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एनडीटीवी के अंदर की कहानी, पूर्व पत्रकार की जुबानी

“अगर कोई “खबर” से हट कर “कुछ करना” चाहता है तो उसके लिए बाहर जाने के रास्ते खुले हुए हैं” – डॉ प्रणय रॉय की यह बात आज भी कानों में गूंजती है। ऐसे लगता है कि जैसे यह घटना कल हुई हो. लेकिन यह घटना अगस्त 2007 की है। उस दिन अचानक एनडीटीवी के सभी कर्मचारियों को स्टूडियो में आने को कहा गया। किसी बड़ी खबर की उम्मीद में सब वहां जमा हो गए। पूरे हॉल में अजीब किस्म का माहौल था। हर कोई एक दूसरे से उस बड़ी खबर के बारे में सवाल पूछ रहा था। सस्पेंस के बीच डॉ प्रणय रॉय मैनेजमेंट टीम के साथ हॉल में दाखिल हुए और उन्होंने दिबांग को संपादक पद से हटाने का ऐलान कर दिया। उसी क्रम में उन्होंने मनीष कुमार और संजय अहिरवाल को कार्यकारी संपादक बनाने की घोषणा की। फैसला सुनाते वक्त उन्होंने जोर देकर कहा कि “अगर कोई ‘खबर’ से हट कर ‘कुछ करना’ चाहता है तो उसके लिए बाहर जाने (एनडीटीवी छोड़ने) के रास्ते खुले हुए हैं।”

संपादक को हटाने का यह तरीका और चैनल की संपादकीय नीति के स्पष्टीकरण का यह अंदाज मेरी समझ से परे था। इसमें बेइज्जत करने का भाव ज्यादा था। इससे यही लग रहा था कि दिबांग और उनकी टीम के कुछ सदस्य कुछ ऐसी खबरें दिखा रहे थे या दिखाना चाह रहे थे जो मैनेजमेंट की नजर में खबर नहीं थीं। अगर ऐसा था यह संदेश सीधे तौर पर भी दिया जा सकता था। उसके लिए तमाशा करने की क्या जरूरत थी। इस तमाशे के बाद मैं लंबे समय तक यह सोचता रहा कि सौम्य और शालीन दिखने वाले डॉ प्रणय रॉय ने यह ओछी हरकत क्यों की? मैं यह समझ सकता था कि डॉ रॉय की मंशा मनीष कुमार और संजय अहिरवाल का इकबाल कायम करने की थी। वह संपादकीय और तकनीकी टीम- सभी को यह स्पष्ट करना चाहते थे कि अब बॉस कौन है। लेकिन किसी को मजबूती से पेश करने के लिए किसी के वजूद और योगदान को खारिज कर देने का तरीका मुझे जमा नहीं। यह गड़े मुर्दे उखाड़ने जैसी बात थी और इस एक बात से जुड़े हुए दर्जनों सवाल सिर उठा कर खड़े हो गए।

पहला सवाल तो यही था कि चैनल के पत्रकारों को यह कैसे आभास होगा कि डॉ रॉय की नजर में कौन सी घटना… खबर है और कौन सी घटना… खबर नहीं है? एनडीटीवी में काम करने का अनुभव तो यही कहता था कि डॉ रॉय के मुताबिक एक ही जैसी दो घटनाओं में से एक घटना… खबर हो सकती है जबकि दूसरी घटना… खबर नहीं हो सकती है। किसी भी वाकये का खबर होना डॉ रॉय के निजी संबंधों पर निर्भर करता था। अब जब किसी चैनल का रेवेन्यू मॉडल उसके मालिकान के निजी संबंधों पर केंद्रित हो और मालिकान के निजी संबंधों का दायरा व्यापक हो तो फिर उस चैनल में तैनात पत्रकार क्या करें? वह कैसे तय करे कि खबर चलाई जाए या नहीं? दिबांग को हटाने के पीछे तमाम वजहों में से बड़ी वजह ऐसी ही खबरें थीं. जिनमें से एक खबर तात्कालिक वजह बनी. इस खबर के केंद्र में मुंबई की एक गुमनाम अदाकारा जाह्नवी थी, जिसने अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय की शादी से एक रात पहले अपना हाथ काट लिया और फिर खबर बन गई.

