जानिए जगन्नाथ मंदिर में क्यों घुसना चाहते हैं गैर-हिंदू

क्या ओडिशा में पुरी के मशहूर जगन्नाथ मंदिर में गैर-हिंदू धर्म के लोगों को प्रवेश की छूट होनी चाहिए? यह सवाल अब सुप्रीम कोर्ट में पहुंच चुका है। अदालत ने इस मामले में संबंधित पक्षों की राय मांगी है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में जो याचिका दी गई है वो मृणालिनी पाधी नाम की एक हिंदू वकील की तरफ से दाखिल की गई है, लेकिन शक जताया जा रहा है कि इसके पीछे का असली दिमाग कोई और ही है। इसके साथ ही यह प्रश्न भी पूछा जा रहा है कि हिंदुओं के इस सबसे पवित्र स्थान में आखिर मुसलमान या ईसाई धर्म के लोग जाने के लिए इतने उतावले क्यों हैं? जगन्नाथ मंदिर हिंदुओं के चार धामों में से एक है और यह मंदिर बेहद चमत्कारी है। यहां पर ऐसी कई निशानियां मिलती हैं जो ईश्वरीय सत्ता की गवाही देती हैं। जाहिर है यह मंदिर सदियों से मुस्लिम हमलावरों की नजरों में खटकता रहा है। अंग्रेजों ने भी इस मंदिर में बहुत दिलचस्पी दिखाई, हालांकि हार मानकर उन्होंने खुद को इससे दूर ही रखा।

देश का सबसे चमत्कारी धर्मस्थल

जगन्नाथ मंदिर साक्षात ईश्वर का चमत्कार है। उसके आगे विज्ञान के सारे नियम फेल हो जाते हैं। मान्यता है कि यहां पर भगवान श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं। मंदिर के शिखर पर फहराने वाली ध्वजा दिखने में भले ही सामान्य सी हो, लेकिन इसकी खूबी है कि ये हमेशा हवा के विपरीत दिशा में लहराती है। अगर हवा पूरब की तरफ बह रही हो तो झंडा पश्चिम की तरफ लहराएगा। इसी मंदिर के परिसर में लगे दूसरे झंडे हवा के हिसाब से लहराते हैं, लेकिन मंदिर का मुख्य ध्वज इनके विपरीत लहरा रहा होता है। एक पुजारी मंदिर के 45 मंजिला शिखर पर लगे झंडे को रोज बदलता है। इसके लिए गुंबद पर उलटे चढ़ना होता है। ऐसी मान्यता है कि अगर किसी दिन मंदिर का ध्वज नहीं बदला गया तो ये 18 साल के लिए खुद ही बंद हो जाएगा। मंदिर के शिखर पर एक सुदर्शन चक्र लगा हुआ है। इसकी खूबी है कि इसे किसी भी कोने से खड़े होकर देखें तो ऐसा लगता है मानो उसका मुंह आपकी तरफ है। मंदिर का ध्वज और सुदर्शन चक्र पूरे पुरी शहर के हर कोने से साफ दिखाई देता है। दिन के किसी भी समय जगन्नाथ मंदिर के मुख्य शिखर की परछाई जमीन पर नहीं पड़ती।

मंदिर के आसपास चुंबकीय क्षेत्र

जगन्नाथ मंदिर के ऊपर से किसी पक्षी को उड़ते हुए आज तक नहीं देखा गया है। इसी तरह विमान भी मंदिर के ऊपर से उड़कर नहीं निकल पाते। यहां से गुजरने वाला विमान खुद-ब-खुद कुछ डिग्री मुड़ जाता है। यहां तक कि मंदिर के ऊपर जब ड्रोन कैमरे उड़ाने की कोशिश की जाती है तो वो भी मुख्य गुंबद के पास पहुंचने से थोड़ा पहले ही दूसरी दिशा में मुड़ जाते हैं। मंदिर के गर्भगृह का भू-चुंबकीय क्षेत्र इतना शक्तिशाली है कि कोई भी इसे पार करके निकल नहीं सकता। जगन्नाथ मंदिर के मुख्यद्वार से पहला कदम अंदर रखते ही आपको पास में बहने वाले समुद्र की लहरों की आवाज सुनाई देना बंद हो जाती है। गेट से जैसे ही आप एक कदम बाहर रखते हैं आपको फिर से समुद्र की लहरों के टकराने की तेज आवाजें सुनाई देने लगती हैं। दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने इसके पीछे का कारण जानने की कोशिश की, लेकिन कोई भी संतोषजनक जवाब नहीं दे पाया।

