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जानिए देरी से क्यों चल रही हैं गाड़ियां, कब होगा सुधार

पिछले कुछ महीनों से ज्यादातर रेलगाड़ियां घंटों-घंटों की देरी से चल रही हैं। पहले ऐसा सिर्फ जाड़े के मौसम में होता था, लेकिन जब कोहरा छंटने के बाद भी रेलगाड़ियां देरी से चलती रहीं तो लोगों की नाराजगी बढ़ने लगी। मीडिया ने भी इस पर काफी हल्ला मचाया, लेकिन इस बात को छिपाते हुए कि रेलगाड़ियां देरी से क्यों चल रही हैं और ये स्थिति कब तक रहेगी। पहली बार भारतीय रेलवे ने ट्रेनों में देरी को लेकर स्थिति साफ की है। इसके मुताबिक रेलवे का पूरा नेटवर्क इन दिनों बड़े बदलाव से गुजर रहा है और लगभग आधा काम पूरा कर लिया गया है। बाकी काम भी ज्यादा से ज्यादा 6 से 8 महीने में पूरा कर लिया जाएगा। अभी हो रही दिक्कत बिल्कुल वैसे ही है जैसे सड़क बनने के कारण लोगों को कुछ समय परेशानी होती है। लेकिन जब सड़क बन जाए तो उनकी जिंदगी आसान हो जाती है। सरकार का अनुमान है कि इस साल सितंबर-नवंबर से रेलवे में यह बदलाव नजर आने लगेगा।

पूरे रेल नेटवर्क में सुधार जारी

इस समय रेलवे की पटरियों से लेकर सिग्नल सिस्टम और रेलवे ऑपरेशन की टेक्नोलॉजी तक को बदलने पर काम चल रहा है। ये काम एक साथ सारे ज़ोन में चल रहा है। कई जगहों पर रेल की पटरियां कई-कई साल से बदली नहीं गई हैं और उनमें क्रैक्स बन गए हैं। इन्हीं के कारण आए दिन छोटे-बड़े रेल हादसे हो रहे थे। चूंकि ज्यादातर रूट पर पटरियां बदली जा रही हैं इसलिए ज्यादातर गाड़ियां 6 से 8 घंटे तक देरी से चल रही हैं। दिल्ली-हावड़ा मेन लाइन पर मालगाड़ियों के लिए अलग पटरी बिछाने का काम भी जारी है। चूंकि मीडिया ट्रेनों में देरी को लेकर सच्ची तस्वीर जनता के आगे पेश नहीं कर रहा है, लिहाजा रेलवे ने फैसला किया है कि स्टेशनों पर यात्रियों को देरी का सही-सही कारण बताया जाएगा। इसके लिए कुछ स्टेशनों पर टीवी स्क्रीन भी लगाए जाएंगे, जिनमें दिखाया जाएगा कि किस-किस रूट पर क्या काम चल रहा है। साथ ही यात्रियों से माफी मांगी जाएगी कि नेटवर्क में सुधार के काम के चलते उन्हें असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।

रेलवे को ऐसे किया गया बदहाल

देश में 90 के दशक में एलएचबी यानी लिंक हाफमैन बुश टेक्नोलॉजी वाले कोच आ गए थे, लेकिन रेलवे पुरानी तकनीक के आईसीएफ कोच बनाता रहा। यानी नई तकनीक आने के बाद भी पुरानी तरह के डिब्बे बनाने का काम जारी रहा। क्योंकि जो वेंडर रेलवे को सामान सप्लाई करते हैं उनको उसके लिए नया निवेश करना पड़ता। उनका फायदा होता रहे इसके लिए पुरानी तरह के कोच रेलवे बनवाती रही और लोग हादसों में मरते रहे। यह बात सभी रेलमंत्रियों को भी पता थी, लेकिन वेंडरों की ताकतवर लॉबी और उनसे मिलने वाली मोटी रिश्वत के चलते किसी ने भी बदलाव की जरूरत नहीं समझी। मोदी सरकार ने आने के बाद सबसे पहले आईसीएफ कोच बनाने पर पाबंदी लगा दी। इस साल जून में आखिरी बार ऐसे डिब्बे का निर्माण होगा और आगे से सिर्फ एलएचबी कोच ही बनेंगे। इन कोच की खूबी होती है कि अगर हादसा हो भी जाए तो यात्रियों की जान-माल को कम से कम नुकसान होता है।

पहले चरण में 5000 किलोमीटर ट्रैक को अपग्रेड करने का काम चल रहा है। इसके बाद इन पर मौजूदा स्पीड से अधिक गति से गाड़ियां चल सकेंगी।

कंगाली से कमाऊ तक की यात्रा

दरअसल भारतीय रेलवे की आज जो हालत है उसकी बुनियाद 2004 के बाद से रखी गई। इस दौरान लालू यादव जैसे रेल मंत्रियों ने रेलवे को पूरी तरह कंगाल कर दिया। 2014 में जब मोदी सरकार ने सत्ता संभाला तो रेलवे की हालत इतनी खराब थी कि कर्मचारियों को वेतन देने तक के पैसे नहीं थे और कर्ज लेकर रोजमर्रा के खर्चे निकाले जा रहे थे। सरकार ने सबसे पहले रेलवे को आर्थिक संकट से निकाला और फिर सुधार का काम शुरू किया गया। हैरानी की बात है कि लूट के उस दौर में मीडिया ने कभी रेलवे को लेकर नकारात्मक रिपोर्ट नहीं दिखाई और अब जब सुधार का काम चल रहा है रेलवे के खिलाफ दुष्प्रचार भी जोरों पर है।

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