सुषमा स्वराज की ‘सियासी चाल’ में फंस गए हैं मोदी!

पासपोर्ट मामले पर उठे विवाद के बाद सुषमा स्वराज के तेवरों को लेकर सस्पेंस बना हुआ है। हर किसी के मन में सवाल है कि आखिर सुषमा स्वराज ने इस मामले में झूठ बोलने के बावजूद तन्वी अनस को पासपोर्ट क्यों दिया गया और अपने कर्तव्य का पालन करने के लिए एक ईमानदार अधिकारी को सज़ा क्यों दी गई? इतने सबके बावजूद बीजेपी चुप क्यों है और सरकार के कुछ अहम मंत्री सुषमा स्वराज की तुनकमिजाजी का बचाव क्यों कर रहे हैं? दरअसल इसके पीछे एक गहरी राजनीतिक साजिश है। बीजेपी के एक बड़े नेता ने न्यूज़लूज़ को इस पूरे घटनाक्रम पर कुछ ऐसी बातें बताई हैं जिन्हें जानकर आप हैरान रह जाएंगे। अपना नाम जाहिर न करने की शर्त पर उन्होंने बताया कि दरअसल ये पूरी साजिश 2019 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने की है। सुषमा स्वराज इस साजिश का चेहरा हैं और उनको परदे के पीछे से उन नेताओं का समर्थन मिल रहा है जो मोदी को पसंद नहीं करते हैं। साजिश की ये पूरी कहानी नीचे हम आपको सिलसिलेवार ढंग से बता रहे हैं। संबंधित रिपोर्ट: मोदी जी बीजेपी को ऐसे अहंकारी नेताओं से बचाइए

क्या है सुषमा स्वराज की चाल?

न्यूज़लूज़ को मिली जानकारी के मुताबिक सुषमा स्वराज पिछले कुछ समय से बड़ी सफाई के साथ मोदी सरकार की छवि बिगाड़ने में जुटी थीं। मोदी और बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को इसकी कुछ भनक समय रहते मिल गई थी। सुषमा ने कई विदेशी ईसाई धर्म प्रचारकों को भारत आने के लिए टूरिस्ट वीसा दिलवाए। इसी तरह मुस्लिम देशों से आने वाले कट्टरपंथी धर्मगुरुओं की भी उन्होंने भारत में बेरोकटोक एंट्री दिलाई। सुषमा की नीतियों का ही नतीजा है कि बीते 4 साल में भारत एशिया के इस पूरे इलाके में ईसाई मिशनरियों का हेडक्वार्टर बन गया है। अगर कोई ईसाई धर्म प्रचारक किसी खाड़ी देश में फंस जाता तो सुषमा स्वराज उसे निजी रुचि लेकर छुड़वातीं। ऐसी भी खबरें हैं कि इनके लिए उन देशों के कट्टरपंथी आतंकवादी संगठनों को छिपे तौर पर करोड़ों रुपये फिरौती भी दी गई। सुषमा ने पाकिस्तानी मरीजों के लिए भारत के दरवाजे खोल दिए और यह तय किया कि मरीजों की तीमारदारी के नाम पर आने वालों का कोई खास सिक्योरिटी चेक न हो। यह शक जताया जाता है कि पिछले कुछ दिनों में आईएसआई के कुछ एजेंट मरीजों की तीमारदारी के नाम पर भारत आए। यह दिखाई देता था कि वो पाकिस्तान और खाड़ी देशों में जाने वाले मुसलमानों की मदद के लिए कुछ ज्यादा ही सक्रिय हैं।

