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एनडीटीवी के ही पूर्व पत्रकार ने खोली चैनल की पोल

एनडीटीवी एक भला चैनल था। अन्य चैनलों में बकवास बहुत चलता था, लेकिन एनडीटीवी पर सिर्फ़ ख़बरें चलती थीं। हालांकि इसके साथ ही वहां एक बड़ी बुराई भी थी कि अक्सर ख़बरों में मिलावट कर दी जाती थी। सांप्रदायिक तत्व वहां काफी पहले से और ठीक-ठाक मात्रा में मौजूद थे। मुझे याद आती है एक पुरानी स्टोरी, जिसके मुताबिक किसी ट्रेन की मिलिट्री बोगी में घुसने पर एक युवक की पिटाई कर दी गई थी। चैनल पर यह रिपोर्ट बड़े ताम-झाम से चली। संयोग से उस युवक का नाम था शफ़कत और वह कश्मीरी था। फिर क्या था, चैनल के प्रबुद्ध विचारकों को मसाला मिल गया। स्क्रिप्ट की पहली लाइन ही यह लिखी गई- “एक तो मुसलमान, ऊपर से कश्मीरी। क्या शफ़कत का गुनाह यही था?”

मैंने स्क्रिप्ट की इस लाइन का विरोध किया। कहा कि यह नफ़रत और सांप्रदायिकता फैलाने वाली लाइन है। साथ ही, पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों और तय मर्यादाओं के ख़िलाफ़ भी। इस लाइन को लिखने की कोई तुक नहीं। स्टोरी इस लाइन के बिना भी लिखी जा सकती है। एक ज़िम्मेदार राष्ट्रीय चैनल को इस तरह की हेट्रेड फैलाने से बचना चाहिए। मुमकिन है कि कोई हिन्दू अथवा ग़ैर-कश्मीरी भारतीय भी किसी मिलिट्री बोगी में घुस जाए, तो उसके साथ भी ऐसा हो सकता है। …और हमें तो यह भी नहीं पता कि शफ़कत के मिलिट्री बोगी में घुसने पर और क्या-क्या हुआ? क्या नाम पूछते ही सैनिकों ने उसपर हमला कर दिया या फिर मार-पीट से पहले दोनों के बीच कुछ बहसबाज़ी भी हुई। क्या सिर्फ़ शफ़कत के बयान को ही अंतिम सत्य माना जा सकता है? क्या स्टोरी में मिलिट्री का भी पक्ष शामिल नहीं किया जाना चाहिए?

बहरहाल, मेरी बात न सुनी जानी थी, न सुनी गई, क्योंकि पता चला कि वह स्टोरी एक हाई-लेवल प्लानिंग का हिस्सा थी। चैनल के बड़े संपादकों ने मनमोहन सरकार के तत्कालीन गृह मंत्री संभवतः पी चिदंबरम से शफ़कत की मीटिंग भी फिक्स करा रखी थी और ये मुलाकात हुई भी। एक अन्य मौके पर, मुंबई पर आतंकवादी हमले के ठीक बाद मैंने एनडीटीवीख़बर.कॉम के लिए एक लेख लिखा था। चूंकि इस घटना में सैंकड़ों बेगुनाह लोग मारे गए थे, इसलिए क्षुब्ध पूरा देश था और ज़ाहिर तौर पर मैं भी था। अपने लेख में मैंने सरकार की कुछ चूकों और नीतियों को लेकर तीखी आलोचना की थी, लेकिन उसकी एक भी पंक्ति तथ्य से परे नहीं थी।

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