तो क्या सुप्रीम कोर्ट में आज भी कांग्रेस की ही चलती है?

मोदी सरकार पर कांग्रेस के कुछ गंभीर आरोपों में से एक है कि वह महत्वपूर्ण संस्थाओं को नष्ट कर रही है। इन संस्थाओँ में सुप्रीम कोर्ट का नाम वह प्रमुखता से लेती रही है, लेकिन सच्चाई यह है कि मोदी सरकार को न सिर्फ़ उत्तराखंड में हरीश रावत की कांग्रेसी सरकार बहाल कराने वाले जस्टिस केएम जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट का जज स्वीकार करना पड़ा, बल्कि ऐसी ख़बर आ रही है कि उसे जस्टिस रंजन गोगोई को भी सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस स्वीकार करना पड़ेगा, क्योंकि चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने उनका नाम आगे बढ़ा दिया है। यहां दिलचस्प यह है कि जस्टिस रंजन गोगोई भी उन चार जजों में से एक थे, जिन्होंने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ प्रेस कांफ्रेंस की थी। यह एक ऐसा वाकया था, जिससे सुप्रीम कोर्ट की गरिमा तार-तार हो गई थी। कहा तो यह गया था कि चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा सुप्रीम कोर्ट की गरिमा गिरा रहे थे और इसके लिए कांग्रेस समेत कुछ विपक्षी दलों ने उनके खिलाफ महाभियोग लाने की कोशिश भी की, लेकिन देश में एक बड़ा तबका, जो कांग्रेस की राजनीति से इत्तिफ़ाक नहीं रखता, उसका मानना था कि सुप्रीम कोर्ट की गरिमा वस्तुतः उन चार जजों ने ही गिराई है, जिन्होंने आज़ाद भारत के इतिहास में पहली बार प्रेस कांफ्रेंस करके सुप्रीम कोर्ट के अंदरूनी झगड़ों को सामने ला दिया था।

जस्टिस रंजन गोगोई के साथ एक और विवाद जुड़ा केरल की सौम्या के रेप और मर्डर केस में। मामले के आरोपी गोविंदाचामी को निचली अदालत ने रेप और मर्डर दोनों का कसूरवार मानते हुए फांसी की सज़ा सुनाई थी, लेकिन हैरान करने वाला फैसला सुनाते हुए जस्टिस गोगोई की बेंच ने उसे हत्या के गुनाह से मुक्त करते हुए केवल रेप के लिए कसूरवार माना और उसकी फांसी को उम्रकैद में तब्दील कर दिया। ये अलग बात है कि सौम्या की मौत हुई ही थी उस रेप की घटना की वजह से। गोविंदाचामी ने ट्रेन में अकेली पाकर सौम्या से रेप करने की कोशिश की, जिससे बचने के लिए वह ट्रेन से कूद गई या गिर गई। इसके बाद वहशी गोविंदाचामी ने भी ट्रेन से छलांग लगाई और घायल सौम्या के साथ रेप किया। इस घटना के बाद सौम्या की मौत हो गई थी। अब ऐसे मामले में जब जस्टिस गोगोई की बेंच ने गुनहगार को हत्या के आरोप से मुक्त कर दिया, तो सुप्रीम कोर्ट के ही पूर्व जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने अपने ब्लॉग में इस फैसले की खुलकर आलोचना कर दी। फिर जस्टिस काटजू के ब्लॉग को रिव्यू पीटीशन मानकर उन्हें सुप्रीम कोर्ट में अपनी दलील रखने के लिए बुलाया गया और फिर जजों के खिलाफ टिप्पणी करने के लिए उन्हें अवमानना का दोषी माना गया, जिसके बाद जस्टिस काटजू को माफी मांगकर अपनी जान छुड़ानी पड़ी।

जस्टिस रंजन गोगोई असम के एक प्रभावशाली राजनीतिक परिवार से हैं। उनके पिता केशव चंद्र गोगोई कांग्रेस के बड़े नेता थे और कुछ समय के लिए असम के मुख्यमंत्री भी रहे। ऐसे में कांग्रेस पार्टी शायद मन ही मन खुश हो रही होगी, इस बात के बावजूद कि जजों को आम तौर पर राजनीति से दूर माना जाता है और माना जाना चाहिए भी। साथ ही, कांग्रेस की एक और मुराद पूरी होती नज़र आ रही है। कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से गुजारिश की थी कि अयोध्या मामले में फैसला 2019 के चुनावों के बाद सुनाया जाए। अब ऐसा लगता नहीं कि सुप्रीम कोर्ट से अयोध्या मामले में जल्दी ही कोई फैसला आने वाला है। ऐसे में, अगर मोदी सरकार रामभक्तों को संतुष्ट करना चाहेगी, तो उसके सामने संसद में बिल लाने अथवा अध्यादेश लाने के अलावा शायद ही कोई चारा बचे। और ज़ाहिर है, ऐसा करना आसान नहीं होगा। यानी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जबसे शिवभक्त हुए हैं, तबसे भगवान राम के सितारे फिर से गर्दिश में आ गए लगते हैं। बहरहाल, अगर जस्टिस रंजन गोगोई चीफ जस्टिस बनते हैं, तो उम्मीद यही की जानी चाहिए उनका कार्यकाल अच्छा रहेगा और सुप्रीम कोर्ट की खोई हुई गरिमा को बहाल कराने में वे कुछ सार्थक भूमिका निभाएंगे।

(वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन कुमार के फेसबुक पेज से साभार, लेख की हेडलाइन या तस्वीरों पर लिखी बातें लेखक के मूल विचार का हिस्सा नहीं हैं।)

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