गोदी मीडिया बोलने वाले खुद सोनिया की गोदी में हैं!

दायीं तस्वीर वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन कुमार की है। ये लेख उनके फेसबुक पेज से साभार लिया गया है।

पत्रकारिता को सरकार का कितना विरोध करना चाहिए, कितना समर्थन करना चाहिए, विपक्ष के प्रति उसका रवैया किन परिस्थितियों में कैसा होना चाहिए, मर्यादा का बिन्दु क्या है- इन विषयों को स्पष्ट करने के लिए समय मिलते ही एक विस्तृत लेख लिखूंगा, जिससे भारत में पत्रकारिता के दायित्वों की अवधारणा पर नई रोशनी डाली जा सके। लेकिन तब तक यह मत भूलिए कि जिन लोगों ने गोदी मीडिया का जुमला उछाला है, वे स्वयं सोनिया गांधी और राहुल गांधी (कांग्रेस) की गोदी में बैठे हैं। बीच में अरविंद केजरीवाल की गोदी में भी बैठे थे, क्योंकि विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक, अरविंद केजरीवाल ने उन्हें लोकसभा का टिकट अथवा राज्यसभा की सीट का लालच दिया था। मैं जो कह रहा हूं, वह कोई टॉप सीक्रेट भी नहीं है और दिल्ली विधानसभा चुनाव में लोग उसे महसूस भी कर चुके हैं। यह भी पढ़ें: प्रिय रवीशजी, पत्रकारिता के आलोकनाथ मत बनिए

2014 से पहले आप किस तरफ थे?

अगर गोदी मीडिया के शाब्दिक अर्थ पर जाएं, तो यह हमेशा से रहा है और हमेशा रहेगा। यह कोई आज की पैदाइश नहीं है। सभी पार्टियों की सरकारों का अपना-अपना गोदी मीडिया होता है। कांग्रेस का गोदी मीडिया सॉफिस्टिकेटेड तरीके से काम करता रहा है और संदेह न हो, इसके लिए वामपंथ के छद्म आवरण में कांग्रेसियों द्वारा संचालित रहा है। भारत ने बार-बार देखा है कि कभी इमरजेंसी, तो कभी डेफेमेशन बिल के ज़रिए कांग्रेस ने गैर-गोदी मीडिया को प्रताड़ित करने की कोशिश की है। गोदी मीडिया का जुमला उछालने वाले यह भी कहते हैं कि पत्रकारिता हमेशा सत्ता के विपक्ष में होती है, लेकिन जब कांग्रेस की सत्ता आती है, तो वे यह पाठ भूल जाते हैं। जब कांग्रेस की सत्ता थी, तब भी वे भाजपा का ही विरोध करते थे और इसके लिए जिस 2002 के गुजरात दंगे को आधार बनाते थे, उसकी तुलना में 1984 का सिख विरोधी दंगा किसी भी लिहाज से अधिक बड़ा, वीभत्स, एकतरफा और असली अल्पसंख्यक के ख़िलाफ़ प्रायोजित था।

तो क्या कांग्रेस को सत्ता सौंप दें?

सत्ता की समालोचना तो समझ में आती है, लेकिन क्या पत्रकारिता को कसम खाकर हर वक्त हर हालत में सत्ता का विरोध ही करना चाहिए? अगर इस थ्योरी को सही मान लिया जाए, तो देश में मीडिया कभी भी किसी भी सरकार को काम ही नहीं करने देगा। क्या पत्रकारिता को गुण-दोषों के आधार पर सत्ता या विपक्ष के विरोध या समर्थन का स्टैंड लेना चाहिए या नियम बांधकर अनिवार्यतः सत्ता का विरोध करना चाहिए? पत्रकारिता को हमेशा सरकार के विरोध में होना चाहिए- यह एक ऐसा विषय है, जिसपर वामपंथी विचारकों ने काफी अंधेरा कायम कर रखा है। इसकी वजह यह है कि वामपंथी स्वयं कभी केंद्र की सत्ता में नहीं रहे। वामपंथियों द्वारा कायम किए गए इस अंधेरे में एक दीया जलाने की ज़रूरत है, वरना सही पत्रकार बदनाम किए जाते रहेंगे और वास्तविक गोदी मीडिया वाले गोयनका पुरस्कार मैनेज कर-करके “तुम मुझे पीर कहो, मैं तुम्हें मुल्ला कहूं” के आधार पर अपने साम्राज्य का विस्तार करते रहेंगे। चलते-चलते एक सवाल भी छोड़ रहा हूं। जिन्होंने 60 साल राज किया और जिनके राज के पापों की छाया से हम आज तक उबर नहीं पाए हैं, क्या केवल मौजूदा सत्ता (10 साल) के विरोध के नाम पर हम उनके प्रति सॉफ्ट हो जाएं और एक बार फिर से उन्हें सत्ता में आ जानें दें?
(वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन कुमार के फेसबुक पेज से साभार, यूट्यूब पर उनका वीडियो चैनल भी आप देख सकते हैं।)

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