क्या जेटली पर भरोसा करके भूल कर रहे हैं मोदी?

आज मैंने वित्तमंत्री अरुण जेटली की 21 दिसंबर को लोकसभा में बजट संबंधित 45 मिनट का जवाब सुना। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने वित्तीय विवेक और अनुशासन पर जोर दिया है। आंकड़ों के साथ उदहारण दिया कि कैसे पिछली सरकार आमदनी से बहुत अधिक खर्च करने के कारण उधार के पैसे से प्रशासन चलाती रही। कैसे पिछले तीन साल में मोदी सरकार ने उस खर्च को आय बढ़ाकर और लोन कम करके काबू में करने का प्रयास किया। वह भी तब, जबकि देश में दो साल सूखे और विश्व में मंदी की स्थिति है। जेटली ने याद दिलाया कि कैसे 2009 से 2014 तक मंहगाई 10 से 12 प्रतिशत थी यानी जो सामान आपको 2009 में 100 रुपये का मिलता था, अगले साल 112 रुपये का हो जाता था। अब बीजेपी सरकार ने मंहगाई की दर को 4 प्रतिशत के आसपास ही समेट कर रखा है। कुल मिलाकर अभी यूपीए के पाप धोने का काम ही चल रहा है।

वित्तमंत्री जेटली ने आगे कहा कि इस साल देश की एक्सपोर्ट की दर 12-13 प्रतिशत हो गई है, जबकि पिछले तीन महीने में एक क्षेत्र ने 26 से 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी भी दर्ज की है। पिछली सरकार के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय नीतिगत जड़ता (पॉलिसी पैरालिसिस) का प्रयोग करता था, और अब वही लोग भारत को चमकता हुआ तारा कहते है। जेटली ने कहा कि जब अर्थव्यवस्था में मूलभूत सुधार किये जाते हैं तो कुछ समय के लिए मंदी आती है। फिर उन्होंने पूछा कि किस साल में जीडीपी की विकास दर सबसे कम थी? और याद दिलाया कि वह 1992 का साल था जब नरसिंह राव सरकार में वित्त मंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह ने बड़े पैमाने पर सुधार कार्यक्रमों की शुरुआत की थी।

जेटली ने यह भी बताया कि पिछली सरकार के समय सब्सिडी यानी लागत से कम कीमत के लिए सरकार की तरफ से दिए जाने वाले अनुदान का लाभ उन्हें भी मिलता था और फिर पूछा कि कैसे सब्सिडी केवल गरीबो को मिले, न कि धनी लोगो को? जब आधार कार्ड के द्वारा मोदी सरकार ने अमीरों को सब्सिडी के लाभ से वंचित कर दिया और हज़ारों-करोड़ों रुपये बचने लगे तो आप लोग (विपक्ष) कोर्ट चले गए। उन्होंने पूछा कि कॉरपोरेट जगत को लोन कब दिए गए थे जिसको वे अदा नहीं कर पा रहे है और जिसने बैंको को लगभग दिवालिया बना दिया? और चुनौती दी कि “आइए एक दूसरे की आँखों में देखें और इसका उत्तर दें… क्या एक भी ऐसा लोन 2014 के बाद दिया गया है?” उन्होंने कहा कि बैंक कॉरपोरेट जगत को दिए गए ख़राब लोन की राशियों को छुपा रहे थे और बैंकों की वास्तविक स्थिति को देश से छुपाया जा रहा था। वित्तमंत्री ने प्रश्न किया कि जो पैसा उस समय दिया गया था उसको कैसे वसूला जाए?

“जो लोग यह समझते थे कि बैंक से पैसा लेना उनका अधिकार है, चाहे वे उसे वापस दें या ना दें, इनको सरकार ने कानून बनाकर दिवालिये लोगों की लाइन में खड़ा कर दिया। ये वो लोग है जो कल्पना करते थे कि कोई उन्हें छू भी नहीं सकता। यह सब 2009, 2010 और 2011 के पाप है जिन्हें हम धोने का प्रयास कर रहे हैं। कांग्रेस ने बैंकों को कमजोर कर दिया था जिसे सरकार सुधारने का प्रयास कर रही है।” आगे जवाब देते हुए कहा कि यूपीए ने मनरेगा पर 33000 करोड़ रुपये से कम खर्च किए थे, जबकि एनडीए ने इस साल अब तक 48000 करोड़ दिए हैं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना पर पिछली सरकार ने 9000 करोड़ रुपये खर्च किए, जबकि एनडीए ने इसे बढ़ाकर 28000 करोड़ कर दिया। फ़ूड सब्सिडी (लागत से कम भोजन या अन्न) पर यूपीए ने 92,000 करोड़ लगाए, जबकि एनडीए ने इस साल 1.35 लाख रुपये खर्च किए।

