मैंने इस्लाम क्यों छोड़ा… पढ़ें एक पूर्व-मुस्लिम का पत्र

इस्लाम में मेरी आस्था दृढ़ थी। बचपन से ही मैं इस्लामी नियम-कायदों का पालन किया करता था। लेकिन विज्ञान का विद्यार्थी बनने के बाद अनेक प्रश्नों ने मुझे इस्लामी नियमों पर चिंतन करने के लिए बाध्य किय। इस्लामी नियमों में कुरान या अल्लाताला या हजरत मुहम्मद पर प्रश्न करना या शंका करना उतना ही अपराध है जितना किसी व्यक्ति का कत्ल करना। युवा अवस्था में आने के बाद मेरे दिमाग में सबसे पहला सवाल आया कि अल्लाताला रहमान ओ रहीम हैं, न्याय करने वाले हैं ऐसा मुल्ला बताते हैं। फिर क्या कारण है कि इस दुनिया में कोई गरीब, कोई मालदार, कोई इंसान, कोई जानवर होता है। अगर अल्लाह का न्याय सबके लिए समान है जैसा कुरान में लिखा है तो सबको एक जैसा होना चाहिए। कोई व्यक्ति जन्म से ही कष्ट भोग रहा है तो कोई आनंद उठा रहा है। अगर संसार में यही सब है तो फिर अल्लाह न्यायकारी कैसे हुआ? यह प्रश्न मैंने कई साल तक दोस्तों, रिश्तेदारों और मुल्ला मौलवियों से पूछा लेकिन एक ही जवाब मिलता कि तुम अल्लाताला के मामले में अक्ल क्यों लगाते हो? मौज करो, अभी तो नैजवान हो। यह भी पढ़ें: इस्लाम छोड़कर एक्स-मुस्लिम क्यों बन रहे हैं लोग

निरंतर यह विषय मुझे बाध्य करता था और मै निरंतर यह प्रश्न अनेक जानकार लोगों से करता रहता था, लेकिन जवाब कभी नहीं मिला। उत्तर मिला तो महर्षि दयानंद सरस्वती के पवित्र वैज्ञानिक ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में। जिसमें महर्षि ने व्यक्ति के अनेक और इस इस जन्म में किये गये सुकर्म या दुष्कर्मों को अगले जन्म में भोग का वर्णन किया है। यह तर्क संगत था क्योंकि हम बैंक में जब खाता खोलते हैं तो हमें बचत खाते पर नियमित छह माह में ब्याज मिलता है। मूलधन सुरक्षित रहता है। तथा स्थिर रकम पर एक साथ ब्याज मिलता है। उसी प्रकार जीवात्मा सृष्टि की उत्पत्ति के बाद अनेक शरीरों, योनियों में प्रवेश करता है और अपने सुकर्मों और दुष्कर्मों का फल भोगता है। पुनर्जन्म के बिना यह संभव नहीं हो सकता। पुनर्जन्म को मानना आवश्यक है लेकिन मैंने पाया कि मुस्लिम समाज पुनर्जन्म को नहीं मानता। वो तो यह मानते हैं कि चौहदवी शताब्दी में संसार मिट जाएगा। कयामत आएगी और फिर मैदाने-हश्र में सभी का इंसाफ होगा। लेकिन उस मैदाने-हश्र में जो भी हजरत मुहम्मद के झंडे के नीचे आ जाएगा, मुहम्मद को अपना रसूल मान लेगा उसे बख्श दिया जाएगा। मतलब ये कि उसे अपने कर्मों के फल भुगतने का झंझट नहीं होगा और वो सीधा जन्नत में जाएगा। यह बात कहीं से भी तर्कसंगत नहीं लगती। यह भी पढ़ें: एक मुसलमान लड़की, जो इस्लाम छोड़कर इंसान बन गई

