सलमान को बेल दी थी, अब कांग्रेसी बन गए जज साहब

राहुल गांधी के बायीं तरफ काले कोट में खड़े शख्स जस्टिस थिप्से हैं। उनके साथ खडे़ सज्जन एक तथाकथित पत्रकार हैं, जिनका नाम कुमार केतकर है। बायीं तरफ सलमान खान की तस्वीर उस दिन की है, जब वो पेशी के लिए कोर्ट गए थे।

न्यायपालिका और राजनीति के रिश्तों का एक नया मामला सामने आया है। हाई कोर्ट के जज रहे अभय थिप्से कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मंगलवार को मुंबई में थे, जहां पर जस्टिस अभय थिप्से ने उनसे मुलाकात की और उसके बाद वो औपचारिक रूप से कांग्रेस पार्टी के सदस्य हो गए। जस्टिस थिप्से कुछ समय पहले रिटायर हुए थे और उसके बाद से ही वो जमकर राजनीतिक बयानबाजी कर रहे थे। उन्होंने रिटायरमेंट के बाद बयान दिया था कि कुख्यात अपराधी सोहराबुद्दीन के एनकाउंटर के मामले में न्याय नहीं हुआ है। उनके इस बयान को मोदी विरोधी मीडिया ने हाथों हाथ था। हालांकि जस्टिस थिप्से सबसे ज्यादा चर्चित तब हुए थे, जब उन्होंने दोषी ठहराए और सज़ा सुनाए जाने के बावजूद सलमान खान को फटाफट जमानत देकर जेल जाने से बचा लिया था।

विवादित रहे हैं जस्टिस थिप्से!

जस्टिस थिप्से इलाहाबाद और बांबे हाई कोर्ट में जज रहते हुए कई हाई प्रोफाइल मामलों से जुड़े रहे। इनमें बेस्ट बेकरी मामला, सलमान खान को फटाफट जमानत मिलना प्रमुख हैं। गुजरात दंगों से जुड़े बेस्ट बेकरी केस में उन्होंने चार आरोपियों को दोषी करार दिया था। जबकि उस मामले में कई गवाह मुकर चुके थे। 2004 में बेस्ट बेकरी मामले की सुनवाई के दौरान उन्होंने मीडिया की खूब सुर्खियां बटोरी थीं। उन्होंने यह कहकर सनसनी फैला दी थी कि “मुझे एक चिट्ठी लिखकर कहा गया कि मैं एक हिंदू की तरह पेश आऊं।” जस्टिस थिप्से ने कई माओवादियों और आतंकवादियों को भी अपने करियर में जमानत दी। 5600 करोड़ के नेशनल स्टॉक एक्सचेंज घोटाले के आरोपी जिग्नेश शाह को जमानत भी जस्टिस थिप्से ने ही दी थी। उन्हें महाराष्ट्र के आतंकवाद विरोधी कानून मकोका का भी विरोधी माना जाता है। जज साहब यहां तक कह चुके हैं कि अदालतें मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव करती हैं।

कांग्रेस और न्यायपालिका का रिश्ता

अक्सर न्यायपालिका के राजनीतिकरण के आरोप लगते रहते हैं। खास तौर पर बीते 2-3 दशक में यह ट्रेंड काफी हद तक बढ़ा है। इस दौरान कई जजों ने रिटायर होने के बाद बाकायदा ऐसे पद लिए जिन्हें आमतौर पर राजनीतिक माना जाता है। लेकिन किसी हाई कोर्ट जज का इस तरह से किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण करने का संभवत: यह पहला मामला है। इसके साथ ही यह सवाल भी उठने लगे हैं कि हाई कोर्ट के न्यायाधीश के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान जस्टिस अभय थिप्से कितने निष्पक्ष रहे होंगे। खास तौर पर जिस तरह के विवादित फैसले उन्होंने सुनाए हैं वो इस शक को कुछ हद तक मजबूत ही करते दिखाई दे रहे हैं।

फिलहाल अब देखना है कि कांग्रेस पार्टी में शामिल होने के बाद अभय थिप्से किस तरह की राजनीतिक पारी खेलते हैं। क्या वो कांग्रेस पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ेंगे? या फिर कांग्रेस पार्टी उन्हें इस वफादारी का इनाम किसी और तरीके से देगी? वैसे जस्टिस थिप्से ग्रैंडमास्टर प्रणीव थिप्से के भाई हैं और खुद भी अच्छे शतरंज खिलाड़ी माने जाते हैं। कहा जा सकता है कि सियासत की शतरंज तो वो काफी वक्त से खेल रहे हैं, लेकिन असली सियासत में कितने कामयाब रहेंगे इस पर नजर रहेगी।

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