15 अगस्त नहीं, 21 अक्टूबर 1943 को मिली थी पहली आजादी

अगर आपसे कोई कहे कि 15 अगस्त 1947 देश का असली आजादी दिवस नहीं है तो क्या आप इस पर यकीन करेंगे? शायद नहीं, क्योंकि बचपन से स्कूलों में यही पढ़ाया गया है कि भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ था। लेकिन यह बात पूरी तरह से सच नहीं है। दरअसल देश की पहली आजाद सरकार का गठन 21 अक्टूबर 1943 में हो गया था। इस दिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज के सर्वोच्च कमांडर के तौर पर स्वतंत्र भारत की पहली अस्थायी सरकार बनाई थी और बाकायदा सिंगापुर की धरती पर इस सरकार का तिरंगा झंडा फहराया गया था। इस सरकार को जर्मनी, जापान, फिलिपींस, कोरिया, चीन, इटली और आयरलैंड जैसे प्रमुख देशों ने मान्यता भी दी थी। इसका अपना डाक टिकट  भी था। नेताजी ने आजाद भारत का संविधान लिखने के लिए कमेटी का गठन भी कर दिया था। उन दिनों अंडमान निकोबार द्वीप समूह पर जापान का कब्जा हुआ करता था। जापान ने 21 अक्टूबर के ही दिन आजाद भारत की इस पहली सरकार को अपने कब्जे वाला पूरा अंडमान निकोबार द्वीप समूह सौंप दिया था। यानी मौजूदा भारत का एक हिस्सा आजाद हो गया और यहां से ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने बाकी भारत को आजाद कराने की लड़ाई का एलान किया।  यह भी पढ़ें: रेडियो मैसेज में क्या कहना चाहते थे नेताजी बोस

अंडमान से छिड़ी थी आजादी की जंग

अंडमान को अपना बेस बनाने के बाद सुभाष चंद्र बोस ने यहां का नया नामकरण किया। अंडमान का नाम शहीद द्वीप और निकोबार का नाम स्वराज्य द्वीप रख दिया गया। इसके फौरन बाद 30 दिसंबर 1943 को नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने खुद यहां पर आकर स्वतंत्र भारत का पहला झंडा फहराया। 4 फरवरी 1944 से आजाद हिंद फौज ने ब्रिटिश कब्जे वाले भारत के इलाकों पर जोरदार हमला बोल दिया। उन्होंने सबसे पहले नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों के कुछ हिस्सों को अंग्रेजों से आजाद भी करवा लिया। ये वो समय था जब सुभाषचंद्र बोस की लोकप्रियता देश भर में चरम पर थी। हर किसी को उम्मीद थी कि उनकी सेना बहुत जल्द पूरे भारत को आजाद करवा लेगी। 6 जुलाई 1944 को नेताजी ने बर्मा के रंगून रेडियो स्टेशन से गांधी जी के नाम जारी एक प्रसारण में अपनी लड़ाई की जानकारी दी और बताया कि आजाद हिंद फौज तेजी से दिल्ली की तरफ बढ़ रही है। उन्होंने गांधी जी से अपील की कि देश की स्वतंत्रता की इस निर्णायक लड़ाई के लिए वो अपनी शुभकामनाएं दें। नेताजी के इन तेवरों से अंग्रेज ही नहीं, बल्कि गांधी, नेहरू और कांग्रेस भी बुरी तरह डर गए थे। अंग्रेजों के डरने की वजह यह थी कि बड़ी संख्या में अंग्रेजों की सेना के भारतीय सैनिक से बगावत करके आजाद हिंद फौज में शामिल हो रहे थे।  लेकिन गांधी और नेहरू का डर यह था कि सुभाषचंद्र ने अगर देश को आजाद करवा लिया तो आजादी के बाद भारत की सत्ता पर कांग्रेस के कब्जे का उनका सपना मिट्टी में मिल जाएगा। 22 सितम्बर 1944 को शहीदी दिवस मनाते हुए नेताजी बोस ने अपने सैनिकों से मार्मिक शब्दों में कहा – “हमारी मातृभूमि स्वतंत्रता की खोज में है। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा। यह स्वतंत्रता की देवी की माँग है। लेकिन बदकिस्मती से तभी पासा पलट गया। उन दिनों दूसरा विश्वयुद्ध चल रहा था नेताजी बोस को जर्मनी और जापान का समर्थन हासिल था। लेकिन युद्ध में जर्मनी ने हार मान ली और परमाणु हमले के बाद जापान को भी घुटने टेकने पड़े। कहा जाता है कि इसी दौरान टोक्यो जाते हुए विमान हादसे में नेताजी की मौत हो गई। हालांकि बाद में यह दावा पूरी तरह से गलत पाया गया। इसके बाद से आज तक नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मौत एक राज़ है। 

