जानिए हिंदुओं की आस्था पर हमले के पीछे क्या खेल है

गौरी लंकेश याद है? उसकी हत्या की आड़ में हिंदू धर्म और हिंदू संगठनों को काफी बुरा भला कहा गया था। जैसे ही पता चला कि हत्यारा तो उन्हीं का आदमी है, सारे ईमान वाले बिल में घुस गये। इसे ही कूटनीतिक लड़ाई कहते हैं। वार करो और फिर पीछे हट जाओ। ताकत से या फिर षडयंत्र से, नियम से हो या धोखे से हो, कैसे भी हो बस जंग जीतनी है। फिर पराजित राज्य की बच्चियों महिलाओं को माले गनीमत मानकर आपस में बांट लेना है, यही इस्लामिक नीति है। आज से नहीं बल्कि शुरू से ही है। जहां तक बात मजहब के फैलाव की है, अगर आप बहुमत में नहीं है तो ताकत से काम नहीं बनेगा। सबसे पहले काफिरों की आस्था पर चोट कीजिए। धीरे-धीरे उन्हें विश्वास दिलाइये कि आप जिस भगवान को मानते हैं वो नकली है, हमारा वाला असली है।

आमिर ख़ान का फिल्मी ज़हर

आमिर खान की मूवी पीके को मैंने बहुत बार देखा। काफी बारीकी से देखा था। कहानीकार चाहे कोई हो, सोच आमिर की चली उसमें। पीके पूछता है, तुम मूरत काहे बनाते हो भगवान की? चाहता तो जवाब ये भी हो सकता था कि ईश्वर एक भाव है, इसलिए उसे प्रतीक रूप में आसानी से समझा जा सकता है। दिमाग में उसका बिंब बन जाता है। लेकिन दुकानदार का जवाब था कि भैया हमारी दुकान बंद करवाओगे क्या? आपको ये छोटी सी बात लग रही है पर यहां सीधे-सीधे ‘बुतपरस्ती’ को गलत ठहराने की कोशिश की है आमिर खान ने। पूरी फिल्म में मैं उसे नास्तिक मान कर उसकी हर बात से सहमत होता रहा लेकिन फिल्म के अंत में वह एक हिंदू लडकी का विवाह पाकिस्तानी मुसलमान से कराने के लिये खूब सारे तर्क देता है। अंत में कहता है कि ईश्वर तो है पर वो नहीं जो तुमने माना है। तुम भी झूठे और तुम्हारा भगवान भी झूठा। मतलब ईश्वर वही सच्चा है जो सातवें आसमान पर बैठा है।

झूठ बार-बार बोलो सच हो जाएगा

फेसबुक पर मेरे एक मित्र हैं खान जुनैदुल्ला। अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के स्कॉलर हैं। रियाद में रहते हैं। इस्लाम के गहरे जानकार हैं। इस्लामी इतिहास को आप नियमित उनकी वाल पर पढ़ सकते हैं। काफी समर्पित व्यक्ति हैं अपने पंथ के लिए। कल एक पोस्ट पर चर्चा करते हुये खान साहब ने कहा कि हिंदू शब्द किसी वैदिक और पौराणिक ग्रंथ में नहीं है। हां, ये बात सही है क्योंकि अरबियों के आने से पहले ही ये सभी ग्रंथ लिखे जा चुके थे। हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान शब्द उन सभी लोगों के लिए था जो सिंध पार रहते थे। उन्होंने बताया कि हिंदू का मतलब चोर, लुटेरा, बेइमान, पतित और काफिर होता है। पर ये बात मुझे हजम नहीं हुई क्योंकि भारत की धन संपदा, संस्कृति और इज्जत लूटने, लुटेरे आये थे अरब फारस और तुर्की से तो फिर खुद लुटने वाला लुटेरा कैसे हो गया? हजम हो या न हो, झूठ को बार-बार बोलो सच हो ही जायेगा। खान साहब का मानना है कि सनातन झूठ पर आधारित है क्योंकि एक बंदर का उठना और मनुष्य की तरह बात करना असंभव है, शिव ने बच्चे के धड़ पर हाथी का सिर लगा दिया असंभव है। शिव के नाचने से भूकंप आता है गप्प है।

ये कैसा दकियानूसी चमत्कार?

चमत्कार का तर्क यह है कि अल्लाह अपने नबियों के हाथों चमत्कार दिखाता है। चमत्कार वह विशेष घटना होती है जो संसार के वैज्ञानिक नियमों को भेद कर कुछ क्षण या कुछ अवधि के लिए विशेष घटित किया जाता है। सर्वशक्तिमान ईश्वर के लिए यह असंभव नहीं होता, हम ऐसे चमत्कारों में विश्वास करते हैं, क्योंकि इन चमत्कारों के साक्षी वही होते हैं जो वहां उपस्थित होते हैं। इस्लाम में वर्णित कोई भी चमत्कार स्थाई या बहुत लंबी अवधि का नहीं है, जैसे कि सनातन की पुराण कथाओं में है।” मतलब ये कि मनुष्य के शरीर पर हाथी का सिर लगाना झूठ है, पर बुर्राक गधी पर औरत का सिर सत्य है। हनुमान का सूरज मुंह में लेना बकवास है पर उंगली से चाँद के टुकडे कर देना सत्य है। शिव का नाचना झूठ है लेकिन नबी का बिना ऑक्सीजन सशरीर अंतरिक्ष में जाकर ईश्वर से मुलाकात कर लौटना और पिछले सभी मर चुके नबियों से बात करना सत्य है। मंदिर में अगरबत्ती-धूपबत्ती लगाना, पैसे चढाना गलत है पर मजार पर चढ़ाना सही है। रोजी-रोटी के लिये राम, कृष्ण, दुर्गा की मूर्ति बनाना अच्छा है पर उनके आगे सर झुकाना गलत है। नियोग प्रथा गंदी है पर हलाला हलाल है। कृष्ण की बहुविवाह गलत है पर नबी का एक छोटी सी बच्ची से निकाह पाक है। देवी पर बलि गलत है पर ईद पर हजारों-लाखों बकरे, गायें और ऊंट काट देना अच्छी बात है। जातिभेद बुरा है फिरकापरस्ती अच्छी है। जातिगत भेदभाव के चलते मंदिर में जाने से रोकना गलत है लेकिन शियाओं और अहमदिया को अपने मस्जिदों में न घुसने देना अच्छी बात है।

(सत्यपाल चाहर की फेसबुक टाइमलाइन से साभार)

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