इस्लाम का प्रचार कर रहा है ‘ज़ी न्यूज़ का अखबार’?

बायीं तरफ आप डीएनए अखबार की वो फर्जी खबर देख सकते हैं। दायीं तस्वीर बाबरी ढांचे पर विजय के मौके की हैं।

ज़ी ग्रुप के मालिक सुभाष चंद्रा भले ही खुद को राष्ट्रवादी बताते हों, लेकिन ऐसा लगता है कि उनका अखबार ‘डीएनए’ इस्लाम धर्म के प्रचार में लगा है। यह बात जानकर शायद आपको हैरानी हो, लेकिन लक्षण कुछ ऐसे ही दिखाई दे रहे हैं। सबसे पहले आपको बता दें कि अंग्रेजी अखबार ‘डीएनए’ को ज़ी और दैनिक भास्कर समूह मिलकर प्रकाशित करते हैं। अखबार के रोजमर्रा संपादकीय कामकाज में ज़ी के सुभाष चंद्रा की भी अच्छी-खासी दखलंदाजी होती है। 6 दिसंबर के दिन अखबार ने एक खबर अपनी वेबसाइट पर पोस्ट की जिसकी हेडलाइन है “Responsible for razing Babri Masjid, 3 guilt-ridden karsevaks have embraced Islam” यानी बाबरी मस्जिद को गिराने वाले तीन कारसेवकों ने इस्लाम कबूल कर लिया। यह श्रवण शुक्ला नाम के रिपोर्टर की खबर थी। सबसे पहले आपको बता दें कि श्रवण शुक्ला वही शख्स है जिसने कुछ दिन पहले खबर दी थी कि गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौत के केस में डॉक्टर कफील खान को बरी कर दिया गया। जबकि ऐसा नहीं था। श्रवण शुक्ला की ज्यादातर रिपोर्ट्स इस्लाम के महिमामंडन वाली मालूम होती हैं।

क्या है कारसेवकों के धर्मांतरण का दावा?

6 दिसंबर को डीएनए अखबार में छपी रिपोर्ट के मुताबिक बलबीर सिंह, योगेंद्र पाल और शिव प्रसाद नाम के तीन कारसेवकों ने इस्लाम कबूल कर लिया। इसमें कहा गया है कि पानीपत में शिवसेना का सदस्य रहा बलबीर सिंह भी बाबरी मस्जिद के गुंबद पर चढ़ा था। बाद में वो देवबंद में एक मौलाना की हत्या के लिए गया, लेकिन वहां पर मौलाना की बातें सुनकर उसका हृदय परिवर्तन हो गया। वहीं पर बलबीर ने मुसलमान बनने का फैसला कर लिया और वो मोहम्मद आमिर बन गया। बाद में उसका साथी योगेंद्र पाल भी धर्म बदलकर मोहम्मद उमर बन गया। अब दोनों ने कसम खाई है कि वो अपनी जिंदगी में कम से कम 100 मस्जिद बनवाएंगे या उनकी मरम्मत कराएंगे, ताकि वो अपना पाप उतार सकें। अखबार के मुताबिक बजरंग दल के सदस्य शिव प्रसाद तो डिप्रेशन में चला गया और उसे हर वक्त डर लगा रहता था कि मुसलमान आएंगे और उसे मार देंगे। उसका इलाज कराया गया लेकिन कोई कामयाबी नहीं मिली। बाद में उसने भी 1999 में शारजाह जाकर इस्लाम कबूल लिया और मोहम्मद मुस्तफा बन गया। जिसके बाद वो ठीक हो गया। रिपोर्टर श्रवण शुक्ला का दावा है कि आरएसएस ने शिव प्रसाद को धमकी दी थी कि वो भारत लौटा तो उसकी हत्या कर दी जाएगी।

क्या वाकई कारसेवक मुसलमान बन गए?

