भारत बंद पर इस दलित डीएसपी का पत्र जरूर पढ़ें!

दायीं तस्वीर डीएसपी अजय प्रसाद के फेसबुक पेज से साभार ली गई है। बायीं तस्वीर दलित आंदोलन के दौरान हुई हिंसा की है।

दलितों के भारत बंद के दौरान हिंसा के बाद से एससी-एसटी एक्ट को लेकर बहस छिड़ी हुई है। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून के उस प्रावधान में बदलाव का आदेश दिया, जिसके तहत केस दर्ज होते ही आरोपी को जेल में डाल दिया जाता था। इस कारण कानून के दुरुपयोग के कई मामले सामने आ रहे थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद कुछ राजनीतिक दलों ने दलित समुदाय के बीच यह भ्रम फैलाना शुरू कर दिया कि मोदी सरकार ने एससी-एसटी एक्ट और आरक्षण की सुविधा खत्म कर दी है। (देखें वीडियो) जिसके कारण बंद के दौरान कई जगह हिंसा भी देखने को मिली। इस पूरे हालात पर बिहार में भभुआ शहर के पुलिस उपाधीक्षक यानी डीएसपी अजय प्रसाद ने दलित समुदाय के नाम एक पत्र लिखा है। इसे हम हूबहू आपके सामने पेश कर रहे हैं।

डीएसपी अजय प्रसाद का पत्र

पहले दो तथ्य 1. मैं अनुसूचित जाति से हूँ, 2. पुलिस विभाग में डीएसपी हूं। दोनों तथ्य के बाद नीचे पूरा पढ़ लीजिएगा, तब आप चाहे दलित हों या (कथित) सवर्ण जितना गाली देना होगा दे दीजिएगा। क्योंकि आजकल सोशल मीडिया में फॉग कम गाली ज्यादा चल रहा है। एक अप्रैल की रात के 9 बजे बिहार के कैमूर जिले के भभुआ शहर के अनुसूचित जाति छात्रावास के करीब 15 उत्साही लड़के और छात्र नेता (?) मिलने आए। उन्हें भारत बंद करना था। भारत न हुआ, खिड़की हो गई। तेज़ हवा आ रही है, बंद कर दो। पहले लगा मूर्ख दिवस का मजाक कर रहे हैं, फिर उनका गंभीर चेहरा देखके हम भी गंभीर हो गए और पूछने पर इन्होंने बताया कि कल जुलूस निकालना है। बिहार पुलिस एक्ट, 2007 के अनुसार कोई भी जुलूस चाहे रामनवमी का हो या दुर्गा पूजा या मुहर्रम या राजनीतिक आपको एक जुलूस लाइसेंस लेना होता है। जुलूस का लाइसेंस डीएसपी के पास से मिलता है। फ्री में मिलता है। बस एक आवेदन देना होता है। इनको नियम मालूम नहीं था जोकि कोई बड़ी बात नहीं थी इसलिए बताया गया। बताने के लिए ही बुलाया गया था।

अब बुलाया था, पानी पिलाकर मैंने पूछ लिया कि भाई कल और क्या-क्या करना है। बोले भारत बंद करना है। पूछे क्या तकलीफ हो गई भारत से? सबने एक स्वर में कहा- “एससी/एसटी एक्ट में जो हुआ है, उसके विरोध में निकालना है”। मैंने एक बार फिर से पूछा- हुआ क्या है? सब चुप। 4-5 बार पूछा, पूरे भारत को बंद करने के लिए तैयार खड़े हो पर किसलिए यह तो बताओ। एक ने गला साफ़ कर बताया कि एससी/एसटी एक्ट में छेड़छाड़ हुआ है, एससी/एसटी एक्ट न हुआ, लड़की हो गई। खैर बस जानकारी के लिए बता रहा हूँ। थोड़ा धैर्य रखकर पढ़ लीजिए, समझ लीजिये। डीएसपी हूं, अनुसूचित जाति से हूं, इसलिए सुन लीजिए। उसके बाद खिड़की बंद करिए, भारत बंद करिए, दरवाजा बंद करिए जो करना है, करिए। पर करने से पहले बाबा साहेब ने कहा था उसको जरा याद रखिये और उस क्रम को याद रखिये – Educate, Agitate and Organise. ये लोग भी Educated होने के पहले ही Agitated हो गए थे। ठीक वैसे ही जैसे हमारे समय कुछ ज्यादा तेज़ बच्चे क्लास फांद के सीधे दूसरी क्लास से चौथी में चले जाते थे। हमलोग तो एक ही क्लास में दो-दो साल लटकते थे।

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने (संभवतः) कहा है, संभवतः शब्द इसलिए कि अभी आदेश की कॉपी नहीं मिली है, बस अखबारों में पढ़े न्यूज़ के आधार पर बता रहा हूं, वैसे बाकियों के पास भी उससे ज्यादा जानकारी नहीं है।

1- एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज मामलों में तुरंत गिरफ़्तारी नहीं होगी। इसके लिए एसपी का आदेश चाहिए। बाकी राज्यों का हाल नहीं पता पर बिहार में तो पहले भी यही था। एससी/एसटी एक्ट के दर्ज प्राथमिकी में जांच शुरू होती है, फिर डीएसपी सुपरविज़न करते हैं, जिसमें तय होता है कि साक्ष्य क्या हैं और उस मामले में गिरफ़्तारी करनी है। इसे सुपरविज़न नोट कहते हैं। फिर एसपी रिपोर्ट-2 निकालते हैं। जिसमें सुपरविज़न नोट पर अनुमोदन होता है। तब गिरफ़्तारी होती है। तो बदला क्या बिहार के मामले में कुछ नहीं?

