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जानलेवा कैंसर, जिसकी चपेट में हैं मोदी के 2-2 सहयोगी!

कैंसर जैसी बीमारियां कैसे अच्छे खासे लोगों की जिंदगी पर ग्रहण बन जाती हैं, इसकी एक मिसाल इन दिनों देखने को मिल रही है। बीजेपी के दो सीनियर नेता एक ऐसी बीमारी से जूझ रहे हैं जिनसे बाहर निकलना मुश्किल ही नहीं, लगभग असंभव माना जाता है। ये बीमारी है पैंक्रियाटिक कैंसर। ये इंसान के पेट में अग्नाशय नाम के एक छोटे से हिस्से की बीमारी है। इससे शरीर में कई तरह के हारमोंस निकलते हैं। माना जाता है कि आज के समय में ये कैंसर का सबसे खतरनाक रूप है। पैंक्रियाटिक कैंसर अगर बहुत जल्दी पकड़ में आ जाए तब भी मरीज औसतन 20 महीने तक ही जिंदा रह पाता है। मोदी के जिन दो सहयोगियों के हम इस बीमारी से पीड़ित होने की बात कह रहे हैं वो हैं- गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रीकर और संसदीय कार्य मंत्री अनंत कुमार। पर्रीकर का अभी दिल्ली के एम्स में इलाज चल रहा है, जबकि अनंत कुमार इस समय लंदन के अस्पताल में भर्ती हैं। अंग्रेजी न्यूज पोर्टल द प्रिंट ने इस बारे में विस्तार से रिपोर्ट छापी है।

इन दोनों ही नेताओं की बीमारी के बारे में सरकार या बीजेपी की तरफ से अभी तक कोई औपचारिक जानकारी नहीं दी गई है। लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मनोहर पर्रीकर और अनंत कुमार, दोनों ही अग्नाशय के कैंसर से जूझ रहे हैं। ये एक ऐसा कैंसर है जिसे मेडिकल जांचों से पकड़ना भी आसान नहीं होता है। इसके लक्षण इतने मामूली होते हैं कि उनके लिए अक्सर लोग डॉक्टर के पास जाना जरूरी नहीं समझते। यही कारण है कि ये ज्यादातर मामलों में आखिरी स्टेज में ही जाकर पकड़ में आता है। यही कारण है कि पैंक्रियाटिक कैंसर में मरीज के बचने के चांसेज बहुत ही कम होते हैं। कैंसर के तमाम एक्सपर्ट इस बात पर आम राय रखते हैं कि अभी जितने प्रकार के कैंसर हैं, उनमें से यह सबसे खतरनाक है।

पैंक्रियाटिक कैंसर को अगर एकदम शुरुआती स्टेज में पकड़ लिया जाए, जब कैंसर की कोशिकाएं सिर्फ अग्नाशय में ट्यूमर के रूप में होती हैं तब जीवन की उम्मीद 20 महीने की होती है। अगर उसके बाद की स्टेज आ गई है तो इंसान के पास सिर्फ 10 महीने की उम्र बचती है। अगर बात इससे भी आगे पहुंच गई है तो 5 महीने या इससे भी कम जिंदा बचने की उम्मीद रहती है। इसका शुरुआती लक्षण पेट में दर्द होता है। लेकिन पेट में दर्द दूसरे बहुत से कारणों से हो सकता है। ट्यूमर बढ़ने का पेट के साइज पर अलग से कोई असर भी नहीं दिखता। अक्सर ऐसे मरीजों को पीलिया या जॉन्डिस हो जाता है। वजन तेजी से गिरने लगता है। हर वक्त उलटी जैसा लगता है और पीठ में बहुत दर्द होता है। यह सारी पीड़ा इतनी अधिक होती है कि मरीज किसी लायक नहीं बचता। पैंक्रियाटिक कैंसर की सेल्स बहुत तेजी से फैलती हैं और शरीर के दूसरे अंगों को चपेट में ले लेती हैं।

एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स को भी पैंक्रियाटिक कैंसर ही था। इस बीमारी का असर ऐसा हुआ कि वो अचानक बीमार होते गए और कुछ ही हफ्तों में हड्डियों का ढांचा बनकर रह गए। आम तौर पर इसके मरीजों को दर्द कम करने वाली दवाएं और कैंसर सेल्स के फैलने की रफ्तार कम करने वाली कीमोथेरेपी दी जाती है। आम तौर पर डॉक्टरों का लक्ष्य यही रहता है कि मौत तक मरीज के इस सफर को कम से कम दर्द और कष्ट वाला बनाया जा सके।

यह भी एक इत्तेफाक है कि मनोहर पर्रीकर और अनंत कुमार के अलावा अरुण जेटली और सुषमा स्वराज का इसी सरकार के दौरान किडनी ट्रांसप्लांट हो चुका है। उनके पर्यावरण मंत्री अनिल दवे भी अचानक किसी बीमारी से चल बसे थे। बीजेपी सांसद विनोद खन्ना का निधन भी कैंसर से हुआ। कुल मिलाकर सरकार के पूरे कार्यकाल के दौरान सहयोगियों के स्वास्थ्य के मोर्चे पर कई ऐसी अप्रिय घटनाएं हुईं जो प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी को परेशान करती रहीं।

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