सुषमा जी, आपने देश को ईसाई मिशनरीज़ का अड्डा बना दिया

बीच की तस्वीर सेंटिनल आइलैंड की है और दायीं तस्वीर ईसाई मिशनरी जॉन एलन चाऊ की है।

अंडमान के नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड पर अमेरिका से आए ईसाई धर्म प्रचारक की मौत ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है। सवाल यह कि ईसाई मिशनरीज़ टूरिस्ट वीज़ा लेकर आखिर भारत में बेरोक-टोक कैसे आ रहे हैं? 2014 में मोदी सरकार आने के बाद ईसाई मिशरीज की गतिविधियों पर काफी हद तक लगाम लगा दी गई है। एनजीओ के रूप में काम कर रही कई ईसाई धर्मांतरण एजेंसियों की मान्यता रद्द की गई। इसका नतीजा यह हुआ कि अब उन्हें भारत में एक तरह से चोरी-छिपे आना पड़ रहा है। इसका सबसे आसान रास्ता है टूरिस्ट वीजा। जिस जॉन एलेन चाऊ नाम के अमेरिकी पर्यटक की जान सेंटिनल आइलैंड पर गई, उसके मामले में भी यही बात सामने आई है। चाऊ भारत में टूरिस्ट वीज़ा लेकर आया था, लेकिन उसका असल मकसद धर्मांतरण था। यानी गृह मंत्रालय की बंदिशों से ईसाई मिशरियों के लिए अगर मुश्किल पैदा हुई तो सुषमा स्वराज के विदेश मंत्रालय ने उनके लिए एक नया रास्ता खोल दिया।

टूरिस्ट वीज़ा पर धर्मांतरण का खेल जारी

जब भी कोई विदेशी भारत आता है तो उसे वहां के भारतीय दूतावास में वीज़ा के लिए आवेदन देना होता है। इसमें उसे साफ-साफ बताना होता है कि भारत आने का उसका उद्देश्य क्या है। 2014 से पहले कांग्रेस की सरकार के दौर में ज्यादातर विदेशी ईसाई मिशनरीज़ बाकायदा यह लिखकर आया करते थे कि वो भारत में धर्म प्रचार के लिए जा रहे हैं। लेकिन अब उनकी कई एजेंसियों की मान्यता रद्द की जा चुकी है। ऐसे में उनके वीज़ा का आवेदन खारिज होने का डर रहता है। लिहाजा अब वो अपनी असली पहचान छिपाकर खुद को पर्यटक बताकर भारत आने लगे हैं। मुंबई में 26/11 के हमलों की साजिश रचने वाला डेविड हेडली भी अमेरिकी नागरिक था। उसे भी बड़े आराम से टूरिस्ट वीजा मिल जाया करता था। उस हमले के बाद पहली बार अमेरिकी लोगों को भारत आने पर वीजा से पहले थोड़ी-बहुत पूछताछ शुरू हुई थी। लेकिन सुषमा स्वराज के विदेश मंत्री बनने के साथ ही भारत एक बार फिर से विदेशियों के लिए एक तरह से खुल गया। सुषमा स्वराज ट्विटर पर ही हुक्म जारी करके वीजा जारी करने के आदेश देती हैं। इसके कारण दूतावासों के अधिकारी दबाव में रहते हैं और ज्यादा छानबीन करने से डरते हैं। जबकि यह दूतावास की जिम्मेदारी होती है कि वो वीजा के लिए आवेदन करने वाले का पूरा बैकग्राउंड चेक करें ताकि पता चले कि उसका भारत जाने का असली उद्देश्य क्या है।

ईसाई मिशनरीज़ का बेस कैंप बना भारत

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि बीते कुछ साल में भारत एशिया के इस पूरे क्षेत्र में ईसाई धर्म प्रचार करने वाली एजेंसियों का बेस कैंप बन चुका है। खाड़ी देशों और पूर्वी एशिया के देशों में प्रचार करने के लिए जाने वाले कई ईसाई मिशनरीज़ भारत से ही रवाना होते हैं। दरअसल खाड़ी के देशों में युद्ध की आड़ में वहां पर ईसाई धर्मांतरण एजेंसियों की गतिविधियां बढ़ी हैं। पिछले सालों में तालिबान और यहां तक कि आईएसआईएस के हाथों कई ईसाई मिशनरीज़ पड़ चुके हैं। इनमें से कई को भारत सरकार ने बाकायदा उन आतंकवादी संगठनों से मोलभाव करके छुड़वाया है। आम तौर पर ऐसे मोलभाव में किसी कैदी को छुड़ाने की मोटी कीमत चुकानी पड़ती है। यह साफ नहीं है कि वो कीमत किसने चुकाई। जुलाई 2016 में अफगानिस्तान में ईसाई धर्मांतरण के लिए गई जूडिथ डिसूजा नाम की महिला को तालिबान ने अगवा कर लिया था। वो उसे मारने वाले थे तभी सुषमा स्वराज ने निजी तौर पर रुचि लेते हुए उसे बचा लिया। इसी तरह खाड़ी के देश यमन में आईएसआईएस के कब्जे से पूरे डेढ़ साल के बाद फादर टॉम उजहन्नालिल को भी बचा लिया गया था। उस मामले में भी सुषमा स्वराज ने निजी तौर पर दिलचस्पी दिखाई थी। विदेश मंत्रालय से मिली ऐसी सुरक्षा का नतीजा है कि ईसाई मिशनरीज के हौसले बुलंद हैं वो भारत के आसपास के देशों में बड़े आराम से जाते हैं क्योंकि उन्हें भरोसा होता है कि अगर वहां पर वो किसी मुश्किल में फंसे तो भारत सरकार उन्हें बचा लेगी। सोशल मीडिया पर लोग इस बात को खुलकर लिख भी रहे हैं।

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