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क्या राफेल खरीद में घोटाला हुआ है? जानिए क्या हैं तथ्य

राफेल विमान सौदे को लेकर मची सियासी तू तू-मैं मैं के बीच हर किसी के दिमाग में यह सवाल है कि क्या वाकई कोई घोटाला हुआ है? अगर हां तो कैसे और अगर ना तो कैसे? जो लोग हर हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी का विरोध करते हैं वो लोग मानते हैं कि घोटाला हुआ है, जबकि बीजेपी समर्थक हर हाल में मानने को तैयार नहीं कि कोई घोटाला हुआ है। लेकिन सच क्या है यह जानना आम लोगों के लिए बेहद जरूरी है। क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ सवाल है। यहां हम आपको बता दें कि मीडिया चाहे तो इस मामले का सच बता सकता है, लेकिन उसकी इसमें बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं है। क्योंकि आम तौर पर ऐसे मामलों में मीडिया भी राजनीतिक रूप से बंट जाता है। हम आपको इस मामले में कांग्रेस के सारे आरोप और उनसे जुड़े तथ्यों के बारे में बताएंगे और यह फैसला आप पर छोड़ते हैं कि राफेल सौदे में वाकई कोई गड़बड़ी हुई है या नहीं।

आरोप नंबर 1- महंगा खरीदा गया विमान

कांग्रेस का सबसे बड़ा आरोप है कि 2008 में जब उसने इस विमान के बारे में समझौता किया था तब कीमत काफी कम थी, लेकिन जब 2016 में बीजेपी ने इस सौदे पर मोलभाव किया तो कीमतें करीब तीन गुना हो गईं। हालांकि राहुल गांधी अलग-अलग ट्वीट में कीमत को लेकर अलग-अलग बातें कर रहे हैं। 16 मार्च 2018 को ट्वीट में उन्होंने कहा कि राफेल बनाने वाली डेसॉल्ट कंपनी ने सरकार के झूठ का पर्दाफाश कर दिया है और अपनी रिपोर्ट में राफेल की कीमत बता दी है। जिसके मुताबिक भारत से 1670 करोड़ में डील हुई है। जबकि मनमोहन सिंह सरकार ने 570 करोड़ रुपये में सौदा किया था। राहुल की गणित के मुताबिक हर हवाई जहाज पर 1100 करोड़ रुपया ज्यादा दिया गया जो कि 36 विमान के हिसाब से छत्तीस हजार करोड़ रुपया है। यह रकम देश के रक्षा बजट का 10 फीसदी है। इसके बाद दूसरे ट्वीट में राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि राफेल सौदे की वजह से सरकारी खजाने को 40 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। कुछ दिनों बाद आए राहुल के ट्वीट में इसे 58 हजार करोड़ रुपये का घोटाला बताया गया। हाल ही में उन्होंने अपने एक ट्वीट में इसे 1 लाख 30 हजार करोड़ रुपये का घोटाला बताया। अब वो यह कह रहे हैं कि यह भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला है। यहां हम आपको बता दें कि यूपीए सरकार के दौरान हुए कुल घोटालों की सीएजी द्वारा बताई गई कीमत 5 लाख 74 करोड़ रुपये बैठती है।

सच्चाई क्या है? तथ्य यह है कि यूपीए के वक्त राफेल का कोई सौदा हुआ ही नहीं था। शुरुआती बातचीत में कंपनी ने एक लड़ाकू विमान की कीमत 538 करोड़ रुपये मांगी थी, लेकिन यह विमान ऐसा था, जिसमें कोई हथियार या दूसरा डिफेंस सिस्टम नहीं लगा हुआ था। यानी उसे अलग से लगवाना पड़ता। यूरो और रुपये के दामों में उतार-चढ़ाव के हिसाब से देखें तो मई 2015 में 538 करोड़ रुपये का वही विमान 737 करोड़ रुपये का हो गया होता। जबकि 2019 में जब इसकी डिलिवरी होगी तब सौदे के हिसाब से इसकी कीमत 938 करोड़ रुपये बैठती। लेकिन मनमोहन सरकार कंपनी से सौदा नहीं कर सकी और मामला लटका रहा। जब मोदी सरकार आई तो उसने कंपनी के साथ नए सिरे से मोलभाव शुरू किया। विमान के साथ हथियार और दूसरे डिफेंस सिस्टम भी फिट करके देने की बात तय हुई। लेकिन अगर कांग्रेस की तरह खाली विमान से तुलना करें तो 2019 में यही विमान 794 करोड़ रुपये का बैठेगा। यानी कांग्रेस सरकार के मुकाबले 144 करोड़ रुपये कम। यह वो कीमत है जिसे बताने में मोदी सरकार आनाकानी नहीं कर रही। विवाद तब पैदा हो रहा है जब कांग्रेस उस हथियारबंद विमान का दाम पूछ रही है जो वास्तव में फ्रांस से बनकर 2019 में भारत आएगा। चूंकि इसमें सारे हथियार और मिसाइल्स लगे हुए होंगे लिहाजा इनकी कीमत अधिक होगी। लेकिन कितनी होगी, यह बताने को सरकार तैयार नहीं है, क्योंकि ऐसा करते ही चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मनों को पता चल जाएगा कि इसमें किस तरह के हथियार होंगे।

आरोप नंबर 2- HAL की अनदेखी की

दूसरा बड़ा आरोप यह है कि 36 राफेल लड़ाकू विमानों का सौदा करते समय भारत की अपनी सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की अनदेखी की गई। कांग्रेस ने अप्रैल 2015 का एक वीडियो जारी किया है जिसमें मोदी की फ्रांस यात्रा से 17 दिन पहले डेसॉल्ट एविएशन के चेयरमैन कह रहे हैं कि भारत में एचएएल की ओर से 108 राफेल लड़ाकू विमान बनाने का करार जल्द होने वाला है। उस समय के विदेश सचिव एस जयशंकर ने 8 अप्रैल को प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि एचएएल बातचीत में शामिल है। सवाल है कि फिर ऐसा क्या हुआ कि एचएएल इस सौदे से बाहर हो गई और भारत ने 108 के बजाय 36 लड़ाकू विमान खरीदने सौदा सीधे वहां की सरकार के साथ कर लिया?

