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तालिबान से भी खतरनाक है सूफी इस्लाम, जानें पूरा सच

बायीं तस्वीर अजमेर के ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की है। यहां पर हर रोज सैकड़ों की संख्या में हिंदू आते हैं और उन्हें पता तक नहीं होता कि वो किसके आगे सिर झुकाने जा रहे हैं।

पीएम नरेंद्र मोदी ने कुछ समय पहले कहा था कि इस्लाम में अगर सूफी मत पर अधिक जोर दिया गया होता तो आतंकवाद नहीं होता। सवाल उठता है कि क्या प्रधानमंत्री का यह बयान सही है। आम धारणा के नजरिए से देखें तो मोदी ने ठीक ही कहा। लेकिन आम सोच के उलट सच्चाई बिल्कुल अलग है। सूफी इस्लाम अमनपसंद है, ऐसी गलतफहमी पूरी दुनिया में फैलाई गई है। पीएम मोदी भी उसी का शिकार हुए होंगे। हाल में आई फिल्म ‘पद्मावत’ के सिलसिले में भी सूफीवाद पर बहस छिड़ी हुई है। कारण ये कि रानी पद्मावती पर अमीर खुसरो ने ‘पद्मावत’ नाम से किताब लिखी थी। अमीर खुसरो अलाउद्दीन खिलजी का दरबारी कवि था और इतिहास में उसे सूफी संत की तरह जाना जाता है। आज भी लोग दिल्ली में अमीर खुसरो की कब्र पर मत्था टेकने के लिए जाते हैं। इनमें बड़ी संख्या हिंदुओं की भी होती है। जबकि इतिहास की नजर से देखें तो अमीर खुसरो कवि होने के साथ-साथ एक कट्टरपंथी हत्यारा भी था। अमीर खुसरो की ये खूबी उसकी लिखी रचनाओं से भी जाहिर होती है। नीचे हम आपको उनके बारे में भी बताएंगे। एक अपील: कृपया यह लेख कॉपी न करें, बेहतर हो कि आप पोस्ट का लिंक शेयर करें।

इस्लाम में सूफीवाद क्या है?

सूफ़ी मत यानी अपने में ही डूबे रहने वाले, अपने चश्मे से दुनिया को देखने वाले लोग। वो अल्लाह को अपने प्रेमी की तरह याद करते हैं। आम तौर पर उन्हें हिंदू-मुसलमान के बीच की कड़ी मान लिया जाता है। इस्लाम में गाने और संगीत पर सख्त पाबंदी है, लेकिन सूफी नाच-गाकर ही अपने खुदा को रिझाते हैं। कई बड़े उर्दू शायद खुद को सूफी बताते हैं। भारत में सूफीवाद की इमेज बहुत रूमानी यानी रोमांटिक सी बनाई गई है। कई सूफी गाने खूब मशहूर हो चुके हैं। जिनमें सांकेतिक भाषा में अल्लाह की इबादत ही होती है। लेकिन हैरानी की बात है कि दुनिया में हर जगह जहां सूफीवाद रहा है वो धीरे-धीरे वहाबी इस्लाम में बदल गया। अफगानिस्तान, इंडोनेशिया जैसे देश सूफीवाद के रास्ते चलकर ही आज कट्टर इस्लामी मुल्क में बदल चुके हैं। कश्मीर का भी यही हाल है। वहां पर कभी कई मशहूर दरगाहें हुआ करती थीं। कहते हैं कि इस्लाम का प्रचार दो ही चीजों से होता है- 1. तलवार और 2. सूफीवाद। भारत में जितना धर्म परिवर्तन तलवार के दम पर हुआ, करीब-करीब उतना ही सूफीवाद के दम पर भी हुआ है। एक अपील: कृपया यह लेख कॉपी न करें, बेहतर हो कि आप पोस्ट का लिंक शेयर करें।