आखिर एनडीटीवी इंडिया के संपादक पद से दिबांग को हटाए जाने से जाह्नवी प्रकरण का क्या रिश्ता है? आखिर कोई लड़की खबर कैसे बन जाती है? जाह्नवी जैसी खबर कोई पत्रकार करता है या फिर वैसी खबरें व्यक्ति और समाज की कुंठा से जन्म लेती हैं? और जाह्नवी के बहाने नैतिकता की चादर ओढ़ने वाले डॉ प्रणय रॉय और राधिका रॉय सचमुच इतने नैतिक हैं या फिर यह महज पाखंड था? जाह्नवी मामले में डॉ प्रणय रॉय और राधिका रॉय जिस नैतिकता की दुहाई दे रहे थे, वह नैतिकता 2004 और 2005 में प्रीति जैन-मधुर भंडारकर मामले में कहां सो रही थी? दिबांग को हटाने का मामला सिर्फ नैतिकता से जुड़ा था या फिर कोई और “व्यावहारिक” और “आर्थिक” वजह थी? और अंत में एनडीटीवी के पतन में जाह्नवी प्रकरण की क्या भूमिका है? 

इन सवालों का जवाब जानने के लिए हमें वक्त का पहिया थोड़ा पीछे घुमाना होगा. और 20 अप्रैल 2007 की सुबह मुंबई में हुई एक घटना पर गौर करना होगा. 20 अप्रैल को देश की सबसे चर्चित शादियों में एक शादी होने वाली थी. देश-विदेश से अनेक ताकतवर लोग उस शादी में शामिल होने के लिए मुंबई पहुंच चुके थे. वह शादी बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन के बेटे अभिषेक बच्चन और विश्व सुंदरी ऐश्वर्या की शादी थी. मैं बीते एक महीने से रात की ड्यूटी पर तैनात था. उन दिनों चैनल की टीआरपी लगातार गिर रही थी. हम नंबर दो से नंबर पांच पर पहुंच गए थे. इसमें हमारा कोई दोष नहीं था. यह चैनल के मालिकों का पाखंड था जिसकी वजह से टीआरपी गिर रही थी (इस पर आगे सिलसिलेवार तरीके से चर्चा होगी). बावजूद इसके हम सभी काम करने वाले उस गिरावट को थामने में जी-जान से जुटे थे. जिस चैनल में कोई पांच दिन से अधिक नाइट शिफ्ट नहीं करता था उसी चैनल में मैं और मेरे साथी एक महीने से रात की ड्यूटी कर रहे थे ताकि किसी तरह चैनल की खोई साख लौटाई जा सके. 

उन्हीं कोशिशों के बीच 20 अप्रैल को सुबह 4 बजे मुंबई से आई एक खबर ने हम सबको चौंका दिया. हम सभी कुर्सी से उछल पड़े. यह अजीब विडंबना है. पत्रकारों की स्थिति आपात सेवाओं में तैनात कर्मचारियों की तरह होती है. उन्हें अपनी भावनाओं को काबू में रखते हुए तटस्थ और निरपेक्ष भाव के साथ खबरों को जनता तक पहुंचाना होता है. उस दिन आयी खबर सनसनीखेज थी. जाह्नवी नाम की अदाकारा ने अभिषेक बच्चन पर धोखा देने का आरोप लगाते हुए हाथ काट लिया था. थाने में शिकायत दर्ज हो चुकी थी और अस्पताल में उसका इलाज कराया गया. मुंबई से आयी फीड में यह खबर और इससे जुड़े पात्र कैमरे पर मौजूद थे. संपादक दिबांग का यह आदेश था कि जब भी कोई बड़ी खबर आए तो सबसे पहले उन्हें सूचित करना है. मैंने उस दिन भी यही किया. रिपोर्टर से बातचीत करके सभी पहलुओं की जानकारी हासिल की और दिबांग को फोन किया. दिबांग ने सबकुछ बड़े ध्यान से सुना. मैंने उन्हें अपने पास मौजूद सारे तथ्यों की जानकारी दी. बताया कि सबकुछ कैमरे पर है. फिर पूछा कि क्या किया जाए? दिबांग ने कहा कि करना क्या है… खेल जाओ. 

