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एक श्राप जो राहुल गांधी को कभी पीएम नहीं बनने देगा!

अपनी तमाम कमियों के बावजूद क्या राहुल गांधी वाकई कभी भारत के प्रधानमंत्री बन सकते हैं? यह सवाल बहुत सारे लोगों के मन में उठता होगा। यह जानना जरूरी है कि राहुल गांधी अपने परिवार के इकलौते सदस्य हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री बनने के लिए इतने पापड़ बेलने पड़ रहे हैं। उनसे पहले परिवार के सभी सदस्य बड़े ही आराम से और स्वाभाविक तरीके से प्रधानमंत्री की गद्दी पर विराजमान हो गए थे। अगर साधु-संतों की मानें तो राहुल गांधी दरअसल इस संघर्ष के लिए अभिशप्त हैं। वो अपने पूर्वजों को मिले एक श्राप का फल भुगत रहे हैं। हो सकता है कि आप इन बातों पर यकीन नहीं करते हों, लेकिन बीते दौर की इन बातों को जानकर आप भी मानने लगेंगे कि राहुल गांधी की किस्मत लिखी जा चुकी है और उनका अब कुछ नहीं हो सकता है।

क्या है ये पूरा मामला?

दरअसल 1966 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी को पहली बार हार का डर सताने लगा था। नेहरू और लालबहादुर शास्त्री की मौत के बाद इंदिरा प्रधानमंत्री बन तो गई थीं, लेकिन वो ज्यादा लोकप्रिय नहीं थीं। तब जीत के लिए उन्होंने हिंदू कार्ड चला और तब के मशहूर संत स्वामी करपात्री जी महाराज से आशीर्वाद लेने पहुंच गईं। करपात्री महाराज ने कहा कि वो उन्हें विजय का आशीर्वाद तभी देंगे जब वो देश में गोहत्या पर पूरी तरह से पाबंदी लगाने का वादा करें। इंदिरा गांधी ने फौरन इसे स्वीकार कर लिया। चुनाव में संत समाज ने इंदिरा गांधी का भरपूर समर्थन किया, लेकिन चुनाव जीतने के बाद इंदिरा करपात्री महाराज से किया अपना वादा भूल गईं। यह वो समय था जब कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिन्ह भी गाय और बछड़ा था। देश भर के संतों को लगने लगा कि इंदिरा ने सिर्फ वोट के लिए उन्हें बेवकूफ बनाया था। इसके बाद नवंबर 1966 में स्वामी करपात्रीजी महाराज की अगुवाई में संतों ने बोट क्लब पर अनशन शुरू किया। उनकी मांग थी कि वादे के मुताबिक इंदिरा गांधी गोहत्या पर पाबंदी लगाएं। लेकिन इंदिरा गांधी ने साफ शब्दों में इसे नामंजूर कर दिया। 7 नवंबर को लाखों की संख्या में भूखे-प्यासे संतों ने संसद की तरफ पैदल मार्च शुरू किया। उस समय के अखबारों के अनुसार दिल्ली में देशभर से कम से कम 10 लाख आम लोग और संत जमा हो चुके थे। संतों ने संसद का घेराव शुरू कर दिया। इसी दौरान पुलिस ने उकसावे वाली कार्रवाई शुरू कर दी, जिससे भीड़ में कुछ लोग उग्र हो गए। कुछ लोगों ने तब के कांग्रेस अध्यक्ष के कामराज के सरकारी मकान में आग लगा दी। इसके बाद पुलिस को मौका मिल गया। उन्होंने भूखे-प्यासे, निहत्थे संतों को न सिर्फ दौड़ा-दौड़ा कर मारा, बल्कि कई संतों को छाती और सिर में गोली मार दी गई। एक अनुमान के मुताबिक कम से कम 250 संतों की मौत इस गोलीबारी में हुई। यह संयोग था इसी दिन गोपाष्टमी का त्यौहार था। कई लोग यह भी दावा करते हैं कि मरने वालों की संख्या 5000 के करीब थी। सभी जानते हैं कि ये कार्रवाई इंदिरा गांधी के आदेश के बिना संभव नहीं थी। लेकिन इंदिरा गांधी ने इसके लिए तब के गृह मंत्री गुलजारी लाल नंदा को बलि का बकरा बनाकर उनका इस्तीफा ले लिया। यह समाचार विस्तार से पढ़ें: आज से नहीं 1966 से कांग्रेस पर है गोहत्या का पाप