पीर-फकीर बने बर्बर हत्यारे

अमीर खुसरो और बुल्ले शाह जैसे शायरों और कवियों की कविताओं को आजकल कुछ लोग नए तरीके से गाकर खूब मशहूर हो रहे हैं। लाखों-करोड़ों हिंदू भी इन गानों के शौकीन होते हैं और इन्हें खूब पसंद करते हैं। लेकिन ज्यादातर लोगों को इन गानों का असली मतलब पता नहीं होता है। अगर आप इन गानों का सही मतलब जानें तो आप सूफी मत के पीछे की पूरी सोच को समझ जाएंगे। इसके कुछ उदाहरण आप नीचे देख सकते हैं। लेकिन उससे पहले यह समझना होगा कि आज जब तलवार के इस्तेमाल में पहले के मुकाबले अधिक जोखिम है सूफी मत इस्लाम को फैलाने का सबसे कारगर तरीका बन चुका है। सूफी गानों की हर लाइन यही कहती है कि मुसलमान बनकर ही भगवान को पाया जा सकता है। जिन पीर-फकीरों को महान आत्मा बताकर पूजने को कहा जाता है वो दरअसल अपने समय के बर्बर हत्यारे थे। वरना यह कैसे संभव है कि अलाउद्दीन खिलजी जैसे हत्यारे राजा का दरबारी कवि अमीर खुसरो जैसा भला आदमी हो। एक अपील: कृपया यह लेख कॉपी न करें, बेहतर हो कि आप पोस्ट का लिंक शेयर करें।

‘छाप तिलक’ का असली मतलब

अमीर खुसरो का लिखा गाना ‘छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाय के’ बड़े शौक से गाया जाता है। एक बार इस गाने के शब्दों पर गौर करें:

छाप-तिलक सब छीनी मोसे नैना मिलाय के
प्रेमभटी का मधवा पिलाय के
मतवाली कर लीनी रे मोसे नैना मिलाय के
गोरी-गोरी बहियाँ हरी-हरी चूड़ियां,
बहियां पकड़ धर लीनी रे मोसे नैना मिलाय के
बल-बल जाऊं मैं तोरे रंगरेजवा
अपनी सी कर लीनी रे मोसे नैना मिलाय के
ख़ुसरो निज़ाम के बल-बल जाइये
मोहे सुहागन कीन्हीं रे मोसे नैना मिलाय के

क्या आपने कभी सोचा है कि ये ‘छाप तिलक’ क्या है ? अमीर ख़ुसरो के पिता अमीर सैफ़ुद्दीन मुहम्मद के बेटे थे जो कि तुर्क थे और निज़ामुद्दीन नाम के फकीर के चेले थे। न तो तुर्क तिलक लगते हैं न निज़ामुद्दीन जिस चिश्ती परंपरा के सूफ़ी हैं उसमें तिलक लगाया जाता हैं। तो ये किस छाप-तिलक का ज़िक्र कर रहे हैं ? और ये कैसा छाप-तिलक है जिसे सिर्फ नैना मिलाने से छीनने की बात हो रही है? दरअसल छाप-तिलक का मतलब ब्रज के गोस्वामियों द्वारा कृष्ण भक्ति में 8 जगह लगाने वाली छाप से है। इस गाने में अमीर ख़ुसरो कह रहा है कि मुझसे आँखें मिलाकर मेरी छाप-तिलक सब छीन ली यानी मुझे मुसलमान कर दिया। इसी तरह नीचे अमीर खुसरो की इस कविता को देखिए:

रैनी चढ़ी रसूल की रंग मौला के हाथ
जिसकी चूँदर रंग दई धन-धन उसके भाग
मौला अली मौला मौला अली मौला
आज रंग है ए माँ रंग है जी रंग है