दिबांग का कहना था कि खेल जाओ और इस आदेश के साथ ही पूरी टीम हरकत में आ गई. फिर क्या था हमने इस खबर के अलग-अलग पहलुओं को एक धागे में पिरो कर बुलेटिन तैयार कर दिया. ब्रेकिंग न्यूज की पट्टियां तैयार कर दी गईं और रिपोर्टर को लाइव के लिए मुस्तैद कर दिया गया. जब सारी तैयारी हो गई तो सुबह की व्हील जल्दी तोड़ने का फैसला ले लिया गया. तय हुआ कि सुबह सिर्फ यही खबर चलेगी. इसलिए कुछ और रिपोर्टर इस खबर पर तैनात किए गए. सारे रिकॉर्डेड प्रोग्राम गिरा दिये गए और सुबह 5.55 पर यानी आमतौर पर सुबह 6 बजे शुरू होने वाले बुलेटिन से पांच मिनट पहले व्हील तोड़ कर हम इस खबर पर आ गए. मकसद बढ़त बनाना था. खबरों की दुनिया में लीड और फॉरवर्ड प्लानिंग का महत्व बहुत बड़ा होता है. सिर्फ बढ़त लेने से काम नहीं चलता. उसे बरकरार रखने के लिए फॉरवर्ड प्लानिंग भी मजबूत रहनी चाहिए. वरना पिछड़ने में देर नहीं लगती. 

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रवीश कुमार और पुण्य प्रसून जैसे पत्रकारों की पोल-खोल

हमारी तरह कई और चैनलों ने भी तैयारी की हुई थी. चंद ही मिनट के भीतर सब उस खबर पर उतर आए. आमतौर पर सुबह की शिफ्ट आठ बजे खत्म हो जाती थी, लेकिन उस दिन में सुबह 10:30 बजे तक दफ्तर में रहा. स्पोर्ट्स बुलेटिन को छोड़ कर सारे रिकॉर्डेड प्रोग्राम गिरा दिए गए. 9.30 बजे चलने वाले “खबरों की खबर” प्रोग्राम को बदल कर “खास खबरों की खबर” प्रोग्राम चला गया और जाह्नवी प्रकरण पर आधे घंटे का स्पेशल तैयार करके चलाया गया. इन साढ़े चार घंटों के दौरान मेरी सभी अधिकारियों से लगातार बात होती रही. पंकज पचौरी, मनोरंजन भारती, सोनाल जोशी सब फोन लाइन पर बारी बारी आए. किसी ने भी खबर गिराने की बात नहीं की. खबर का विरोध नहीं किया. 

पंकज पचौरी और मनोरंजन भारती समेत सभी इस खबर के समर्थन में थे. 10.30 बजे मैं घर के लिए निकला और तब तक इस खबर का दूसरा पक्ष सामने आ चुका था. जाह्नवी की पिछली शादी और उसके बच्चे की खबर भी सामने आ चुकी थी. केंद्र में कांग्रेस की मनमोहन सरकार थी और महाराष्ट्र में कांग्रेस के विलासराव देशमुख मुख्यमंत्री थे. उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी. सभी से अभिषेक बच्चन के परिवार के अच्छे संबंध थे. खबर सामने आने के तुरंत बाद सारा तंत्र सक्रिय हो चुका था. कुछ घंटों के भीतर जाह्नवी को कठघरे में खड़ा कर दिया. बिना जांच उसकी हरकत को पब्लिसिटी स्टंट करा दिया गया. वह झूठी घोषित कर दी गई. और जब औरत झूठी घोषित कर दी जाए तो फिर समाज और परिवार की सहानुभूति भी उसके पक्ष में नहीं रहती. इसलिए जाह्नवी के समर्थन में कोई नहीं आया. न परिवार और ना ही समाज. खबर पूरी तरह पलट गई. खबर पलटने के साथ ही एनडीटीवी के भीतर यह सवाल उठा कि आखिर इसे चलाने का फैसला किसने लिया था? यह “घोर अनैतिक” काम किसने किया था? 

