जानिए क्यों हजारों साल से अमर और अडिग है काशी?

भगवान शिव की नगरी काशी को विश्व का सबसे प्राचीन शहर कहा जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस शहर की सबसे बड़ी विशेषता क्या है? दरअसल ये एक ऐसा रहस्य है जो समय के साथ भुला दिया गया। इस रहस्य के बारे में हम आपको बताएं, उससे पहले ये जिक्र जरूरी है कि जब एथेंस को बसाने के बारे में सोचा भी नहीं गया था, उस समय काशी का अस्तित्व था। जब रोम नाम की कोई चीज लोगों के दिमाग में भी नहीं थी, उस वक्त भी काशी था। जब मिस्र की सभ्यता नहीं थी, काशी तब भी था। काशी, जिसका दूसरा नाम बनारस है, इतना ही प्राचीन है। इतने लंबे दौर में जब तमाम सभ्यताएं मिट गईं काशी आज भी अपनी जगह पर है। इसके पीछे कारण है कि इस शहर को एक यंत्र के रूप में बसाया गया है। ये यंत्र सूक्ष्म और दीर्घ के बीच एकात्म पैदा करता है।

सौरमंडल की तरह काशी का डिजाइन

काशी की रचना सौरमंडल की तरह की गई है, क्योंकि हमारा सौरमंडल कुम्हार के चाक की तरह है। इसमें एक खास तरीके से मंथन हो रहा है और ऐसा ही मंथन इस मानव शरीर में भी चलता रहता है। सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी सूर्य के व्यास से 108 गुनी है। इन अनुपातों को ध्यान में रखा गया है। जिस तरह सौरमंडल में सभी ग्रहों को सूरज से ऊर्जा मिलती है उसी तरह काशी के केंद्र में विश्वनाथ मंदिर है। इसके चारों तरफ परिक्रमा के पांच मार्ग हैं। जो दरअसल ऊर्जा के अलग-अलग स्तर हैं। इस शहर की शाश्वतता के पीछे भी इन्हीं को कारण माना जाता है। ये पांचों स्तर पांच तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं। चौथे परिक्रमा घेरे को पंच क्रोशा कहते हैं। इसके साथ जो रास्ता बनाया गया है उसे पंचक्रोशी मार्ग कहा जाता है। इसकी कुल लंबाई 50 मील के करीब है। इसी तरह सबसे बाहरी परिक्रमा घेरे को चौरासी क्रोशी कहते हैं। इसकी लंबाई 168 किलोमीटर है। यानी ब्रह्मांड की संरचना से संपर्क के लिए यहां एक सूक्ष्म ब्रह्मांड की रचना की गई है। इन दोनों चीजों को आपस में जोड़ने के लिए 468 मंदिरों की स्थापना की गई। मूल मंदिरों में 54 शिव के हैं और 54 शक्ति या देवी के हैं। अगर मानव शरीर को भी हम देंखे तो उसमें आधा हिस्सा पिंगला है और आधा हिस्सा इड़ा। दायां भाग पुरुष का है और बायां हिस्सा नारी का। यही वजह है कि शिव को अर्धनारीश्वर के रूप में भी दर्शाया जाता है, आधा हिस्सा नारी का और आधा पुरुष का।

मानव शरीर से प्रेरित है शहर का नक्शा

सौर मंडल के साथ-साथ काशी की शहर योजना में मानव शरीर से भी प्रेरणा ली गई है। यहां 468 मंदिर बने हैं। चंद्र कैलेंडर में 13 महीने होते हैं। ये 13 महीने और 9 ग्रह, चार दिशाओं में या आकाश तत्व को छोड़ बाकी चार मूल तत्व। इस तरह से 13, नौ और चार को गुणा करें तो 468 आता है, जितने मंदिर यहां बनाए गए हैं। मानव के शरीर का 72 फीसदी हिस्सा पानी होता है, 12 फीसदी पृथ्वी तत्व, 6 फीसदी वायु तत्व और 4 फीसदी अग्नि तत्व होता है। बाकी का 6 फीसदी आकाश तत्व होता है। सभी यौगिक तंत्रों का जन्म एक खास विज्ञान से हुआ है, जिसे भूतशुद्धि कहते हैं। इसका अर्थ है अपने भीतर मौजूद तत्वों को शुद्ध करना। इस तरह भूतशुद्धि के आधार पर इस शहर की रचना हुई। यहां पर बने 468 मंदिरों में सप्तऋषि पूजा हुआ करती थी और इससे इतनी जबर्दस्त ऊर्जा पैदा होती थी कि हर कोई इस जगह आने की इच्छा रखता था। जिसका जन्म भारत में हुआ है, उसका तो सपना होता है काशी जाने का। यह जगह सिर्फ आध्यात्मिकता का ही नहीं, बल्कि संगीत, कला और शिल्प के अलावा व्यापार और शिक्षा का केंद्र भी बना। इस शहर ने देश को कई प्रखर बुद्धि और ज्ञान के धनी लोग दिए हैं। अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था- “आधुनिक विज्ञान भारतीय गणित के आधार के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता” यह गणित बनारस से ही आया।

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