लखनऊ पासपोर्ट दफ्तर में तन्वी सेठ के विवाद ने सुषमा स्वराज को बैठे-बिठाए वो मौका दे दिया, जिसकी बुनियाद बनाने में वो लंबे समय से जुटी थीं। हमारे सूत्र के अनुसार बीजेपी शीर्ष नेतृत्व के पास इस बात की पक्की जानकारी है कि पासपोर्ट अफसर पर कार्रवाई का फैसला सुषमा स्वराज के ही इशारे पर लिया गया। साथ ही तन्वी सेठ और उसके पति को बुलाकर पासपोर्ट देने का आदेश भी सुषमा के दफ्तर से ही गया था। सच्चाई सामने आने के बाद लोगों ने फेसबुक और ट्विटर के जरिए पासपोर्ट विभाग और सुषमा स्वराज की आलोचना शुरू कर दी। कुछ लोगों ने उनके लिए अपशब्द भी इस्तेमाल किए। सुषमा ने इस मौके को फौरन लपक लिया। उन्होंने ऐसे जताया मानो उन पर हमले नरेंद्र मोदी के इशारे पर किए गए हों। सुषमा ने पासपोर्ट विभाग से जांच की औपचारिकता पूरी करवाई और पहले से तय फैसले के मुताबिक तन्वी और अनस सिद्धिकी को पासपोर्ट बाइज्जत वापस कर दिया। साथ ही पासपोर्ट अधिकारी विकास मिश्रा को दोषी मानते हुए उनकी सज़ा बरकरार रखी। वो भी तब जब मामले में कई चश्मदीदों ने बताया है कि विकास मिश्रा ने कोई बदसलूकी नहीं की थी। पासपोर्ट जारी करने के फैसले को सही साबित करने के लिए कई नियम रातों-रात बदल दिए गए। जबकि उन्हीं नियमों के तहत वर्तमान में कई लोगों के पासपोर्ट अटके हुए हैं। यानी जो नियम बदले गए वो सिर्फ तन्वी अनस उर्फ सादिया सिद्धिकी के लिए थे।

सवाल यह है कि ऐसा करके सुषमा क्या चाहती हैं? इसका जवाब है कि वो मोदी सरकार की छवि खराब करना चाहती हैं। साथ ही यह भी चाहती हैं कि समर्थकों के भारी विरोध के दबाव में आकर बीजेपी नेतृत्व उनके खिलाफ कोई कार्रवाई या कोई बयान दे दे, जिसको आधार बनाकर वो शहीद बन सकें। यानी उन्हें मोदी और शाह के नेतृत्व के खिलाफ अंदरूनी बगावत का मौका मिल जाए। जैसे कि अगर उन्हें मंत्री पद से हटाया जाता है तो वो आराम से मीडिया में आकर जो चाहे बोल सकेंगी। सुषमा की चाल यही थी कि उन्हें किसी तरह सरकार या बीजेपी से निकाल दिया जाए, जिसके बाद वो खुद को ‘असली बीजेपी’ कहते हुए लोकसभा चुनाव से पहले एक नई पार्टी स्थापित कर देंगी। इस नई पार्टी का नाम, झंडा और निशान भी बीजेपी से मिलता-जुलता रखने की तैयारी है। हमारे सूत्र का दावा है कि इसके लिए “भारतीय जनता पक्ष” या “भारतीय जनता पार्टी (सुषमा)” नाम पहले से सोचा जा चुका है। वो सारे सांसद जिनका लोकसभा चुनाव में टिकट कटने वाला है, या वो सारे नेता जो मोदी-शाह के दौर में खुद को उपेक्षित समझ रहे हैं वो आसानी से सुषमा के साथ आ जाएंगे और इस तरह से बीजेपी सीधे तौर पर दो टुकड़ों में बंट जाएगी। एक बीजेपी मोदी और शाह की होगी, जबकि दूसरी सुषमा की।

सुषमा के पीछे आडवाणी का हाथ

2019 से पहले बीजेपी को तोड़ने के इस पूरे प्लान के पीछे आडवाणी गुट का हाथ माना जा रहा है। खुद सुषमा और मुरली मनोहर जोशी मानकर चल रहे हैं कि उन्हें 2019 में टिकट नहीं मिलने वाला। उन्हें उम्मीद है कि उनके जैसे बागी नेताओं के अलावा कुछ राज्यों में बीजेपी का पूरा का पूरा संगठन उनके साथ आ जाएगा। इस तरह से 2019 लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बीजेपी को बहुत बड़ा झटका लगेगा। ज्यादातर जगहों पर संगठन में टूट-फूट और भितरघात की वजह से जीत सकने वाले उम्मीदवार मिलने मुश्किल हो जाएंगे। आडवाणी और सुषमा अपने पुराने वफादारों की मदद से यह जताएंगे कि मोदी और शाह की जोड़ी तानाशाही तरीके से काम कर रही थी और उन्होंने ही उन्हें निकलने को मजबूर कर दिया। हमारे सूत्र के मुताबिक ये सारी कहानी आडवाणी गुट के नेताओं ने पहले से प्लान कर रखी है।