मतलब सुबह 4 बजे से लेकर दिन के 11 बजे तक जो लोग इस सनसनीखेज खबर के बावजूद सो रहे थे वो सभी अचानक जाग उठे. उनका जमीर जाग उठा. उनकी नैतिकता जाग उठी. उस दिन घर पहुंचने पर भी मैं सो नहीं सका. थोड़ी-थोड़ी देर पर कभी दिबांग का तो कभी नरेंद्र पाल सिंह का फोन आता. दोनों अपने-अपने तरीके से पूरे घटनाक्रम की जानकारी लेते. बार-बार लेते. भयंकर तनाव था. मेल के खेल में बरखा दत्त, पंकज पचौरी, सोनाल जोशी समेत सभी कूद पड़े थे. सबने मिल कर दिबांग को घेर लिया. सबसे पहला ई-मेल बरखा दत्त का आया. उन्होंने दोपहर 12:30 बजे के करीब कहा कि अंग्रेजी चैनल पर यह खबर नहीं चलेगी. बरखा इन दिनों एनडीटीवी और डॉ प्रणय रॉय से नाराज चल रही हैं. दरअसल उन्हें भ्रम हो गया था कि वो एनडीटीवी की सिपहसालार नहीं बल्कि मालकिन हैं. इसी भ्रम में वो एनडीटीवी के हर उस खेल में शामिल रहीं जो डॉ प्रणय रॉय ने अपने आकाओं के इशारे पर शुरू किया. चाहे वो वोल्कर कांड में नटवर सिंह को फंसा कर कांग्रेस को बचाने का मामला हो या फिर कोई और. डॉ प्रणय रॉय का खेल खेलते-खेलते बरखा को यह लगने लगा कि एनडीटीवी उनके बगैर चल नहीं सकता. यह भ्रम बहुत से लोगों को हो जाता है. शुरुआती दिनों में मेरा एक ऐसे ही संपादक से पाला पड़ा था और उस संपादक के विश्वासघात की वजह से मुझे एक मीडिया संस्थान की नौकरी छोड़नी पड़ी थी. 

खैर, जाह्नवी प्रकरण में ध्यान रखने लायक एक बात यह भी है कि खबर सुबह 4 बजे आयी थी और खबर अंग्रेजी चैनल (एनडीटीवी 24X7) पर नहीं चलाई जाएगी यह फरमान बरखा दत्त ने दोपहर 12:30 बजे सुनाया. साढ़े आठ घंटे बाद. बरखा के ई-मेल के डेढ़-दो घंटे बाद पंकज पचौरी ने ई-मेल भेजा. पंकज ने गजब की पलटी मारी थी. अपनी ऐसी ही कलाबाजियों की बदौलत वह आगे चल कर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार बने. उस दिन सुबह वो खबर के समर्थन में थे. उन्होंने मुझे फोन करके कहा था कि जाह्नवी शादीशुदा है तो क्या हुआ? शादीशुदा महिला का भी शोषण हो सकता है. मतलब वो चैनल पर उन लोगों को घेरने को कह रहे थे जो जाह्नवी के शादीशुदा होने का दावा करके अभिषेक के बचाव का आधार तैयार कर रहे थे. लेकिन बाद में उन्होंने बड़ी जोरदार कलाबाजी दिखाई और बरखा के ई-मेल को आगे बढ़ाते हुए हमसे पूछा कि “क्या दोनों चैनलों की एक संपादकीय नीति नहीं हो सकती है? अगर अंग्रेजी चैनल इस खबर को नहीं ले रहा है तो फिर हिंदी चैनल ने इसे इतना अधिक महत्व क्यों दिया?” 