रसूल की चढ़ी रैनी में मौला के हाथ रंग होने का क्या मतलब ? जिसकी चूनर रंग दी गई उसके धन-धन भाग का क्या अर्थ है? यानी हिंदू धर्म छोड़कर रसूल यानी अल्लाह की शरण में आने वाले के भाग्य खुल जाते हैं। ‘आज रंग है हे माँ….’ का मतलब एक साथ बहुत सारे लोगों के इस्लाम कबूल करने से है। नीचे अमीर खुसरो की ही एक और कविता को देखें:

मोरा जोबना नवेलरा भयो है गुलाल
कैसी धार दिनी विकास मोरी माल
मोरा जोबना नवेलरा
निजामुद्दीन औलिया को कोई समझाये
ज्यों ज्यों मनाऊं वो तो रूठता ही जाये
मोरा जोबना नवेलरा
चूड़ियाँ फोड़ पलंग पे डारूँ
इस चोली को दूँ मैं आग लगाय
सुनी सेज डरावन लागे
विरही अगन मोहे डंस-डंस जाये
मोरा जोबना नवेलरा

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी कुछ दिन पहले अजमेर की दरगाह पर मत्था टेकने गए थे। गौर से देखें तभी पता चलता है कि ये कोई इस्लामी मजहब की जगह है।

अमीर खुसरो की इन लाइनों को पढ़कर पहली नज़र में तो समझ में ये आता है कि इनका मकसद कपड़े रंगवाना है या होली में कपड़े रंगवाना है और ये किसी मौला नाम के रंगरेज़ की बात कह रहे हैं। कई जगह ख़ुसरो या अन्य सूफ़ी नज़रें मिलते ही चेरी यानी दासी बनने, अपने सुहागन होने, अपने नवल जोबन की अगन, अपनी चोली को जलाने की बात करते हैं। इसका तो मतलब ये लिया जा सकता है कि ये पठानी-ईरानी शौक़ (ग़िलमाँ) की बात कर रहे होंगे मगर रंगरेज़ पर कविता लिखने का क्या मतलब है? वैसे भी अमीर खुसरो, बुल्ले शाह, निज़ामुद्दीन, बख़्तियार काकी वगैरह धोबी तो पक्का नहीं थे। एक अपील: कृपया यह लेख कॉपी न करें, बेहतर हो कि आप पोस्ट का लिंक शेयर करें।

हारे हुए हत्यारे बने ‘हज़रत’

ऐतिहासिक रूप से देखें तो अफगानिस्तान से लेकर आज के पाकिस्तान के इलाकों, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पूरा उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, बांग्लादेश और आगे इंडोनेशिया तक पूरा गलियारा सूफी इस्लाम के असर वाला है। जिस समय इस्लाम यहां आया उस दौर में यहां बड़े इलाके में बौद्ध मत के लोग रहा करते थे। वो भी इनकी बर्बरता का शिकार बने। यह बात ऐतिहासिक रूप से साबित हो चुकी है कि सूफी इस्लाम ने ही उत्तर प्रदेश और बिहार से बौद्ध धर्म का लगभग सफाया कर दिया। बुल्ले शाह, मुईनुद्दीन, निजामुद्दीन, बख़्तियार काकी जैसे सूफियों की दरगाहें इसी गलियारे में मिलती हैं। यहां एक बात यह भी गौर करने वाली है कि ये सभी वो हैं जिनको तब के वीर हिंदू राजाओं ने मौत के घाट उतारा था। बड़े सूफी संत ही नहीं, छोटे-छोटे शहरों में जिन पीर बाबाओं और गाजी बाबाओं की दरगाहों पर लोग मत्था टेकते हैं वो भी दरअसल मध्यकाल में भारत पर हमला करने वाली सेनाओं के सेनापति हुआ करते थे। एक अपील: कृपया यह लेख कॉपी न करें, बेहतर हो कि आप पोस्ट का लिंक शेयर करें।

अगले पेज (2) पर पढ़ें अजमेर के ख्वाजा गरीब नवाज का सच

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