जीएसटी पर वित्त मंत्री ने बताया कि पुरानी कर व्यवस्था में एक व्यक्ति को 17 तरह के टैक्स देने होते थे जिनका टोटल 31 प्रतिशत बनता था। उसे जीएसटी के तहत तीन महीने में 28 प्रतिशत और फिर 18 प्रतिशत तक ले आए। फिर उन्होंने पूछा कि जब आप 31 प्रतिशत टैक्स लेते थे, तब आपको गब्बर सिंह नहीं याद आए? विपक्ष की आलोचना कि पेट्रोल को जीएसटी के दायरे में क्यों नहीं लाए, पर जेटली ने कहा कि आप अपनी पांच राज्य सरकारों से कहलवा दीजिए कि वे पेट्रोलियम को जीएसटी में डालने को तैयार हो जाएं।

जेटली ने आगे कहा कि जब पेट्रोल के दाम बढ़े तो केंद्र और सभी बीजेपी राज्य सरकारों ने ड्यूटी कम करके दाम घटा दिए, लेकिन यूपीए के एक भी राज्य में ड्यूटी कम नहीं की गई। विश्व बाजार में पेट्रोल के दाम 135 डॉलर से घटकर 65 डॉलर के जवाब में वित्त मंत्री ने पूछा कि क्या आप जानते हैं कि इस साल इंफ्रास्ट्रक्चर (सड़क, बिजली, बंदरगाह इत्यादि) पर कितना खर्च किया जा रहा है? कुल 3,96,000 करोड़ रुपये, जबकि क्या आपने कभी डेढ़ लाख करोड़ रुपये भी खर्च किया? नितिन गडकरी यहाँ बैठे हैं वो आपको बतायेंगे कि राष्ट्रीय राजमार्गों को आपने (यूपीए) ने किस स्थिति में छोड़ दिया था। जब गडकरी ने मंत्री के रूप में पदभार संभाला, तो पहले 17 टेंडर के लिए एक भी व्यक्ति ने जवाब नहीं दिया क्योंकि आपने (यूपीए ने) इस क्षेत्र को ऐसी खराब स्थिति में छोड़ दिया था कि सारे ठेकेदार दिवालिये हो गए थे।

उन्होंने कहा कि जो पेट्रोल का प्रयोग करते है, उनसे ही सड़क निर्माण की कीमत वसूली जाये। क्यों सरकार को इसकी कीमत आयकर में बढ़ोत्तरी करके वसूलनी चाहिए? वित्त मंत्री ने बताया कि जीएसटी से मिलनेवाले टैक्स का लगभग 80 प्रतिशत राज्य सरकारों को चला जाता है और राज्यों को जीएसटी के पूर्व मिलने वाले टैक्स पर 14 प्रतिशत की वृद्धि की गारंटी संविधान देता है, जबकि केंद्र को ऐसी कोई गारंटी नहीं मिली हुई है। विपक्ष के दिग्गज लोक सभा में बैठे थे। कोई कुछ भी नहीं बोल पाया, सब चुपचाप सुनते रहे। मैं कई बार वित्त मंत्री की आलोचना पढ़ता रहता हूँ, आज लिख रहा हूँ: बिना प्रधानमंत्री मोदी का भरोसा जीते वो इस पद पर नहीं रह सकते थे। वित्तीय व्यवस्था से अभिजात्य वर्ग की जड़ों को काटने योग्य बनाना आसान नहीं है। जीएसटी जैसे जटिल विषय को लागू करने में उनके जैसा एक्सपर्ट चाहिए था। मुझे उनकी बुद्धिमता, उनकी नीयत, उनके विवेक, और उनके राष्ट्र प्रेम में तनिक भी संदेह नहीं है।

(अमित सिंघल के फेसबुक पेज से साभार)

सुनिए अरुण जेटली का पूरा भाषण

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