जानिए मुसलमानों को अब क्यों याद आने लगे हैं गांधी

दंगों से पटे भारतीय इतिहास में गुजरात दंगा एक प्रस्थान बिन्दु है। यहां से मुसलमानों को उत्तर मिलता है कि सांप्रदायिक धनुष की प्रत्यंचा एक सीमा से ज्यादा खींचे जाने पर बाण की चोट विध्वंसक तो होती है परंतु प्रत्यंचा टूट जाने का डर भी बना रहता है और गुजरात के बाद प्रत्यंचा टूटी है। संभवत: यह भारतीय इतिहास, और आधुनिकता में ऐसी पहली घटना है जिसमें इस्लामिक अतिक्रमण को विपरीत और कई गुणा अधिक वेग से वार सहना पड़ा। यह एक ऐसा दंगा था, जिसे सबने साक्षात टीवी पर देखा। इससे पहले दंगे इस तरह से खबर नहीं बने थे, जिसे देखकर उसका ताप अनुभव किया जा सके। यह एक ऐसा दंगा था जिसमें मीडिया ने पूरे देश को बताया कि हिंदू अधिक आक्रामक हैं (बहुत सारे झूठ अतिरंजना से पूर्ण भी) हजार वर्षों के इतिहास में हिन्दू ऐसा कभी न हो सके थे।

यहां से भारत में रहने वाले मुसलमानों का नजरिया बदला। नरेंद्र मोदी उसके दिमाग में निरंतर एक डरावनी छाया की तरह डोलने लगे। गनीमत थी कि नरेन्द्र मोदी गुजरात तक सीमित रहे। 2014 में उनके उदय को सभी मुसलमान पत्रकार और सेक्यूलर जमात सच के रूप में स्वीकार करने से टालते रहे। उन्होंने लगभग शुतुरमुर्गी तेवर के साथ यहां तक कहा कि मोदी को गुजरात के बाहर जानता ही कौन है। लेकिन 2014 में मोदी भारतीय हो गए। जिस दिन चुनाव परिणाम आए थे उस दिन मैंने देखा था कि सेक्यूलरों के चेहरे किस तरह से उड़े हुए थे। एक मुसलमान मित्र ने मुझसे हाथ मिलाते हुए कहा था अरे ये क्या हो गया भाई! आखिर किस बात का डर सता रहा था उसे या किस बात का डर एक पूरी प्रजाति को सताने लगा है? जिस देश में उनकी आबादी पांच या सात फीसदी है वहां उन्होंने अपने आतंक का आकाश बिछा दिया है, भारत में तो 18 फीसदी पार कर गए हो, फिर किस बात का डर।

हैरत की बात ये है कि जिस गांधी को इन्होंने बीते पचास साल में गलती से भी याद न किया, जिस गांधी से मनसा, वाचा और कर्मणा ये कभी मेल रख ही ना सके, उसी गांधी को याद करने लगे हैं। आज 30 जनवरी को बहुत सारे भाईजानों को गांधी याद आ रहे हैं। बकरा, भैंसा और गायों को हलाल कर उदरस्थ करते हुए कौन याद आता है! हर बार किसी मूर्ति के विसर्जन, पूजा यात्रा, राष्ट्रीय उत्सव के दौरान ही भाईजान क्यों भड़क उठते हैं! क्यों ऐसे ही मौकों पर पत्थर चल जाते हैं! क्यों काली की मूर्ति लेकर जाती हुई भीड़ पर गोलियां चल जाती हैं और क्यों शबे बारात के हुड़दंगियों, ताजिया के तारणहारों और ईद बकरीद पर पूरे देश को ईदगाह बना देने वालों पर पथराव नहीं होता। इऩ सभी क्षणों में कौन याद आते हैं? तब स्वधर्म की धृष्टता ही शोभती है क्योंकि वही मूल स्वभाव है। सियार का नीला रंग शाश्वत नहीं होता।

गांधी और इस्लाम के बीच उतनी ही दूरी है जितनी कि धरती और अनंत आकाश के बीच है। गांधी अपने तमाम विरोधाभासों के बीच एक नग्न आदमी हैं। उतनी निर्दयता से किसी ने खुद को नहीं उधेड़ा है। और इस्लाम में पारदर्शिता तो है ही नहीं। वहां तो ईमानदारी की रत्ती भर जगह नहीं है। जिस धर्म ने स्वयं से कभी प्रश्न ही नहीं किया हो वो भला गांधी को कैसे याद कर सकता है? क्योंकि गांधी तो ताउम्र स्वयं को उधेड़ते रहे। लेकिन जहां प्रश्न करना, ईश्वर की सत्ता पर सवाल खड़े करना, धार्मिक मान्यताओं को काल के हिसाब से बदलना असंभव हो… वहां गांधी!

नहीं नहीं… गांधी तो बस ढाल हैं। क्योंकि उन्हें लगता रहा है कि उनके सभी उत्पातों को क्षमादान देने का साहस सिर्फ गांधी में था। कोई पटेल, नेहरू, बोस में इतनी दयालुता नहीं थी कि दंगाइयों के उत्पात पर भी उन्हें क्षमा कर दें। इसे सही और गलत के चश्मे से नहीं देख रहा। बस रेखांकित कर रहा हूं कि उन्हें गांधी ही क्यों याद आते हैं। उस हिसाब से तो बुद्ध और राम भी याद आने चाहिए! पर वे याद नहीं आ सकते क्योंकि वो धर्मबाह्य हैं तिथिबाह्य हैं! अब चूंकि उन्हें ये अनुभव हो चुका है कि मौजूदा भारत में इस्लाम का फैलना… या तरघुसकी मार तरीके से फैल जाना बड़ा मुश्किल है। कैराना, कासगंज, केरल, पश्चिम बंगाल, असम का एजेंडा चलाना आसान नहीं है। इसलिए येन-केन प्रकारेण मोदी विस्थापन और गांधी स्मरण! अब गांधी तो लौटकर आ नहीं सकते इसलिए राहुल गांधी ही चलेगा। क्यों भाईजान… पर ऐसा होगा नहीं।

(आजतक के पत्रकार देवांशु झा की फेसबुक टाइमलाइन से साभार)

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