मदर टेरेसा भी बच्चे ही बेचती थीं, इसीलिए नोबेल मिला

मदर टेरेसा को लेकर भारत में बनाया गया भ्रम का माहौल अब टूट रहा है। उनकी संस्था मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी के रांची सेंटर में बच्चे बेचे जाने का मामला सामने आने के बाद पहली बार लोगों को पता चला है कि मानवता और समाज सेवा के नाम पर दरअसल क्या हो रहा था। यह सवाल उठ रहा है कि जिस तरह से बच्चों की कीमत लगाई जा रही थी, ये 2-3 नन का काम नहीं हो सकता। दरअसल पूरी संस्था इसके लिए एक नेटवर्क की तरह काम करती है। इस नेटवर्क को शुरू करने वाला कोई और नहीं, बल्कि शांति का नोबेल पुरस्कार पा चुकीं मदर टेरेसा थीं। मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी के कामकाज पर नज़र रखने वाले कुछ पत्रकार मदर टेरेसा का असली चेहरा सामने लाने की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन अब तक लोग उन पर यकीन नहीं करते थे।

यूरोप में भारतीय बच्चों की मंडी

भारतीय मूल के लेखक और फिजीशियन डॉक्टर अरूप चटर्जी ने सबसे पहले ये खुलासा किया था कि मदर टेरेसा दरअसल गरीब भारतीय परिवारों के बच्चों को पश्चिमी देशों में ले जाकर बेच रही हैं। उन्होंने इसकी पूरी जानकारी उन्होंने 2003 में आई अपनी किताब ‘मदर टेरेसा- द फाइनल वर्डिक्ट’ में दी है। किताब में उन्होंने मदर टेरेसा के आश्रमों की हालत और वहां की गतिविधियों की पूरी जानकारी दी है। साथ ही उन्होंने बच्चे बेचने की घटनाओं के बारे में मीडिया से मदद लेने की कोशिश की थी, लेकिन ईसाई मिशनरी और ऊपर से मदर टेरेसा से जुड़ा मामला होने के कारण मीडिया ने उन पर चुप्पी साध ली। सरकार और पुलिस की तरफ से भी मदर टेरेसा और उनकी संस्था को खुली छूट मिली हुई थी। 2016 में अरूप चटर्जी ने ‘मदर टेरेसा- द अनटोल्ड स्टोरी’ नाम से एक और किताब लिखी, जिसमें उन्होंने उन बच्चों के नाम तक लिखे हैं जिनको बिकते उन्होंने देखा। इसमें उन्होंने 1980 की एक घटना का ब्यौरा दिया है, जब मदर टेरेसा ने 7 साल के बच्चे सोनातन धर को फर्जी दस्तावेजों के आधार पर बेल्जियम के एक कैथोलिक ईसाई परिवार को 1 लाख 25 हजार रुपये में बेच दिया था। इसके ठीक एक साल पहले ही मदर टेरेसा को शांति का नोबेल पुरस्कार मिला था। इसके लिए बच्चे की दादी का अनुमति पत्र फर्जी तरीके से बनाया गया था। ये सीधे तौर पर चाइल्ड ट्रैफिकिंग यानी बच्चों की तस्करी का मामला था, जिसमें अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत बहुत कड़ी सजा मिलती है।
भारतीय मीडिया और सरकारों के पास मदर टेरेसा के असली धंधे की पूरी जानकारी थी, लेकिन सबने जानबूझकर आंखें बंद कर रखी थीं। यूरोप में बेचे जाने वाले कुछ भारतीय बच्चे गोद लेने के लिए होते थे, जबकि ज्यादातर किसी धन्नासेठ के लिए किडनी, आंख या लिवर ट्रांसप्लांट के काम आ गए। यह भी शक है कि कई बच्चे बाल यौन शोषण करने वालों ने भी खरीदे होंगे, क्योंकि बच्चों की कीमत इतनी कम थी कि उन्हें कोई भी आसानी से खरीद सकता था। कोलकाता के मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी में काम कर चुके एक शख्स ने बताया कि कई तस्वीरों में मदर टेरेसा जिन बच्चों को गोद में लिए दिख रही हैं, उनमें से कुछ आज कहां हैं कोई नहीं जानता। माना जाता है कि उन्होंने दुनिया के कुछ बेहद शक्तिशाली लोगों को भी बच्चे बेचे, जिसके बदले में उन्होंने उनको नोबेल पुरस्कार दिलवाया। (अरूप चटर्जी से बातचीत का वीडियो देखें नीचे)

बच्चों की कीमत फंड की शक्ल में?

जांच में यह बात भी सामने आई है कि जिन बच्चों को विदेशों में बेचा जाता था उनसे मिलने वाली रकम को विदेशी चंदा बताकर भारत लाया जाता था। मिशनरीज ऑफ चैरिटी को बीते 10 साल में मिशनरीज ऑफ चैरिटी के कोलकाता रीजन के लिए अकेले 9 अरब 18 करोड़ रुपये का विदेशी चंदा मिला। इस रीजन में झारखंड, पश्चिम बंगाल और बिहार की मिशनरीज ऑफ चैरिटी की संस्थाएं आती हैं। ये सारा चंदा एफसीआरए के तहत लाया गया है, जबकि इस कानून के तहत सिर्फ महिला सशक्तिकरण, मानवाधिकार और शिक्षा और समाज सुधार के क्षेत्र में काम करने वाले एनजीओ विदेशी फंड ला सकते हैं। झारखंड सरकार अब इस आधार पर संस्था की मान्यता रद्द करने जा रही है।

मिशनरी के सेंटरों पर छापेमारी जारी

उधर, रांची में मिशनरीज ऑफ चैरिटी के केन्द्रों पर छापेमारी शुरू हो चुकी है। बाराद्वारी के निर्मल हृदय, शिशु भवन और सोनारी के सहयोग विलेज में गई टीम ने फाइलों को खंगाला और यह जानने की कोशिश की कि वहां बच्चे किस तरह से आते हैं और यहां से कहां भेजे जाते हैं। किस तरह उन बच्चों को दूसरों को गोद दिया जाता है और कितनों को गोद दिया गया है। पुलिस ने अब तक बेचा गया एक बच्चा भी बरामद किया है। यह मांग भी हो रही है कि मिशनरीज ऑफ चैरिटी के इस पूरे रैकेट की जांच सीबीआई को दी जाए ताकि बीते 3-4 दशक में इसके क्रिया-कलापों की जांच की जा सके। यह भी गौर करने वाली बात है कि मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी सबसे ज्यादा बंगाल में सक्रिय है और चाइल्ड ट्रैफिकिंग के मामले में बंगाल ही देश में सबसे ऊपर है।

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