जैसे इंटरटेनमेंट हेड सोनाल जोशी इंतजार में बैठी हों या फिर यह सब तय रणनीति का हिस्सा हो. चंद पलों के भीतर उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया दी. पंकज को धन्यवाद दिया और उसी क्रम में उन्होंने मुझे लपेट लिया. सोनाल ने कहा कि उन्होंने फोन पर इस खबर का विरोध किया था, लेकिन मैंने उनकी एक न सुनी. वो सरासर झूठ बोल रही थीं. उन्होंने सुबह 9:30 के बाद मुझे फोन किया था और कहा था कि एंकर बार बार यह क्यों कह रही है कि “ब्रेक के बाद लौटते हैं इस अहम खबर पर”. मैंने उनसे यही कहा था कि हम जो कुछ भी अपने चैनल पर चलाते हैं वह अहम होता है. अगर आपको लगता है कि यह खबर अहम नहीं है तो इंटरटेनमेंट हेड होने के नाते आप फैसला लीजिए, दिबांग सर से मैं बात कर लूंगा और हम यह खबर गिरा देंगे. तब उन्होंने फोन पटक दिया था. 

उसके बाद करीब 4 बजे चैनल की मालकिन राधिका रॉय ने ई-मेल पर जवाब मांगा कि आखिर खबर चलाने का फैसला किसका था? यह सवाल वो चैनल के संपादक से सीधे भी पूछ सकती थीं, लेकिन उन्होंने पहले तो खबर पलटने का इंतजार किया. उसके बाद यह सवाल सार्वजनिक तौर पर उठा दिया था. खबरों की दुनिया में काम करने वाले जानते हैं कि कई बार खबर शुरू में जिस रूप में आती है बाद में वह वैसी नहीं रहती. इसलिए खबर जब जिस रूप में सामने आती है तब वह उसी रूप में पेश की जाती है. मतलब खबर अपने सभी रूपों में खबर है. लेकिन खबरों के नाम पर फिक्सिंग करने वालों के लिए खबर के रूप मायने रखते हैं. इससे उन्हें छद्म रचने और सौदा करने का अवसर मिलता है. इसे आप ऐसे समझिए कि जाह्नवी के किरदार में अभिषेक बच्चन के किरदार से ज्यादा दम होता तो फिर किसी की नैतिकता नहीं जागती. और अगर जाह्नवी अपने आरोप को साबित करने के लिए कोई पुख्ता सुबूत तुरंत पेश कर देती तो भी शायद नैतिकता का पाखंड इतना अधिक नहीं होता. 

जब चैनल की मालकिन राधिका रॉय का ईमेल आया तो मैंने दिबांग के सामने प्रस्ताव रखा. मैंने कहा कि सर मैं इस फैसले को अपने सिर ले लेता हूं. कह देता हूं कि शिफ्ट इंचार्ज होने के नाते खबर चलाने का फैसला मेरा था. लेकिन दिबांग ने मना कर दिया. उन्होंने कहा कि “सुबह तुम्हारा फोन आया था और मैंने ही तुमसे कहा था कि खेल जाओ इसलिए तुम यह फैसला अपने सिर नहीं ले सकते. यह फैसला मेरा था और मैं ही इसकी जिम्मेदारी लूंगा. वैसे भी चैनल का संपादक होने के नाते इस पर जो भी चलता है उसकी जिम्मेदारी और जवाबदेही मेरी है.” उस मेल के खेल में सोनाल ने मेरा नाम ले लिया था और पंकज पचौरी ने गिरगिट की तरह रंग बदला था. इसलिए मैंने दिबांग से कहा कि उन दोनों को मैं जवाब देना चाहूंगा. उन्होंने कहा कि यह फैसला तुम्हारा होगा, तुम्हें जो बेहतर लगे वह करो. कुछ घंटे बाद यानी रात में दिबांग ने ई-मेल पर इस खबर की जिम्मेदारी ली. उन्होंने लिखा कि “हम भी अन्य चैनलों की तरह इस खबर के प्रवाह में बह गए. हमें ज्यादा सचेत रहना चाहिए था. हमने दोपहर बाद यह खबर उतार ली, लेकिन बाकी सभी चैनल लगातार इस खबर पर बने रहे.”

(एनडीटीवी के पूर्व पत्रकार समरेंद्र सिंह के फेसबुक वॉल से साभार। ये पूरा लेख उन्होंने 2 भाग में लिखा है। इसका अगला हिस्सा भी वो जल्द ही फेसबुक पर पोस्ट करने वाले हैं। वो भी आपको न्यूज़लूज़ पर पढ़ने को मिलेगा।)

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