क्या मोदी वाकई काशी के प्राचीन मंदिर तुड़वा रहे हैं?

काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास के क्षेत्र को पुराना गौरव दिलाने और इसके आसपास के मंदिरों को अवैध कब्जों से मुक्त कराने का अभियान जोरशोर से चल रहा है। कुल 300 अवैध निर्माण इसके दायरे में हैं, जिनमें कई गेस्ट हाउस भी हैं। इनके मालिकों ने बचने के लिए गेस्ट हाउस बंद करके उनमें कुछ परिवारों को बसा दिया है ताकि मीडिया को दिखा सकें कि सरकार उन पर अत्याचार कर रही है। दुष्प्रचार की नीयत से ही पिछले दिनों अफवाह उड़ा दी गई थी कि इस रास्ते में पड़ने वाला नेपाली पशुपतिनाथ मंदिर भी तोड़ा जाएगा। इस मंदिर की देखरेख नेपाल सरकार करती है। मंदिर तोड़ने के नाम पर जो दावे किए जा रहे हैं उनकी सच्चाई आपको इसी लेख में हम बताएंगे।

कौन फैला रहा है झूठ?

दरअसल कांग्रेस के करीबी माने जाने वाले शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के उत्तराधिकारी स्वामी अविमुक्तानंद सरस्वती इस दुष्प्रचार अभियान में सबसे बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। हिंदू धर्म के प्रमुख गुरु होने के नाते उन्हें यहां के मंदिरों के संरक्षण की जिम्मेदारी निभानी चाहिए थी। इसके बजाय वो इन अवैध निर्माणों को बढ़ावा देने में जुटे हैं। उन्होंने अपने साथ काशी के कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों और राजनीतिक दलों को भी शामिल कर लिया है। इनमें संकट मोचन मंदिर के महंत का परिवार भी हैं, जिस पर राजीव गांधी के समय शुरू हुई गंगा सफाई योजना के नाम पर आए करोड़ों रुपये हजम करने का आरोप है। संकट मोचन मंदिर की स्थापना खुद गोस्वामी तुलसीदास ने हिंदू धर्म की रक्षा के लिए की थी। अब महंत का परिवार हर साल यहां पर संकटमोचन महोत्सव करवाता है, जिसमें पाकिस्तानी गायकों को बुला कर गजलें गवाई जाती हैं। वो कांग्रेस पार्टी से अपनी नजदीकियों के लिए भी जाने जाते हैं। हालांकि उन्होंने पीएम मोदी से नजदीकी बनाने की भी पूरी कोशिश की, लेकिन उनके इतिहास को ध्यान में रखते हुए मोदी ने उन्हें ज्यादा भाव नहीं दिया।

बिजली चोरी भी बड़ा कारण

काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास गलियों में ज्यादातर दुकानों, मकानों, गेस्टहाउसों में अवैध बिजली इस्तेमाल हो रही थी। मोदी सरकार ने पूरे इलाके में बिजली के तारों को अंडरग्राउंड करवा दिया है। जिससे कंटिया डालकर बिजली चोरी का धंधा बंद हो गया। पहले इस इलाके में बिजली का ट्रांसमिशन लॉस 45 फीसदी तक था, जो अब कम होकर 10 प्रतिशत के भी नीचे आ गया है। लोकल लोगों के मुताबिक मोदी सरकार से नाराजगी का ये बहुत बड़ा कारण है। इसका सबसे बड़ा नुकसान गलियों और घाटों में रेस्टोरेंट चलाने वालों को हुआ है। ये महज इत्तेफाक नहीं है कि इनमें से ज्यादातर कांग्रेस पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता या पदाधिकारी हैं। वो अपने रेस्टोरेंट में अंडे और चिकन, मटन जैसी चीजें बेचते हैं।

हो रहा है मंदिरों का उद्धार

तस्वीर-1 फिलहाल सारे विरोधों और बाधाओं के बावजूद अवैध निर्माण हटाने का काम जारी है। नीचे आप देख सकते हैं कि नए अवैध निर्माण को किस सफाई के साथ तोड़कर भगवान की प्राचीन प्रतिमा को अलग किया जा रहा है। इस मंदिर की पहले की तस्वीर इसी लेख में हमने ऊपर पोस्ट की है। अब यहां वो प्राचीन मंदिर अपनी पुरानी गरिमा के अनुरूप तैयार किया जाएगा।

तस्वीर-2 नीचे की तस्वीर में आप मंदिर के जिस गुंबद को देख रहे हैं वो कुछ वक्त पहले तक चारों तरफ से अवैध निर्माणों से घिरा हुआ था। बिजली के तारों का जाल भी हटाया जा चुका है। जो गेस्ट हाउस इससे सटाकर बनाया गया था उसमें मांसाहारी भोजन और शराब परोसी जाती थी। जिन लोगों ने इस मंदिर को हड़पा था वो कांग्रेस पार्टी के पदाधिकारी हैं और इन दिनों पाथवे प्रोजेक्ट के खिलाफ आंदोलन चला रहे हैं।

तस्वीर-3 नीचे आप देख सकते हैं कि कैसे अवैध निर्माण तोड़ने के बाद पीछे प्राचीन मंदिर पहली बार लोगों को नज़र आया। आगे मकान बनाकर मंदिर का रास्ता बंद कर दिया गया था।

तस्वीर-4 नीचे टिन शेड में छिपे जिस मंदिर को आप देख रहे हैं उसके चारों ओर के अवैध निर्माण को तोड़कर मंदिर को मुक्त कराया जा चुका है। 

ये महज कुछ तस्वीरें हैं जो हमने स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता शैलेश पांडेय से साभार के तौर पर ली हैं। वो और उनके साथी काशी का गौरव दोबारा स्थापित करने के इस अभियान को बदनाम करने की कोशिशों के खिलाफ मुहिम छेड़े हुए हैं।

कैसे-कैसे झूठ फैलाए जा रहे हैं इसकी मिसाल के तौर पर नीचे की तस्वीर आप देख सकते हैं, इसमें जिन मूर्तियों को दिखाया गया है वो कुछ साल पहले लाकर यहां पर लगाई गई थीं, ताकि मंदिर की आड़ में पीछे रेस्टोरेंट का कारोबार बेरोकटोक चलता रहे। प्रशासन ने निकाली गई इन मूर्तियों को पूरे सम्मान के साथ रखवाया है, लेकिन इनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर फैलाकर लोगों में गलतफहमी पैदा करने की कोशिश जोर-शोर से चल रही है।


अयोध्या के राम मंदिर के अलावा काशी विश्वनाथ वो दूसरा मंदिर है जिसके प्राचीन गौरव को वापस बहाल करने की लड़ाई चल रही है। लेकिन जिस तरह से इस गंगा पाथवे प्रोजेक्ट को लेकर विवाद पैदा करने की कोशिश की जा रही है, वो इशारा करता है इस मामले में अंदर ही अंदर राजनीतिक साजिशें भी जोरों पर चल रही हैं।

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