीकी समझ रखते हैं। सूत्रों के मुताबिक इस मुलाकात में चीन के राजदूत ने उन्हें बताया कि राफेल सौदे में घोटाला हुआ है और उन्हें विपक्ष का नेता होने के नाते यह मुद्दा उठाना चाहिए। चीनी राजदूत ने कुछ आंकड़े और दस्तावेज भी राहुल गांधी को दिए। चीन को उम्मीद थी कि राजनीतिक विवाद पैदा हुआ तो राफेल सौदा लटक जाएगा। राहुल और चीन के राजदूत की ये मुलाकात हमेशा छिपी ही रहती, अगर चीन दूतावास के एक कर्मचारी ने गलती से इसकी एक तस्वीर वेबसाइट पर जारी न कर दी होती। जब ये मामला सामने आया था तो कांग्रेस पार्टी ने पहले साफ झूठ बोल दिया था कि ऐसी कोई मुलाकात हुई ही नहीं, लेकिन जब तस्वीर सामने आ गई तो उन्हें सच कबूलना पड़ा। हालांकि तब उन्होंने ये कहकर पल्ला झाड़ लिया था कि वो डोकलाम के मुद्दे पर जानकारी लेने चीन दूतावास गए थे। तब डोकलाम का विवाद चल रहा था, लिहाजा सबने उनकी बात पर यकीन भी कर लिया। हालांकि बीजेपी यह सवाल पूछती रही है कि डोकलाम में भी ऐसी क्या जानकारी थी जो राहुल गांधी अपनी सरकार से न पूछकर चीन के राजदूत से ले रहे थे?यह भी पढ़ें: राफेल सौदे से जुड़े ये तथ्य आपको जरूर जानने चाहिए

साजिश में पत्रकारों को किया शामिल

इसके बाद ही कांग्रेस के नेताओं की एक टीम ने राफेल सौदे को घोटाला साबित करने पर काम शुरू कर दिया। उन्हें पता था कि चीन से मिले दस्तावेजों में दम नहीं है और चीन की असली नीयत क्या है। लेकिन मोदी सरकार के खिलाफ एक मुद्दे की तलाश ने उन्हें कुछ भी और सोचने से रोक दिया। इसके बाद इस साल जुलाई में कांग्रेस के लिए काम करने वाले एक पत्रकार ने लेख लिखा कि राफेल सौदे में घोटाला बोफोर्स से भी बड़ा है। यह लेख भी चीन के दूतावास ने प्रायोजित किया था। वह पत्रकार बीते 3-4 साल में कई बार चीन भी जा चुका है। अखबार की इस रिपोर्ट के बाद 4 अगस्त 2018 को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में फैसला लिया गया कि राफेल सौदे को मोदी सरकार के खिलाफ चुनावी हथियार बनाया जाएगा। राहुल गांधी को निजी तौर पर यह मुद्दा बहुत पसंद था क्योंकि 1989 के लोकसभा चुनाव में बोफोर्स मुद्दे ने कांग्रेस की सीटें आधी कर दी थीं। राहुल चाहते थे कि उसी तर्ज पर मोदी सरकार को राफेल घोटाले में लपेट दिया जाए। यह भी पढ़ें: राफेल सौदे से मोदी सरकार ने बचाए 56,000 करोड़ रुपये

नाराज हथियार सौदागरों की भी भूमिका

मोदी सरकार आने के बाद से जितने भी हथियार सौदे हुए हैं वो सभी बेहद पारदर्शी माने जाते हैं। इसके अलावा मेक इन इंडिया स्कीम के तहत कई हथियार भारत में ही बनने लगे हैं। इससे बेहद मजबूत बिचौलियों की लॉबी का काम-धंधा छिन गया है। 2014 से पहले ये बिचौलिए बिल्कुल स्वाभाविक रूप से हर हथियार सौदे में शामिल होते थे। जैसे कि अगस्ता वेस्टलैंड सौदे में क्रिश्चियन मिशेल और तब के वायुसेना चीफ एसपी त्यागी का परिवार शामिल था। ये सब बिल्कुल वैसे ही होता है जैसे कुछ इलाकों में आप मकान किराये पर लेने जाएं तो हर हाल में आपको किसी प्रॉपर्टी ब्रोकर के जरिए ही जाना पड़ता है। धंधा चौपट होने से नाराज इन हथियार सौदागरों ने भी इस मामले में राहुल गांधी की काफी मदद की।

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