मोदी को हराने के लिए ये है तैयारी

रणनीति के अनुसार बीजेपी का दूसरा गुट चुनाव में उम्मीदवार उतारेगा, जो ज्यादातर बीजेपी के पुराने जाने-पहचाने चेहरे होंगे। पार्टी का नाम, झंडा और चुनाव चिन्ह भी बीजेपी के जैसा ही होगा। उनके पोस्टरों पर अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी के अलावा श्यामाप्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय के चेहरे होंगे। इससे बीजेपी के वोटरों में भ्रम की स्थिति पैदा होगी और इसके कारण बीजेपी को लोकसभा चुनाव में भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। अगर कोई स्थिति ऐसी बनती है जिसमें किसी पार्टी के पास सरकार बनाने का बहुमत न हो तो सुषमा या आडवाणी प्रधानमंत्री पद पर तमाम छोटे दलों के समर्थन से अपना दावा ठोंक सकती हैं। उन्हें उम्मीद है कि खुद उनके गुट को भी कम से कम 40-50 सीटें मिल जाएंगी।

सुषमा की चाल पर मोदी की रणनीति

बीजेपी में मोदी समर्थक गुट सुषमा की इस चाल को अच्छी तरह समझ रहा है। लिहाजा रणनीति यही है कि उन्हें अलग होने का मौका ही न दिया जाए। इसी के तहत राजनाथ और गडकरी को सामने लाकर पासपोर्ट मामले में सुषमा का समर्थन करवाया गया। ये दोनों नेता सरकार का हिस्सा हैं। बीजेपी संगठन की तरफ से राम माधव को समर्थन में आगे लाया गया है। लेकिन गौर करने वाली बात है कि खुद मोदी या अध्यक्ष अमित शाह ने कभी इस मामले में एक शब्द भी नहीं बोला। पार्टी और सरकार में किसी ने सुषमा के खिलाफ एक शब्द भी बोला तो उन्हें फौरन बगावत करके शहीद बनने का मौका मिल जाएगा। सुषमा के समर्थन में बोलने के कारण बीजेपी के मंत्रियों और नेताओं को भी गुस्से का शिकार बनना पड़ रहा है। मोदी सरकार मानकर चल रही है कि पासपोर्ट का ये फर्जीवाड़ा आगे कभी भी सुधारा जा सकता है, लेकिन अभी बागी गुट के मंसूबों पर पानी फेरना ज्यादा जरूरी है। यह तय है कि 2019 लोकसभा चुनाव में आडवाणी गुट के तमाम नेताओं को कुछ नहीं मिलने वाला। तब अगर वो बगावत भी करेंगे तो बहुत देर हो चुकी होगी।

मोदी से क्यों नाराज हैं सुषमा स्वराज?

यह सवाल हर किसी के मन में आता है कि सुषमा स्वराज की नाराजगी आखिर क्या है? इसका जवाब यह है कि सुषमा स्वराज दरअसल आडवाणी गुट की हैं। 2014 चुनाव से पहले भी उन्होंने कभी पीएम पद के लिए मोदी के नाम का समर्थन नहीं किया। यहां तक कि उन्होंने प्रचार में भी ज्यादा हिस्सा नहीं लिया। इस गुट को पूरी उम्मीद थी कि मोदी को बहुमत नहीं मिलेगा, ऐसे में सर्वमान्य नेता के तौर पर उनका चांस लग जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सरकार बनी तो मोदी ने सुषमा को कैबिनेट में विदेश मंत्री का महत्वपूर्ण पद दिया। लेकिन वो बदला लेने के लिए सही समय की ताक में लगी रहीं। सुषमा की नाराजगी इसी बात से समझी जा सकती है कि ट्विटर पर इतनी सक्रिय होने के बावजूद उन्होंने कभी भी प्रधानमंत्री या नरेंद्र मोदी के ट्विटर अकाउंट को फॉलो नहीं किया। ऐसा करके वो खुलकर जताती रहीं कि वो मोदी को अपना नेता नहीं मानतीं। निर्मला सीतारमण और स्मृति ईरानी जैसी जूनियर नेताओं को अपने बराबर कैबिनेट रैंक दिए जाने से भी सुषमा कभी खुश नहीं थीं। यहां न्यूज़लूज इस बात को स्पष्ट करना चाहता है कि इस रिपोर्ट में दी गई जानकारियां सूत्रों पर आधारित हैं। इनके बारे में हमने उन नेताओं की कोई प्रतिक्रिया नहीं ली है जिनके नामों का जिक्र यहां पर किया गया है। उम्मीद है आने वाले समय में उनका पक्ष भी खुलकर सामने आएगा।

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