सच्चाई क्या है? दरअसल डेसॉल्ट और एचएएल के बीच बात नहीं बनी। एचएएल की क्षमता को लेकर पहले 2013 में भी सवाल उठ चुका था। जब 2015 में दोबारा बातचीत हुई तो टेक्नॉलाजी ट्रांसफर को लेकर बात अटक गई। डेसॉल्ट एविएशन ने कह दिया कि अगर 108 लड़ाकू विमान भारत में एचएएल की वर्कशॉप में बनाए जाएंगे तो उनकी क्वालिटी की जिम्मेदारी वो नहीं लेगा। यानी कोई खराबी आई तो उसका नुकसान भारत को उठाना होगा। एचएएल के पास जो सुविधाएं हैं उनमें समय भी बहुत ज्यादा लगता जिससे डेसॉल्ट को एतराज था। जहां तक एक सरकारी कंपनी का हक़ छीनकर प्राइवेट कंपनी को देने की बात है, यह सरासर गलत है। दरअसल एचएएल को यूपीए के वक्त हर साल औसतन 10 हजार करोड़ रुपये के ऑर्डर दिए गए। जबकि मोदी सरकार ने उसे हर साल औसत 22 हजार करोड़ रुपये के ऑर्डर दिए। सेना के लिए कुल 83 लाइट कॉम्बेट एयरक्राफ्ट बनाने का 50 हजार करोड़ का ऑर्डर भी मोदी सरकार ने दिया है। कंपनी अभी सिर्फ 8 विमान ही बना रही है, लिहाजा उसकी क्षमता बढ़ाने के लिए और निवेश किए जाने की तैयारी है। यानी एचएएल के पास पहले से ही काफी काम है।

आरोप नंबर 3- सरकार ने अंबानी की मदद की

एक बड़ा आरोप है कि मोदी सरकार ने अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस डिफेंस इंड्रस्ट्रीज की मदद की और इसे राफेल बनाने वाली कंपनी डेसॉल्ट एविएशन से ऑफसेट कांट्रेक्ट दिलवाया। ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट एक तरह का आपसी हित का समझौता होता है, जिसमें सप्लाई करने वाली कंपनी वादा करती है कि एक तय अनुपात में सामान हथियार खरीदने वाले देश की कंपनियों से खरीदेगी।

सच्चाई क्या है? दरअसल फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के बयान के बाद इस आरोप को बल मिला। हालांकि खुद ओलांद अब कह चुके हैं कि यह दो कंपनियों का करार था इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं हो सकती। यह बात तकनीकी रूप से सही भी है। तो सवाल उठता है कि ओलांद ने यह बात क्यों कही कि भारत सरकार ने ही रिलायंस से सौदे के लिए दबाव डाला था? दरअसल अपने देश में ओलांद खुद इन आरोपों में फंसे हैं कि उनकी गर्लफ्रेंड ने अनिल अंबानी की एंटरटेनमेंट कंपनी में पैसा लगाया है। इसके बदले में उन्होंने अंबानी को यह सौदा दिलवाया। अब इस आरोप से अपना पल्ला झाड़ने के लिए उन्होंने इसके लिए भारत सरकार को जिम्मेदार ठहरा दिया। जबकि अनिल अंबानी से फायदा उन्होंने लिया है। वैसे भी ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट को समझना जरूरी है। ये नियम खुद यूपीए सरकार ने 2006 में बनाए थे। सारा हल्ला रिलायंस को लेकर है जबकि सच यह है कि उनके जैसी कुल 72 कंपनियों ने डेसॉल्ट के साथ समझौते किए हैं। इसके तहत इन 72 भारतीय कंपनियों को 3 अरब यूरो से अधिक का काम मिलेगा। इससे करीब 1 लाख रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। यानी देश में प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों को पहली बार विश्व की अग्रणी हथियार कंपनी के साथ काम करने का मौका मिलेगा। हो सकता है कि आगे चलकर इन्हीं में से कोई कंपनी इतनी बड़ी हो जाए कि दुनिया भर को वो अपने बनाए हथियार बेचने के काबिल हो जाए। जहां तक रिलायंस डिफेंस इंडस्ट्रीज का सवाल है इस बात के पूरे दस्तावेज सामने आ चुके हैं कि उसके और डेसॉल्ट के बीच पार्टनरशिप 2012 में ही हो गई थी। तब यह समझौता भारत को राफेल बेचने के लिए नहीं, बल्कि मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत हुआ था। उन दिनों ये कंपनी बड़े भाई मुकेश अंबानी के पास हुआ करती थी। बाद में पारिवारिक सुलह-सफाई में इसे छोटे भाई अनिल अंबानी को दे दिया गया। यह कहना गलत है कि ये कंपनी सौदे के ठीक पहले बनी थी।

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