करपात्री महाराज का श्राप

फायरिंग की इस घटना के बाद देशभर में संत समाज गुस्से से उबल रहा था। उन दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस बहुत मजबूत नहीं था। हिंदुओं की ऐसी कोई पार्टी नहीं थी। देशभर में सारे हिंदू कांग्रेस को ही वोट दिया करते थे। ऐसे समय में आंदोलन का नेतृत्व करने वाले करपात्री जी महाराज, जिन्हें स्वामी हरिहरानंद के नाम से भी जाना जाता था, ने हजारों संतों की भीड़ के सामने इंदिरा गांधी को श्राप दिया था कि “जिस तरह से साधु-संतों को निर्ममता के साथ घेरकर मारा गया उसी तरह एक दिन इंदिरा गांधी की भी मौत होगी।” स्वामी करपात्री ने यहां तक कहा कि इंदिरा गांधी के वंश का नाश हो जाएगा। उनकी आने वाली पीढ़ी देश पर राज करने के लायक नहीं होगी।” गोरखपुर से छपने वाली कल्याण पत्रिका में छपे लेख के अनुसार हजारों संतों ने स्वामी करपात्री महाराज के इस श्राप को समवेत स्वरों में दोहराया। इसे इत्तेफाक कहें या श्राप का असर, 31 अक्टूबर 1984 को जब इंदिरा गांधी को उनके ही अंगरक्षकों ने चारों तरफ से घेरकर गोलियां बरसाईं तो उस दिन भी गोपाष्टमी का पर्व था। उसके बाद उनके राजीव गांधी प्रधानमंत्री तो बन गए, लेकिन 5 साल बाद चुनाव हार गए। बाद में उनकी भी हत्या हो गई। तकनीकी रूप से देखें तो जिस समय श्राप दिया गया था तब राजीव गांधी पैदा हो चुके थे। उनके भाग्य में प्रधानमंत्री बनना लिखा था इसलिए वो बन भी गए। लेकिन करपात्री महाराज के श्राप के मुताबिक राहुल गांधी का प्रधानमंत्री बनना असंभव है। इस श्राप के लक्षण भी देखे जा सकते हैं। 2004 में सोनिया गांधी ने पहले राष्ट्रपति भवन में जाकर सरकार बनाने का दावा किया था। बीजेपी नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी के अनुसार- उस समय वो, पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और एनसीपी नेता शरद पवार ने राष्ट्रपति भवन जाकर एपीजे अब्दुल कलाम से इस पर विरोध जताया था और कहा था कि सोनिया गांधी जन्म से भारतीय नहीं हैं अगर वो उन्हें सरकार बनाने का मौका देंगे तो यह असंवैधानिक होगा। राष्ट्रपति कलाम ने उनकी दलील को स्वीकार कर लिया था। जब राष्ट्रपति भवन से न्यौता नहीं आया तब आनन-फानन में उन्होंने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री घोषित कर दिया।

