गाय काटकर पाकिस्तान ज़िंदाबाद कहने वाले कौन हैं?

बकरीद के दिन पुलिस को सूचना मिली कि झारखंड के पाकुड़ जिले के डांगापाड़ा गांव में कुछ लोग गाय काटने वाले हैं। गोहत्या झारखंड में प्रतिबंधित है। पुलिस ने पहले गांववालों को समझाया। वो नहीं माने, तो पुलिस पूरी फोर्स के साथ उन्हें रोकने गई। मानने के बजाए गांववालों ने पुलिस पर ही बम और पत्थरों से हमला कर दिया। इस दौरान इलाके की मस्जिद से लाउडस्पीकर पर लोगों को उकसाया जा रहा था कि वो पुलिस से मोर्चा लें और उन्हें गांव में न घुसने दें। पुलिस पर सैकड़ों बम फेंके गए। कट्टे से फायर किए गए। जिससे डिविजन कमिश्नर समेत 20 के करीब पुलिसवाले घायल हो गए। सारे बवाल के बीच पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाए गए। पाकिस्तान का झंडा तक फहराया गया। ये सारी हिंसा और देशद्रोही मानसिकता का तमाशा स्थानीय मीडिया की मौजूदगी में हुआ।

पाकुड़ इलाके के एक गांव की ये घटना बेहद परेशान करने वाली है क्योंकि इसमें कोई 2-4 लोग नहीं, बल्कि गांव के सैकड़ों लोग शामिल थे। जिनमें बच्चों से लेकर औरतें तक शामिल हैं। जो पहले तो पाबंदी के बावजूद गाय काट कर पूरी व्यवस्था को चुनौती देते हैं। फिर रोकने पर न सिर्फ हमला करते हैं बल्कि पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं। अपना विरोध जताने के लिए पाकिस्तान के झंडे भी फहराते हैं। ये मामला साम्प्रदायिक घटना भर का नहीं, हिंदुस्तान के अंदर पाकिस्तान के बसे होने का मामला है। ये वो सोच है जो गाय को बहाना बनाकर बहुसंख्यक आस्था के प्रति अपनी नफरत दिखाती है। जो गाय की आड़ में पाकिस्तान की जयकार करती है। पाकिस्तान के झंडे फहराती है। गुस्से में पत्थर फेंकना समझ में आता है मगर एक घटना के गुस्से में क्या अचानक पाकिस्तान का झंडा सिलकर तैयार हो गया!

यह सोचने वाली बात है कि जो सोच बहुमत में होने पर एक गांव में पाकिस्तान बसा सकती है वो बहुमत होने पर देश का क्या हाल करेगी? इस्लामिक अतिवाद वहम नहीं, ये कड़वी सच्चाई है। बीमारी के लक्षण दिखने पर आप उसे कितना भी नज़रअंदाज़ कर लें, वो चली नहीं जाएगी। वो धीरे-धीरे आपको मार डालेगी। आप चाहें तो लक्षण बताने वाले डॉक्टर को नकारात्मक बात करने वाला मनहूस मान सकते हैं मगर वो सिर्फ लक्षण देखकर बीमारी बताता है। ये आप पर है कि आप उसे स्वीकार करते हैं या नहीं? घटना को कवर करने वाले स्थानीय पत्रकार संतोष गुप्ता ने फेसबुक पर लिखा है कि “पाकुड़ के महेशपुर की इस घटना को कवर करने के दौरान ऐसा लगा जैसे मैं कश्मीर में हूं। जिस प्रकार से आज तक केवल टीवी पर कश्मीरी पत्थरबाजों को देखता आया था, महेशपुर में वह लाइव लिखा। लंबे पत्रकारिता के करियर में यह एक नया अनुभव था। तारीफ करनी होगी पाकुड़ के एसपी शैलेन्द्र प्रसाद वर्णवाल की जो बार-बार अपने जवानों को बंदूक का नाल हवा में रखने की हिदायत दे रहे थे। उन्होंने सूझबूझ न दिखाई होती तो शायद कई लाशें बिछ जातीं।”

इस बीच पुलिस आरोपियों की गिरफ्तारी में जुटी है। हिंसा में शामिल कई मुसलमान लड़के इलाका छोड़कर भागे हुए हैं और घरों में सिर्फ महिलाएं और बच्चे हैं। पुलिस को शक है कि ज्यादातर हमलावर पड़ोसी राज्य बंगाल में भागकर छिप गए हैं, क्योंकि उन्हें भरोसा है कि ममता बनर्जी की सरकार उनके खिलाफ कुछ नहीं करेगी। फिलहाल पुलिस ने 45 लोगों को नामजद और करीब हजार अज्ञात लोगों को आरोपी बनाया है। शुरुआती जांच में इस पूरी हिंसा में इस्लामी संगठन पीएफआई का हाथ होने का शक है। यह बात भी सामने आ रही है कि ये पूरा इलाका सरकारी जमीन पर कब्जे से बसा हुआ है। गांव में बसे मुसलमान बांग्लादेशी और रोहिंग्या हैं। इनकी बोलचाल भी स्थानीय लोगों से अलग है। बीते 10-20 साल में इनकी आबादी इतनी तेजी से बढ़ी है कि अब हर जगह यही दिखाई देते हैं।

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