मंदिर के प्रसाद में भी है चमत्कार

जगन्नाथ मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए सात बर्तन एक-दूसरे पर रखे जाते हैं। यह प्रसाद मिट्टी के बर्तनों में लकड़ी पर पकाया जाता है। इस दौरान सबसे ऊपर रखे बर्तन का पकवान पहले पकता है फिर नीचे की तरफ से एक के बाद एक प्रसाद पकता जाता है। जबकि छूकर देखें तो ऊपर का बर्तन नीचे के मुकाबले काफी ठंडा होता है। मंदिर में हर दिन बनने वाला प्रसाद भक्तों के लिए कभी कम नहीं पड़ता, साथ ही मंदिर के पट बंद होते ही प्रसाद भी खत्म हो जाता है। प्रसाद के तौर पर बनने वाले अनाज का एक भी दाना बर्बाद नहीं होता है।

मंदिर के अकूत खजाने पर नज़र

जगन्नाथ मंदिर के मौजूदा स्वरूप का निर्माण साल 1174 में कलिंग के राजा अनंत वर्मन ने कराया था। करीब 4 लाख स्क्वायर फुट एरिया में बना ये मंदिर चहारदिवारी से घिरा हुआ है। कलिंग शैली के इस मंदिर में शिल्प और स्थापत्यकला का बेहतरीन नमूना देखने को मिलता है। मुख्य मंदिर वक्ररेखीय आकार का है और इसके चारों तरफ के मंदिर ऐसे दिखते हैं मानो किसी बड़े पहाड़ के आसपास की छोटी पर्वत चोटियां हों। जगन्नाथ मंदिर की ऐतिहासिकता उसके मौजूदा रूप से कहीं अधिक प्राचीन है। इस मंदिर का जिक्र ऋग्वेद से लेकर महाभारत युग के साहित्य तक में मिलता है। जगन्नाथ मंदिर अपने अकूत खजाने के लिए भी चर्चा में रहता है। इस बात के ऐतिहासिक दस्तावेज हैं कि मंदिर को महान सिख राजा रणजीत सिंह ने इतना सोना दान में दिया था, जितना उन्होंने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को भी नहीं दिया होगा। यही कारण था कि मुस्लिम हमलावरों की नजरों में जगन्नाथ मंदिर हमेशा खटकता रहा।

जगन्नाथ मंदिर पर हुए 18 हमले

भगवान जगन्नाथ के मंदिर को अपवित्र करने के मकसद से बीते हजार साल में यहां 18 बड़े हमले हो चुके हैं। 9वीं शताब्दी में राष्ट्रकूट राजाओं ने पुरी पर हमला किया था, लेकिन वो हमला मंदिर पर नहीं, बल्कि राजसत्ता को बदलने के लिए था। पहला मुस्लिम हमला 1340 में हुआ था, जब बंगाल के सुल्तान इलियास शाह ने यहां पर हमला किया था। उस हमले में मंदिर को काफी नुकसान हुआ था, लेकिन यहां की मूर्तियों को बचा लिया गया था। इसके 20 साल बाद फिरोज शाह तुगलक ने हमला किया। 1568 में यहां काला पहाड़ नाम के अफगान लुटेरे ने हमला किया था। बताते हैं कि वो दरअसल एक हिंदू था, लेकिन उसने इस्लाम कबूल लिया था। मंदिर को सबसे ज्यादा नुकसान उसी ने पहुंचाया। औरंगजेब के समय में भी इस मंदिर को अपवित्र करने की कोशिश हुई थी। आखिरी हमला अंग्रेजों के समय हुआ था।

इसलिए है गैर-हिंदुओं पर पाबंदी

बार-बार के हमलों का नतीजा हुआ कि जगन्नाथ मंदिर में गैर-भारतीय धर्म के लोगों के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई है। हिंदू, बौद्ध, सिख और जैन जैसे सनातनी परंपरा के धर्मों के लोग यहां बेरोकटोक आ जा सकते हैं। लेकिन मुसलमानों और ईसाइयों के लिए यह छूट नहीं है। अक्सर अफवाह उड़ाई जाती है कि मंदिर में किसी दलित को प्रवेश से रोका गया, लेकिन यह बात गलत है। जगन्नाथ मंदिर में जाति के आधार पर किसी तरह का भेदभाव नहीं होता। मंदिर के सेवायत इसे सुरक्षित रखने को अपना कर्तव्य मानते हैं। उन्हें लगता है कि जगन्नाथ मंदिर पर फिर से हमले की कोशिश हो सकती है, जिसे रोकना उनकी जिम्मेदारी है। ओडिया भाषा के धर्मशास्त्रों के अनुसार कलयुग के आखिरी चरण में मलिक नाम का कोई विदेशी राजा भगवान जगन्नाथ का हरण करके उन्हें अपने देश ले जाने की कोशिश करेगा। इसके अलावा कुछ गैर-हिंदू धार्मिक गुट भी जगन्नाथ मंदिर को अपवित्र करने के फिराक में हमेशा रहते हैं। यही कारण है कि यहां के लोग मंदिर की सुरक्षा को लेकर बेहद संवेदनशील हैं।

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