2. दूसरा अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) का प्रावधान पहले नहीं था, अब कर दिया गया है। पहले बेल या जमानत को समझ लीजिए। जब किसी मामले में किसी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया जाता है तो वह जेल जाने के बाद जेल से बाहर आने के लिए कोर्ट में जमानत याचिका दायर करता है। इसे रेगुलर बेल कहते हैं। दूसरी स्थिति यह होती है कि आरोपी को जैसे ही पता चलता है की उस पर कोई केस है, वह फरार हो जाता है और वकील के माध्यम से कोर्ट में यह कहते हुए आवेदन देता है कि मुझे फंसाया जा रहा है, मुझे गिरफ़्तारी से बचने के लिए बेल दिया जाये। अगर कोर्ट को यह लगता है कि सही में मामला ऐसा है तो अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) दे सकती है। पर आप सभी की जानकारी के लिए 2015 से ही एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज अधिकांश मामलों में (चूँकि सात साल से कम की सजा है) इसलिए बेल या जमानत की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी और थाने से ही 41 CRPC के तहत बांड पर छोड़ दिया जाता था। यानी प्रैक्टिकली बहुत अंतर नहीं पड़ा है।

3. पहले किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ एस.सी/एस.टी एक्ट के तहत का केस दर्ज होने पर तब तक उसे गिरफ्तार नहीं किया जायेगा, जब तक कि उसे नियुक्त करने वाले प्राधिकार के द्वारा अनुमति न मिले। CRPC की धारा 197 के अनुसार पहले से ही यह प्रावधान है कि किसी लोकसेवक के विरुद्ध न्यायालय में किसी भी मामले में तब तक संज्ञान नहीं लिया जायेगा, जब तक की उसे नियुक्त करने वाले प्राधिकारी का अनुमोदन प्राप्त नहीं हो। इसमें मुझे तो कुछ भी गलत नहीं लगता क्योंकि अपने छोटे से सर्विस पीरियड में मैंने भारी पैमाने पर कथित उच्च जाति के पदाधिकारियों को अनुसूचित जाति के कर्मी और इस एक्ट का इस्तेमाल अपने विरोधी कथित सवर्ण पदाधिकारी को दबाने में करते देखा है।

अब माननीय सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से थोड़ा हट कर… दुरुपयोग हर कानून और धारा का होता है। मैंने आज तक सबसे ज्यादा दुरुपयोग किसी धारा का देखा है तो वो है चोरी की धारा 379, जो लोग कोर्ट कचहरी पुलिस से जुड़े हैं, जानते हैं मारपीट के हर एफआईआर की अंतिम लाइन ये ज़रूर होती है “…मेरे गले से सोने का चेन छीन लिया।” भले घर में खाने को पैसा नहीं हो पर इस देश में हर पिटे हुए व्यक्ति के गले में सोने का चेन ज़रूर होता है। ये लाइन सिर्फ इसलिए हर प्राथमिकी में लोग जोड़ते हैं या वकील साहब लोग जुड़वाते हैं ताकि चोरी की धारा लगे।

कल रात जिन्हें जुलूस का लाइसेंस देने बुलाया था, आज उनके बुलावे पर ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ करने आये साथियों ने जमकर बवाल काटा। लाठी डंडा लेकर पूरे भभुआ शहर में घूम-घूम कर बवाल काटा। गाड़ियां तोड़ी, शीशे फोड़े, दूकानें लूटीं। कल 10 बार समझाया था कि भीड़ इकट्ठा करना आसान है उसे नियंत्रित करना लगभग असंभव है। कल जिनको पानी पिलाया था, आज उन पर प्राथमिकी दर्ज करवा रहा हूं। सुना है सभी होस्टल छोड़ कर फरार हैं। आज जहां भी फरार होंगे, मेरी कल की बात को ज़रूर याद कर रहे होंगे… क्योंकि जब उन्होंने अपने सहयोगियों को रोकने की कोशिश की तो खुद ही उनसे ही पिटते-पिटते बचे। कल मैंने कहा था, बार-बार कहा था, भीड़ उतनी ही इकट्ठी करना जितने को संभाल सको।

रात 11 बजे एक बड़ी पार्टी के नेता ने फोन किया, पहले माननीय रह चुके हैं। बहुत सारे लोगों के नाम के आगे माननीय नहीं लगाने पर रूठ जाते हैं। पूछा- आज जो केस हो रहा है तोड़-फोड़ वाला, उसमें मेरा नाम है या नहीं। मैंने कहा आप तो कहीं दिखे नहीं, सो आपका नाम क्यों रहेगा? मैंने सोचा सुनकर भूतपूर्व माननीय खुश होंगे कि चलो बेकार में फंसे नहीं… हुआ उल्टा, बताने लगे कि नहीं हम तो फलना चौक पर जोरदार विरोध किए हैं, आपको हम दिखे कैसे नहीं। फिर बोले केस में देखिएगा… मेरा भी नाम रहेगा तो ठीक रहेगा। मैंने पूछा काहे ठीक रहेगा तो बोले अरे नाम हो जायेगा। दलित वोट में फायदा होगा… पहले सोचा कि फोन को अपने सर पर पटक लूं लेकिन विचार बदल लिया। फिर कहता हूं… बाबा साहब भीमराव आंबेडकर ने कहा था – Educate, Agitate, Organise इस क्रम को याद रखिये। अगर आगे बढ़ना है खुद को तमाशा नहीं बनवाना है तो क्रम को याद रखिये…

(बिहार के पुलिस अधिकारी अजय प्रसाद के फेसबुक वॉल से साभार)

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