नेहरू की गलती से आज चीन में है कैलाश मानसरोवर

राहुल गांधी ने कहा है कि वो कर्नाटक चुनाव के बाद कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर जाएंगे। ऐसा वो शायद खुद और अपनी कांग्रेस पार्टी की हिंदू विरोधी छवि को बदलने के लिए कर रहे हैं। लेकिन राहुल गांधी के मुंह से कैलाश मानसरोवर शब्द सुनकर हिंदुओं का वो जख्म ताजा हो गया जो खुद उन्हीं के नाना जवाहरलाल नेहरू ने दिया है। अभी कैलाश मानसरोवर चीन के कब्जे वाले तिब्बत में पड़ता है। वहां जाने के लिए चीन का वीज़ा लेना जरूरी होता है। 1947 में जब देश को आजादी मिली थी तब यह मुद्दा उठा था कि कैलाश मानसरोवर ऐतिहासिक रूप से भारत का हिस्सा रहा है और उसे भारत में मिला लिया जाना चाहिए। उस दौर में चीन की सेना बहुत कमजोर थी और भारत ऐसा आसानी से कर सकता था। लेकिन नेहरूजी की नीतियों के कारण ऐसा नहीं हो सका।

नेहरू की मूर्खता से गया कैलाश

आजादी के वक्त का इतिहास और संसद में हुई बहसों के दस्तावेज इस बात के गवाह हैं कि कैलाश मानसरोवर ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से भारत का हिस्सा रहे एक बड़े इलाके को नेहरू ने चीन को दे दिया। यह बात सही है कि कैलाश मानसरोवर करीब हजार साल से भारत के किसी नक्शे का हिस्सा नहीं रहा। आज जैसे नेपाल है, वैसे ही तिब्बत देश हुआ करता था, जिसमें कैलाश मानसरोवर पड़ता था। लेकिन उससे पहले के प्राचीन भारत में तिब्बत नाम की कोई जगह नहीं थी। वो हिस्सा भी भारतीय राजाओं के अधीन था। बाद में जब मुगल और अंग्रेज आए तो उनको उस पहाड़ी इलाके में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी। अंग्रेजों के जाने के बाद 1950 में चीन ने तिब्बत पर हमला करके उसे अपने कब्जे में ले लिया। उस समय वहां पर भारतीय सेना इतनी मजबूत थी कि चाहती तो तिब्बत की सुरक्षा के लिए चीन की सेना का मुकाबला कर सकती थी। लेकिन नेहरू ने चीन को मित्र देश मानते हुए ऐसा नहीं होने दिया। नेहरू ने बस इतना किया कि जब दलाई लामा और उनके समर्थकों को चीनी सेना ने खदेड़ा तो भारतीय सेना उन्हें अपनी सुरक्षा में भारत ले आई। चीन ने भले ही तिब्बत पर कब्जा कर लिया था, लेकिन उसकी सेना उतनी मजबूत नहीं थी। नेहरू चाहते तो कैलाश मानसरोवर को छुड़ा सकते थे। लेकिन उन्होंने इसकी जरूरत ही नहीं समझी।

संसद में भी जलील हुए थे नेहरू

1962 में चीन युद्ध के बाद संसद में देहरादून के सांसद महावीर त्यागी ने नेहरू से पूछा था कि “आपके देखते ही देखते चीन ने हमारी 72 हजार वर्गमील जमीन पर कब्जा कर लिया। आप उसको कब वापस दिला रहे हैं?” इस पर नेहरू ने जो बयान दिया वो आज तक लोग याद करते हैं। उन्होंने कहा कि “जो जमीन चली गई, वो चली गई। वैसे भी उस इलाके में घास का तिनका तक नहीं उगता।” इससे भड़क कर महावीर त्यागी ने अपना गंजा सर नेहरू को दिखाया और कहा, “यहां भी कुछ नहीं उगता तो क्या मैं इसे भी कटवा दूं”। नेहरू के पास इसका कोई जवाब नहीं था और वो अपना मुंह सा मुंह लेकर चले गए। उस दौर में भी यह चर्चा होती थी कि भारत को कम से कम कैलाश मानसरोवर का क्षेत्र मुक्त कराने की कोशिश करनी चाहिए। यह देश का दुर्भाग्य था कि बल्लभ भाई पटेल का 1950 में निधन हो गया और नेहरू पर यह दबाव बनाने वाला कोई नहीं था कि चीन अगर तिब्बत को हड़प सकता है तो वो आने वाले समय में भारत के लिए भी संकट बनेगा।

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