संसद भवन की तरफ मार्च कर रहे साधु-संतों की एक तस्वीर।

राहुल गांधी की बदनसीबी

दरअसल राहुल गांधी अपने परिवार के इकलौते सदस्य हैं जिन्हें प्रधानमंत्री बनने के लिए इतने पापड़-बेलने पड़ रहे हैं। वरना अब तक बाकी सभी को यह पद थाली में सजा कर मिलता रहा है। नेहरू, इंदिरा और राजीव गांधी सीधे प्रधानमंत्री ही बने। 2012 में जब एक के बाद एक घोटालों के कारण मनमोहन सिंह सरकार की लोकप्रियता अपने निम्नतम स्तर पर थी, बताया जाता है कि तब सोनिया गांधी ने उन्हें हटाकर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की कोशिश की थी। उस समय अखबारों में यह रिपोर्ट भी छपी थी। लेकिन तब मनमोहन सिंह अड़ गए थे और उन्होंने इस्तीफा देने से मना कर दिया था। बाद में सोनिया ने कदम इसलिए खींच लिए क्योंकि उन्हें एहसास हो गया था कि 2014 का चुनाव जीतना नामुमकिन है। राहुल को प्रधानमंत्री बना भी दें तो उन पर हार का सारा दोष चला जाएगा। राहुल गांधी का पूरा राजनीतिक करियर नाकामियों की दास्तान है। जब से वो राजनीति में सक्रिय हुए उनकी पार्टी एक के बाद एक चुनाव हार रही है। अगर पंजाब जैसे एकाध राज्य जीते भी तो वो किसी बड़े लोकल नेता के चेहरे पर।

गोरक्षा के इस आंदोलन में सिख समुदाय के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था।

नरसंहार भूल गया हिंदू समाज

गोरक्षा के लिए 1966 में हुए उस महान आंदोलन में हिंदू समाज के सभी अंगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। कई सिख, जैन और बौद्ध धर्म गुरु इस आंदोलन में शामिल हुए थे। आम तौर पर जातियों में बंटा रहने वाला हिंदू समाज पहली बार एकजुट होकर गोमाता की रक्षा के लिए खड़ा हुआ था। इनमें बड़ी संख्या में गोपालक जातियां जैसे कि यादव, गुर्जर और जाट भी थे। इसके अलावा संत रविदास को मानने वाले, कबीरपंथी, निरंकारी और नाथ संप्रदाय के संत-महात्मा भारी संख्या में शामिल हुए। यह पूरी तरह जाति और ऊंच-नीच विहीन हिंदू समुदाय का आंदोलन था। तब पहली बार कांग्रेस ने सनातन धर्म की ताकत देखी थी। माना जाता है कि इसी के बाद इंदिरा गांधी ने कई ऐसे फैसले लिए जिससे हिंदुओं को जातियों और क्षेत्रीय पहचान के आधार पर तोड़ा जा सके। इसमें वो काफी हद तक सफल भी हुईं। उन दिनों इंदिरा गांधी सरकार की दहशत का आलम यह था कि उत्तर भारत के ज्यादातर अखबारों ने साधु-संतों पर फायरिंग की खबर तक नहीं छापी। जिन्होंने छापा भी उन्होंने भी मृतकों का आंकड़ा बस उतना बताया, जितना सरकार ने घोषित किया था। हालांकि कुछ विदेशी अखबारों और दक्षिण भारत के अंग्रेजी अखबारों में यह खबर प्रमुखता से छपी। इतना बड़ा नरसंहार होने के बावजूद कुछ साल में ही हिंदू समाज इस घटना को भूल गया। हिंदुओं का एक बड़ा वर्ग आज भी कांग्रेस को वोट देता है। अपने धर्म की रक्षा के लिए हिंदुओं की यह उदासीनता बड़ा दुर्भाग्य है। आज कांग्रेस पार्टी सत्ता के लिए जिस तरह तड़प रही है, उसके पीछे हिंदू समाज की जागृति से ज्यादा उन संतों का श्राप है जिन्हें 7 नवंबर 1966 को कीड़े-मकोड़ों की तरह भून दिया गया था। एक समाज के तौर पर हिंदुओं को यह घटना याद रखनी चाहिए और यह तय करना चाहिए कि स्वामी करपात्री जी महाराज का वो श्राप हमेशा प्रभावी रहे।

 

संदर्भ:
https://www.livemint.com/Leisure/wYecMX9AHS0kuD9WdozV9L/Opinion-Mrs-Gandhi-and-the-gau-rakshaks.html
http://thepatrika.com/NewsPortal/h?cID=r4ImQmgMRXc%3D
http://www.deshvani.in/news/editor/58024.html

Untold story of a Sage, Indira and the curse

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