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चीन का पत्ता कटा, मालदीव में भारतीय नौसेना तैनात

भारत के पड़ोसी देश मालदीव में पिछले दिनों आई राजनीतिक अस्थिरता के बाद एक बार फिर से भारत का प्रभुत्व स्थापित हो गया है। मीडिया में ऐसे दावे किए जा रहे थे कि कभी भारत के साथ सहयोग करके चलने वाला मालदीव भी अब हाथ से फिसल गया है और वहां पर चीन समर्थक सरकार आ गई है। कूटनीतिक मामलों के कई जानकार मालदीव को लेकर भारत सरकार की नीति पर भी सवाल खड़े कर रहे थे। लेकिन आखिरकार भारत सरकार का स्टैंड सही साबित हुआ है। मालदीव की समुद्री सीमा में भारतीय नौसेना की पहुंच फिर से स्थापित हो गई है। यह तय हुआ है कि हिंद महासागर के इस छोटे से देश की सुरक्षा का जिम्मा भारतीय नौसेना निभाएगी। इसके लिए वहां पर नौसेना का निगरानी जहाज आईएनएस सुमेधा तैनात किया जाएगा। मालदीव की सेना उसकी मदद करेगी। साथ ही नौसेना के मरीन कमांडो भी मालदीव भेजे जाएंगे।

फुस्स हुई चीन की दखलंदाजी

इसी साल जनवरी, फरवरी में मालदीव में राजनीतिक संकट उठ खड़ा हुआ था, जब वहां के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने पूर्व राष्ट्रपति नशीद और वहां की सुप्रीम कोर्ट के कुछ जजों को गिरफ्तार करवा दिया था। देश में आपातकाल लगा दिया गया। तब नशीद और सुप्रीम कोर्ट ने भारत से अपील की थी कि वो अपनी सेना भेजकर उनकी मदद करे। लेकिन भारत ने इससे इनकार कर दिया और कहा कि वो सैनिक के बजाय कूटनीतिक तरीके से मामला सुलझाने के पक्ष में है। मोदी सरकार के इस कदम की काफी आलोचना हुई थी और कुछ लोगों ने यहां तक कहा कि भारत समर्थक पूर्व राष्ट्रपति नशीद की मदद न करना आत्मघाती होगा। सरकार ने सीधी दखल के बजाय कूटनीतिक मोर्चों पर मालदीव सरकार पर दबाव बढ़ाया।

भारत की रणनीति रही कारगर

मालदीव केरल से समुद्र के रास्ते बेहद करीब है। दोनों के बीच बरसों पुराने सांस्कृतिक संबंध रहे हैं।  बीते कुछ समय से माना जा रहा था कि मालदीव में चीन की दखलंदाजी बढ़ रही है, जिससे भारत के लिए वहां मुश्किलें पैदा होने का अंदेशा था। जिस दौरान मालदीव में राजनीतिक संकट था, चीन ने बाकायदा भारत सरकार को चेतावनी दी थी कि वो वहां पर दखलंदाजी न करे। भारत ने उस पूरे तनाव के दौरान चुप्पी साधे रखी थी और वो रणनीति कामयाब होती दिख रही है। मालदीव किसी तरह से भारत विरोधी गतिविधियों का अड्डा न बनने पाए, इस पर नजर रखने के लिए नेवी के मरीन कमांडो और अधिकारी वहां पर हर समय तैनात रहेंगे। नौसेना के एडवांस्ड हेलीकॉप्टर भी हर समय मालदीव में मौजूद रहेंगे। साथ ही समुद्री सीमा की निगरानी के लिए इलाके में डोरनियर एयरक्राफ्ट भी भेजे जाने की संभावना है।

क्या है मालदीव का संकट?

मालदीव के राजनीतिक संकट की कहानी 2012 में पहले चुने हुए राष्ट्रपति मुहम्मद नशीद के तख्तापलट से जुड़ी हुई है। नशीद के तख्तापलट के बाद अब्दुल्ला यामीन राष्ट्रपति बने। उन्होंने चुन-चुनकर अपने राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाया। नशीद को 2015 में आतंकवाद के आरोपों में 13 साल जेल की सजा दे दी गई। लेकिन वो इलाज के लिए ब्रिटेन गए और वहां राजनीतिक शरण ले ली। मुहम्मद नशीद को भारत समर्थक माना जाता है। पिछले हफ्ते मालदीव की सुप्रीम कोर्ट ने नशीद समेत 9 राजनीतिक बंदियों को रिहा करने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अब्दुल्ला यामीन की पार्टी से बगावत करने वाले 12 सांसदों को भी बहाल करने का आदेश दिया। इन 12 सांसदों की सदस्यता बहाल होने के बाद यामीन सरकार अल्पमत में आ जाती और नशीद की पार्टी की अगुआई वाला संयुक्त विपक्ष बहुमत में आ जाता। लेकिन अब्दुल्ला यामीन ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मानने से इनकार कर दिया। सेना भी यामीन के साथ है। भारत ने कहा है कि मालदीव की अंदरूनी राजनीति में वो आगे भी दखल नहीं देगा, लेकिन राष्ट्रपति कोई भी हो उसे भारत के हितों के हिसाब से काम करना होगा। इसी के तहत नौसेना ने वहां पर अपनी सक्रियता बढ़ा दी है।

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