एक व्यक्ति के कहने मात्र से अगर सारा खेल चलने लगे तो संसार में अन्य धर्मों को मानने की आवश्यकता क्यों पड़े? और सृष्टि का अंत चौहदवी सदी में माना जाता है जबकि चौहदवी शताब्दी तो कब की खत्म भी हो गई। फिर यह संसार समाप्त क्यों नहीं हुआ? कयामत क्यों नहीं आई? क्या मुहम्मद साहब और इस्लाम से पूर्व यह संसार नहीं था? क्योंकि इस्लाम के उदय को लगभग 1500 साल हुए हैं संसार तो इससे पूर्व भी था और रहेगा। मेरा दूसरा प्रश्न था कि जब एक मुस्लिम पति एक समय में चार बीवियां रख सकता है तो एक मुस्लिम औरत एक समय में चार पति क्यों नही रख सकती? इस्लाम में औरतों के साथ ये कैसी नाइंसाफी है? एक पुरुष के मुकाबले दो स्त्रियों की गवाही ही पूर्ण मानी जाती है। ऐसा क्यों? आखिर औरत भी तो इंसानी जात का हिस्सा है। फिर उसे आधा मानना उस पर अत्याचार करना कहाँ की अक्लमंदी है और कहाँ तक इसे अल्लाताला का इंसाफ माना जा सकता है?

इस सवाल का जवाब भी मुझे सत्यार्थ प्रकाश से ही मिला। महर्षि दयानंद ने महर्षि मनु और वेद वाक्यों के आधार पर सिद्ध किया कि स्त्री और पुरुष दोनों समान हैं। एक पत्नी से अधिक तब ही हो सकती है जब कोई विशेष कारण हो, जैसे कि पत्नी संतान पैदा नहीं कर सकती हो। ऐसा भी पहली पत्नी की इजाज़त के बिना नहीं हो सकता। एक पत्नीव्रत को स्वाभाविक गुण माना गया है। मनु ने कहा है – यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः अर्थात जहाँ नारियों का सम्मान होता है वहां देवता वास करते हैं। तीसरा प्रश्न मेरे मन में था स्वर्ग और नर्क का। इस्लाम मानता है कि कयामत के बाद फैसला होगा।अच्छे कर्म वालों को जन्नत और बुरे कर्म वालों को दोजख मिलेगा। जन्नत का जो वर्णन है वह इस प्रकार है कि वहां सेब, संतरे, शराब, एक व्यक्ति को 72 हूरें और चिकने-चुपड़े लौंडे मिलेंगे। मैं मुल्ला-मौलवियों और दोस्तों से पूछता था कि बताइए जब एक पुरुष को जन्नत में 72 औरतें मिलेंगी तो मुस्लिम महिलाओं को क्या मिलेगा? मेरे सवाल से वो चिढ़ जाया करते थे। मेरी नीयत किसी का दिल दुखाने की नहीं, बल्कि अपने दिल में उठ रहे सवालों के जवाब जानने भर की थी। लेकिन किसी ने भी मेरी शंकाओं का समाधान करने की जरूरत नहीं समझी। सबने कहा कि अल्लाह की इबादत करो और मौज उड़ाओ।

चौथा और सबसे अहम सवाल सभ्यता का था। मैंने मुस्लिम इतिहास का पूरी गंभीरता से अध्ययन किया है। इतिहास साक्षी है कि इस्लाम कभी भी वैचारिकता या अपनी मर्जी के कारण नहीं फैला है। इस्लाम शुरुआती समय से अब तक तलवार, डर, एक से ज्यादा बीवियों के लालच, जन्नत का लोभ और धन के मोह के कारण ही अपनाया गया। हजरत मुहम्मद साहब को कई युद्ध करने पड़े थे, खुद उनके चाचा अबू लहब ने आखिरी वक्त तक इस्लाम को नहीं कबूला, क्योंकि वो वैज्ञानिक और तर्कवादी थे। हजरत मुहम्मद को मक्का से निष्कासित भी होना पड़ा, क्योंकि वो अरब की सभ्यता में पूरी तरह से बदलाव की कल्पना करते थे और अरब के लोग कई कबीलों में बंटे हुए थे। अबराह का लश्कर तो एक बार मक्का में स्थापित भगवान शंकर के विशाल शिवलिंग (संगे असवाद) को मक्का से ले जाने के लिए आया था लेकिन भीषण युद्ध में कई लोगों ने जान गंवा दी।

