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जानिए लोग मुसलमानों को पाकिस्तानी क्यों कहते हैं!

मुस्लिम कट्टरपंथी नेता असदुद्दीन ओवैसी ने कहा है कि भारतीय मुसलमानों को जो ‘पाकिस्तानी’ कहता है उसे 3 साल कैद की सज़ा देने का कानून बनाया जाए। चलिए ओवैसी से एक मिनट के लिए सहमत हो जाते हैं। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आखिर क्यों कुछ लोग हिंदुस्तानी मुसलमानों को पाकिस्तानी बोलते हैं। हमें इसकी पड़ताल करने के लिए इतिहास के पन्ने पलटने होंगे और इतिहास से ये सवाल भी पूछना होगा कि आखिर पाकिस्तान बना क्यों? पाकिस्तान मांगा किसने था? साथ ही साथ आपको पाकिस्तान के असली मूल निवासियों के दर्द को भी समझना होगा। पाकिस्तान के मूलनिवासी मतलब सिंधी, बलूची, पश्तून, पठान, पंजाबी और ढेरों कबायली समुदाय। इतिहास गवाह है कि इनमें से किसी ने भी पाकिस्तान नहीं मांगा था।

किसने मांगा था पाकिस्तान?

बड़ा सवाल यही है कि अलग पाकिस्तान मांगा किसने था? देश का बंटवारा किसकी मर्जी से हुआ था? आपको जान कर अजीब लगेगा लेकिन यह सच है कि पाकिस्तान मांगा था अलीगढ़, भोपाल, लखनऊ, हैदराबाद, अहमदाबाद, कानपुर, अहमदनगर, मेरठ और मेवात के मुसलमानों ने। 40 के दशक में जिन्ना को तन-मन-धन से यहीं के मुसलमानों ने सहारा दिया। लेकिन जब बंटवारा हो गया तो असली आफत गिरी पाकिस्तान के मूल निवासी सिंधी, बलूची, पश्तून, पठान और पंजाबी मुसलमानों पर। ये बेचारे हैरान परेशान हो गए। वो सोचने लगे कि ये कौन लोग यहां आ गए? जनाब, अर्ज़ किया है, फरमाया है… जैसे अल्फाज़ का इस्तेमाल करने वाले ये लोग हैं कौन? ये तो हमारी भाषा भी नहीं है… हम तो सिंधी, पंजाबी, बलूच, पश्तो बोलते हैं और ये लोग तो बात-बात पर शेर सुनाते हैं। पाकिस्तान के ‘मूल निवासियों’ को महसूस होने लगा कि अचकन और शेरवानी पहनने वाले अलीगढ़, भोपाल, लखनऊ, हैदराबाद, अहमदाबाद, अहमदनगर, मेरठ से आए ये लोग हमारे अपने कैसे हो सकते हैं?

अलग देश मांगा तो गए क्यों नहीं?

दरअसल पाकिस्तान बनने के 2-4 सालों के अंदर ही वहां के ‘मूलनिवासी मुसलमानों’ ने इन ज़हीन उर्दू बोलने और शेर पढ़ने वालों को उनकी औकात दिखा दी। तेज़ी से ये खबर उन रसूखदार मुसलमानों तक पहुचने लगी जो अब तक हिंदुस्तान में ही रह गए थे। ये ‘ओवैसी सोच’ के वो लोग थे जिन्होंने जिन्ना और पाकिस्तान के ख्बाब के लिए सब कुछ किया था। लेकिन 1947 की अफरातफरी में ये पाकिस्तान जाने से मुकर गए। ये सही वक़्त के इंतज़ार में थे। उन्हें यहां अपनी प्रॉपर्टी, अपने कई पेंडिंग काम निपटाने थे। इतिहास गवाह है उस दौर के प्रॉपर्टी दलाल टाइप लोग पाकिस्तान के हिंदू और भारत के मुसलमानों की संपत्ति की कीमत कौड़ियों में लगा रहे थे। लेकिन जब पाकिस्तान के कराची से आया एक शब्द ‘मुहाजिर’ उनके कान में पड़ा तो ‘ओवैसी सोच’ वालों की नींद उड़ गई। उनका पाकिस्तान का ख्बाब चकनाचूर हो गया। उन्होंने मज़बूरी में दिल पर पत्थर रख कर पाकिस्तान जाने से तौबा कर ली। 14 अगस्त 1947 के दिन इन ‘ओवैसी सोच’ वालों ने ख्बाब देखा था कि सर रेडक्लिफ मुग़लिया सल्तनत के नक्शे के हिसाब से बंटवारा करेंगे जिसमे उत्तर उनका होगा और दक्खिन हिंदुओं का। लेकिन जब 17 अगस्त 1947 को रेडक्लिफ लाइन का एलान हुआ तो उसमें पाकिस्तान बित्ते भर में सिमट गया। उफ्फ… मुग़लिया दौर की ये सारी निशानियाँ, ये सारी सोच तो यहीं रह गईं और शायद इन्हीं में से कुछ यहां रह गए, जिनकी औलादों के नाम ओवैसी वगैरह है।

(प्रखर श्रीवास्तव की फेसबुक टाइमलाइन से साभार)

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