मोदी सरकार ने डूब चुके 83000 करोड़ रु और वसूले

देश के सरकारी बैंकों का अरबों रुपया लेकर हजम कर जाने वाले उद्योगपतियों के अच्छे दिन खत्म हो गए हैं। भूषण स्टील्स से करीब 56 हजार करोड़ रुपये की वसूली के बाद डर के मारे 21 सौ छोटी-बड़ी कंपनियों ने बैंकों का पैसा लौटा दिया है। ये रकम 83 हजार करोड़ रुपये के आसपास बैठती है। जिस तरह से भूषण स्टील्स कंपनी को सरकार ने टाटा को बेचकर उससे मिली रकम बैंकों को लौटा दी, उसके बाद कंपनियों में अफरातफरी मच गई। दरअसल मोदी सरकार ने 2016 में इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड बिल पास कराया था। इसे IBC के नाम से जाना जाता है। इसी कानून की दहशत ऐसी है कि जो कंपनियां बैंकों का करोड़ों रुपया लेकर लौटाने का नाम नहीं ले रही थीं, वो खुद पैसा जमा करने के लिए बैंकों के आगे लाइन में खड़ी हो गईं।

नए आईबीसी कानून का खौफ

मोदी सरकार ने आईबीसी कानून में संशोधन करके इंतजाम कर दिया था कि अगर किसी कंपनी पर नेशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल (एनसीएलटी) में कार्रवाई शुरू हो जाएगी तो वो नीलाम हो रही कंपनी के लिए बोली नहीं लगा पाएगा। अब तक ये कंपनियां अपनी ही नीलामी में सस्ती बोली लगाकर कंपनी को वापस हथिया लिया करती थीं। इससे बैंक बहुत मामूली रकम की ही वसूली कर पाया करते थे। नए कानून के तहत बैंक के लोन की तीन महीने की किस्त बंद होती है उस रकम को एनपीए घोषित कर दिया जाता है। जबकि पहले बैंक के अधिकारी और कंपनियां मिलीभगत करके लंबे समय तक इस रकम को एनपीए होने से बचाए रखती थीं। जिन 21 सौ कंपनियों ने हड़पी हुई रकम बैंकों को लौटाई है, उनमें से लगभग 98 फीसदी रकम 2014 से पहले यानी मनमोहन और सोनिया गांधी की सरकार के समय में दी गई थी। मोदी सरकार ने जब आईबीसी में संशोधन की प्रक्रिया शुरू की थी तो उद्योग जगत ने कड़ा विरोध किया था। क्योंकि एस्सार ग्रुप के रुइया, भूषण ग्रुप के सिंघल और जयप्रकाश ग्रुप के गौड़ जैसे नामी-गिरामी औद्योगिक घरानों को रेजॉलुशन प्रोसेस में भाग लेने से रोक दिया गया।

भूषण स्टील्स से भी हुई वसूली

अभी कुछ दिन पहले ही टाटा ग्रुप ने कर्ज में डूबी भूषण स्टील लिमिटेड कंपनी के 72 फीसदी हिस्से का अधिग्रहण कर लिया था। इस कंपनी पर करीब 40000 करोड़ रुपये का सरकारी बैंकों का कर्ज था। इस तरह से कंपनी अब टाटा के हाथ में चली गई और बैंकों को उनकी डूबी हुई रकम वापस मिल गई। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में नए IBC कानून के तहत ये पहला फैसला था। जिसमें इतना सख्त नतीजा आने से जनता का पैसा डकार कर बैठ चुके उद्योगपतियों की नींद हराम हो गई। कुछ महीने पहले ही नरेंद्र मोदी सरकार ने उन 12 कंपनियों के नाम सार्वजनिक कर दिए थे जिनके पास देश के बैंकों की डूबी हुई कुल रकम का चौथाई हिस्सा है। इसे सबसे प्राथमिकता वाला क्षेत्र मानते हुए मोदी सरकार ने एक-एक करके सबसे वसूली का काम शुरू कर रखा है।

किसके काम आएगी ये रकम

अक्सर कुछ लोग कहते हैं कि पैसा आ गया तो उससे जनता का क्या फायदा? दरअसल यह सोचना बिल्कुल गलत है। गरीबों के कल्याण और देश में बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए अरबों डॉलर की जरूरत है। देसी बैंकों के कंगाल होने कारण सरकार को इसके लिए विदेशी बैंकों का मुंह ताकना पड़ता है। ये सारी रकम अब देश में गरीबों के लिए योजनाओं में काम आएगी और बैंकों के बुरे दिन भी खत्म होंगी। इससे वो असली जरूरतमंदों को आसानी से पैसा दे सकेंगे।

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