आरक्षण व्यवस्था से खुश एक ‘अगड़े’ के मन की बात

आरक्षण की वजह से ही मेरे जैसे सीमित प्रतिभा वाला आदमी एक सम्मानजनक जीवनशैली को हासिल कर सका है। अगर आरक्षण नहीं होता तो एक बात तो पक्की है कि मैं किसी सरकारी दफ्तर में तीसरी या चौथी पायदान पर खड़ा एक मामूली कर्मचारी रहा होता, जिसके पास जिंदगी में ऊपर जाने के सारे रास्ते लगभग बंद हो चुके होते। डॉक्टर, इंजीनियर बनने लायक पढ़ाई नहीं कर सकता था। सरकारी नौकरी की कोशिश करता तो भी कलेक्टर तो बन नहीं जाता। ऐसे में मेरे पास भ्रष्टाचार करके लोगों को लूट-खरोटकर कुछ रुपये कमा लेने के अलावा जीवन में दूसरा कोई लक्ष्य नहीं होता। काम के बदले लोगों से पैसे मांगने पड़ते। हराम के पैसों को बैग में रखकर घर में घुसते वक्त मुझे अपने ही बच्चों से आंखें चुरानी पड़ती। हो सकता है कि बाद में इसकी आदत पड़ जाती है, लेकिन कभी अंतरआत्मा आवाज देती, तो क्या जवाब देता?

पढ़ाई से लेकर नौकरियों तक में आरक्षण की व्यवस्था ने तरुणावस्था में ही यह बात स्पष्ट कर दी थी कि सरकारी नौकरी मिलनी नहीं है, तो निजी क्षेत्र ही ज़िंदगी की नैय्या पार लगाएगा। पहले देखकर बुरा लगता था कि आरक्षण के कारण सरकारी नौकरियों का विकल्प मेरे लिए एक तरह से बंद है। लेकिन आज प्राइवेट नौकरियों में करीब 20 साल गुजारने के बाद यह मुनाफे का सौदा ही लगता है। जब भी अपने बॉस से झगड़ा हुआ नौकरी बदल ली और जब भी दूसरी कंपनी में ज्यादा फायदा नजर आया तो वहां पर छलांग मार दी। दफ्तरों में काम करने का ज्यादा साफ-सुथरा और पेशेवर माहौल मिलता है। मुझे अपनी सैलरी बढ़ने के लिए किसी वेतन आयोग की सिफारिश का इंतजार नहीं करना पड़ता। हर बार अपने बॉस को नौकरी छोड़ने की धमकी देकर ही मैंने अपनी सैलरी और पोस्ट बढ़वाई है।

इसलिए मंडलजी, वीपी सिंह जी, नरसिम्हा राव जी को बहुत-बहुत थैंक यू… मुझे लगता है कि इन लोगों की वजह से हर तबके का फायदा हुआ है। जो दलित और पिछड़े पूरी तरह से हाशिये पर थे उनको सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी मिली। उन्हें अच्छे शिक्षा संस्थानों में पढ़ाई करने के मौके मिले। समाज के इस तबके में सरकारी नौकरियों को लेकर जैसा क्रेज़ है कुछ वैसा ही मेरे पिताजी के वक्त भी हुआ करता रहा था। वो चाहते थे कि बेटा कुछ पढ़-लिखकर कम से कम सरकारी दफ्तर में बाबू की नौकरी कर ले। लेकिन अब तो उनको भी लगता है कि अगर प्राइवेट नौकरी या अपना बिजनेस करके बेटे ने 10 साल में आलीशान फ्लैट और कार खरीद ली तो वो शायद अच्छा ही हुआ कि वो बाबू नहीं बना। मुझे भरोसा है कि दलित और पिछड़े समुदाय की आने वाली पीढ़ियों को भी जल्द एहसास होने लगेगा कि सरकारी नौकरी एक तो कम हैं और दूसरे उनमें उतनी तरक्की, पैसा और मज़ा नहीं है जितना उन बाकी लोगों को लगता है जो सरकारी नौकरी नहीं पा सके।

वैसे ये शुरू भी हो चुका है। वेबसाइट नौकरी डॉट कॉम ने बताया है कि उसके जरिए नौकरी ढूंढने वालों में एससी-एसटी और ओबीसी वर्गों के छात्रों की संख्या का ग्राफ बढ़ रहा है। सबसे ज्यादा आईटी, सॉफ्टवेयर और बैंकिंग सेक्टर में आरक्षित वर्गों के नौजवान अन्य जातियों के लोगों को टक्कर दे रहे हैं। मुझे तो यही लगता है कि आरक्षण को लेकर बहुत हैरान-परेशान होने की जरूरत नहीं है। हो सकता है कि 2-3 दशक और यह चले लेकिन वो दिन दूर नहीं जब इसकी जरूरत खुद-बखुद खत्म हो जाएगी।

(फेसबुक से साभार)

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