यह मक्का शब्द भी संस्कृत के मख अर्थात यज्ञ शब्द का ही बिगड़ा रूप है। इस समय इस विषय पर चर्चा करना हमारा उद्देश्य नहीं है। मुस्लिम इतिहास में एक भी प्रमाण त्याग, समर्पण या सेवा का नहीं मिलता। वैदिक इतिहास के झरोखे से देखे तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम पिता की आज्ञा का पालन करते हुए वन को प्रस्थान करते हैं, दूसरी तरफ औरंगजेब अपने पिता को जेल में कैद कर बूंद-बूंद पानी के लिए तरसाता है। यह त्याग, समर्पण और सेवा का ही नतीजा है कि हजारों साल से वैदिक संस्कृति बनी हुई है और उसे कोई मिटा नहीं पाया।

मेरे परिवार के इतिहास के साथ भी एक काला पन्ना जुड़ा हुआ है। उन्हें लालच में आकर अपना मूल धर्म त्याग कर इस्लाम में जाना पड़ा। मैं साफ शब्दों में कहता हूँ कि आपकी पूजा पद्धति कुछ भी हो सकती है, आप किसी भी समुदाय के हो सकते हैं लेकिन जिस देश में पले-बढ़े हैं उस देश को तो अपनी माँ ही मानना चाहिए। राष्ट्रभक्ति किसी व्यक्ति का पहला कर्तव्य होना चाहिए। वैदिक धर्म की महानता के अनेक प्रमाण दिए जा सकते हैं लेकिन यहां मेरा मकसद सिर्फ कुछ विचारों पर लिखना है। बीते छह साल से मेरे सामने हमेशा यह सवाल रहा है कि मैं हिंदू क्यों बना? मैं हर व्यक्ति को जन्म से हिंदू ही मानता हूँ क्योंकि कोई मनुष्य बिना मां के गर्भ के पैदा नहीं हो सकता यहां तक कि टेस्ट ट्यूब बेबी को भी कुछ वक्त मां के गर्भ में आश्रय लेना पड़ता है, तभी उसका पूरा विकास हो पाता है। इसलिए मां के पेट में तो हर इंसान हिंदू ही होता है। जन्म के बाद उसे मुस्लमानिया कराए बिना मुसलमान और बपतिस्मा कराए बिना इसाई नहीं बनाया जा सकता। इन क्रियाओं के पूर्व बच्चा काफिर यानी हिंदू होता है। इसलिए संसार का प्रत्येक शिशु हिंदू है। मूल हम सबका वेद है अर्थात सत्य सनातन वैदिक धर्म। आशा है मेरे मित्र मेरी भावना को समझेंगे, मेरा उद्देश्य किसी की भावनाओ को चोट पहुँचाने का नहीं है। मैं सिर्फ अपने विचारों से समाज को अवगत कराना चाहता था। फिर भी अगर किसी की भावनाओं को मेरे कारण ठेस लगे तो उन सबसे मैं क्षमा–याचना करता हूं।

(डॉक्टर आनंद सुमन सिंह पूर्व डॉ कुंवर रफत अख़लाक़ का लेख, फेसबुक पर आर्य समाज ग्रुप से साभार)

एक अपील: न्यूज़लूज़ के जरिए हम राष्ट्रवादी पत्रकारिता को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। इस वेबसाइट पर होने वाला खर्च बहुत ज्यादा है और हमारी आमदनी काफी कम। हम अपने काम को जारी रख सकें इसके लिए हमें आर्थिक मदद की जरूरत है। ये हमारे लिए ऑक्सीजन का काम करेगी। डोनेट करने के लिए क्लिक करें:

comments

Tags: , , ,