ज़ी ग्रुप के अखबार डीएनए में छपी इस रिपोर्ट को अगर पढ़ें तो समझ में आ जाएगा कि पत्रकार ने इन तीनों व्यक्तियों से मुलाकात या बातचीत नहीं की है। यहां तक कि खबर में इस्तेमाल की गई तस्वीरें भी यूट्यूब पर पड़े कुछ वीडियो से ली गई हैं। यूट्यूब पर कुछ मौलवी किस्म के लोगों ने ऐसे वीडियो पोस्ट कर रखे हैं जिनमें इस बात का दावा किया गया है। लेकिन उनका झूठ पहली नजर में ही समझ में आ जाता है। क्योंकि जो किरदार गढ़े गए हैं, वो वास्तविक नहीं हैं। ऐसा लगता है कि कुछ लोगों से एक्टिंग करवाकर वीडियो शूट किया गया है। क्योंकि अगर किसी कारसेवक ने धर्म बदल लिया होता तो यह संभव ही नहीं है कि बीते 20-25 साल में कोई लोकल अखबार भी उसकी खबर न छापे। अगर वाकई ऐसा होता तो कम से कम एनडीटीवी पर उसकी रिपोर्ट जरूर होती, ताकि वो साबित कर सकें कि इस्लाम ही असली सच है। हमने इंटरनेट के जरिए हिंदू और मुसलमान दोनों नामों की पड़ताल भी की, क्योंकि कोई भी जब धर्म बदलता है तो उसके पुराने नामों वाले दस्तावेज भी बदलते हैं। जिसकी निशानी इंटरनेट पर अपलोड किसी न किसी दस्तावेज में मिल जाती है। इन तीनों नामों का ऐसा कोई दस्तावेज हमें नहीं मिला।

प्रोपोगेंडा वीडियो पर बनी असली खबर

‘ग्रेटर कश्मीर’ नाम के एक प्रोपोगेंडा यूट्यूब चैनल पर 2006 के आसपास पहली बार ये वीडियो अपलोड किया गया है। इसमें मोहम्मद आमिर बता रहा है कि वो कैसे और क्यों मुसलमान बना। इस वीडियो में खुद को मोहम्मद आमिर बता रहे शख्स की बोली सुनें तो फौरन समझ में आ जाएगा कि ये आदमी शुरू हाल-फिलहाल में मुसलमान नहीं बना है। उसकी उर्दू भी एकदम साफ है। यह कैसे संभव है कि कोई अनपढ़ बीच उम्र में मुसलमान बने और ऐसी उर्दू बोलने लगे कि जैसी कोई आम मुसलमान भी नहीं बोल पाते। बाबरी ढांचे को तोड़ने वाले ज्यादातर कारसेवक अपने इलाकों में जाने-पहचाने जाते हैं, जबकि इन तीनों ही नामों का कहीं भी कोई जिक्र नहीं मिलता। 6 दिसंबर की तस्वीरों से साफ है कि हजारों लोग बाबरी गुंबद पर चढ़े थे और वो आज भी पूरे गर्व के साथ इस बात को स्वीकार करते हैं। बाबरी ढांचे की ईंटों को कई लोग अपने साथ निशानी के तौर पर ले गए थे और वो उन्हें बहुत गर्व के साथ आज भी अपने घरों में रखे हुए हैं। तो सवाल है कि ऐसे अपुष्ट वीडियो के आधार पर डीएनए जैसे अखबार में रिपोर्ट कैसे छप गई?

सवाल यह है कि डीएनए अखबार जिसके साथ सुभाष चंद्रा का नाम जुड़ा है उसमें हिंदू नाम वाला एक जिहादी रिपोर्टर आए दिन फर्जी खबरें छाप रहा है और कोई कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे? क्योंकि ऐसे मामलों से खुद सुभाष चंद्रा का नाम खराब हो रहा है। अगर मामले का कुछ और भी पहलू है तो वो उसके बारे में सही जानकारी सामने क्यों नहीं ला रहे?

(Opindia.com के इनपुट्स के आधार पर)

कृपया लेख कॉपी-पेस्ट न करें। कई लोग पोस्ट कॉपी करके फेसबुक और व्हाट्सएप पर शेयर कर देते हैं, जिससे वेबसाइट की आमदनी काफी कम हो गई है। राष्ट्रवाद की विचारधारा पर आधारित यह वेबसाइट बंद हो जाएगी तो क्या आपको खुशी होगी? कृपया खबरों का लिंक शेयर करें।
एक अपील: न्यूज़लूज़ के जरिए हम राष्ट्रवादी पत्रकारिता को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। इस वेबसाइट पर होने वाला खर्च बहुत ज्यादा है और हमारी आमदनी काफी कम। हम अपने काम को जारी रख सकें इसके लिए हमें आर्थिक मदद की जरूरत है। ये हमारे लिए ऑक्सीजन का काम करेगी। डोनेट करने के लिए क्लिक करें:

comments

Tags: , , ,