अंग्रेजी राज की जड़ें हिलाकर रख दीं

नेताजी सुभाषचंद्र बोस के बाद उनकी आजाद हिंद फौज का मनोबल बुरी तरह से गिर गया। लेकिन आजाद हिंद फौज तब तक अंग्रेजी राज की जड़ें हिला चुकी थी। अंग्रेजों को पता था कि नेताजी की सेना से निपटना उनके लिए आसान नहीं होगा और कुछ साल में ही वो उनसे भारत की सत्ता छीन लेंगे। क्योंकि अंग्रेजों की सेना के भारतीय जवानों की बगावत और तेज़ हो गई थी और उनके बिना लड़ाई लड़ पाना नामुमकिन था। 18 फरवरी 1946 को बंबई में नौसैनिकों ने विद्रोह कर दिया। यह बगावत कराची से लेकर कोलकाता तक फैल गई। इसके कुछ दिन बाद ही जबलपुर में फौजी बगावत हो गई। इन हालात में अंग्रेजों ने फौरन भारत की आजादी को लेकर कांग्रेस के नेताओं के साथ सौदेबाजी शुरू कर दी। इस दौरान सत्ता की खींचतान में ही भारत और पाकिस्तान के बंटवारे का भी फैसला हो गया। दूसरे विश्वयुद्ध में जर्मनी का साथ देने के कारण नेताजी सुभाषचंद्र बोस अंग्रेजों की नजरों में युद्ध अपराधी थे। हैरानी यह थी कि गांधी-नेहरू जैसे कांग्रेसी नेताओं ने भी नेताजी के साथ अपराधियों जैसा ही सलूक किया। माना जाता है कि आजादी के बाद कई साल तक नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने गुमनामी में जीवन बिताया। हाल ही में जारी पुराने दस्तावेजों से साफ हो चुका है कि तब के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू नेताजी के परिवार की जासूसी करवाया करते थे। यह भी पढ़ें: गुमनामी बाबा ही थे सुभाषचंद्र बोस

आजाद हिंद फौज थी अपने आप में नायाब

नेताजी सुभाषचंद्र बोस की सेना कई मायनों में बहुत खास थी। माना जाता है कि उन्होंने करीब एक लाख सैनिकों को अपने साथ जुटा लिया था। सेना में सभी रैंकों पर सभी धर्मों और जातियों के लोगों को समान रूप से जगह दी गई थी। ताकि किसी को अपने साथ नाइंसाफी होती न लगे। यहां तक कि महिलाओं की अलग रेजीमेंट भी थी। आजाद हिंद फौज ने भारत में सबसे पहले नगालैंड के रास्ते प्रवेश किया था। वहां से जंग जीतते हुए यह सेना मणिपुर तक पहुंच गई थी। आजाद हिंद फौज के सैनिक इन सभी जगहों पर अपना ध्वज फहराते हुए आगे बढ़े। इसलिए तकनीकी तौर पर देखें तो आजाद भारत की धरती पर आजादी का झंडा आजाद हिंद फौज ने ही फहराया था। यह भी पढ़ें: नेताजी की सीक्रेट फाइलों में अब तक क्या-क्या मिला?

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