राहुल गांधी कैथोलिक ईसाई हैं, दावे की 5 बड़ी वजहें

ये तस्वीर यूपी चुनाव के वक्त की है, जब राहुल गांधी ने लखनऊ के सेंट जोसेफ कैथड्रल में प्रार्थना के बाद प्रचार की शुरुआत की थी।

गुजरात के सोमनाथ मंदिर में राहुल गांधी ने खुद को गैर-हिंदू के रूप में दर्ज करवाया। इसके साथ ही यह बहस चल पड़ी है कि आखिर राहुल गांधी का धर्म क्या है? अगर वो हिंदू नहीं तो किस धर्म को मानते हैं? ईसाई, इस्लाम या फिर कुछ और? कहीं ऐसा तो नहीं कि राहुल गांधी नास्तिक हैं? दरअसल राहुल गांधी के धर्म का विवाद नया नहीं है। उनके राजनीति में आने से पहले से ही ये सवाल खड़े होते रहे हैं। सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कई बार यह दावा किया है कि राहुल गांधी ईसाई हैं और वो दोहरी पहचान रखते हैं। स्वामी तो यहां तक दावा करते हैं कि 10 जनपथ में सोनिया गांधी ने एक चर्च बनवा रखा है और रविवार के दिन वहां पर बाइबिल के उपदेश पढ़े जाते हैं और पूरा गांधी परिवार इसमें शामिल होता है। इसके अलावा कुछ और घटनाएं भी हो चुकी हैं जिनसे यह पता चलता है कि संभवत: सोनिया गांधी के आने के बाद से गांधी परिवार कैथोलिक ईसाई धर्म से जुड़ चुका है। हम बताते हैं वो 5 बड़ी बातें जिनके आधार पर यह बात की जा रही है।

1. राहुल गांधी की है दोहरी पहचान

2014 में यह खबर आई थी कि कैंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज में राहुल गांधी की सारी पढ़ाई ‘राउल विंसी’ के तौर पर हुई है। वहां पर वो 1994 से 95 तक छात्र रहे थे। यूनिवर्सिटी की एलुमनी बुक में भी उनका यही नाम दर्ज है। कॉलेज की प्रिंसिपल ने डॉक्टर एलिसन रिचर्ड की तरफ से जारी एक चिट्ठी में भी राउल विंसी को कॉलेज में एमफिल का छात्र बताया गया है। हालांकि दलील दी जाती है कि ऐसा सुरक्षा कारणों से किया गया होगा। लेकिन सुब्रह्मण्यम स्वामी इस दलील को सही नहीं मानते। उनके मुताबिक राहुल गांधी के सर्टिफिकेट पर भी राउल विंसी नाम ही दर्ज है। उनका कहना है कि सुरक्षा के लिए नाम बदलने की दलील सही नहीं है, क्योंकि राहुल जब ट्रिनिटी कॉलेज में पढ़ते थे तो यह बात पूरे देश को पता थी, वहां रहने वाले भारतीय मूल के लोग भी जानते थे। यह भी पढ़ें: स्वामी का दावा, राहुल गांधी ब्रिटिश नागरिक

2. अमेरिका में राजदूत ने बोला सच

राजीव गांधी से शादी के बाद सोनिया गांधी ने नया नाम जरूर ले लिया था, लेकिन उन्होंने औपचारिक तौर पर कभी धर्मांतरण नहीं किया। यहां तक कि उन्होंने भारत की नागरिकता लेने में भी कई साल की देरी लगाई थी। 2011 में अमेरिका में भारतीय उच्चायुक्त मीरा शंकर ने वहां पर एक प्रोग्राम में दावा किया था कि सोनिया गांधी ईसाई हैं। उनका ये भाषण वहां के भारतीय दूतावास की वेबसाइट पर अपलोड भी किया गया था, लेकिन कुछ दिनों के अंदर ही भाषण के उस हिस्से को गायब करवा दिया गया। सवाल यह है कि अगर राजदूत ने कुछ गलत भी कहा था तो उस पर औपचारिक स्पष्टीकरण देने के बजाय लीपापोती क्यों की गई?

3. न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी सच्चाई

अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने 27 फरवरी 1988 में एक रिपोर्ट छापी थी, जिसमें उन्होंने सोनिया गांधी को रोमन कैथोलिक बताया था। इस रिपोर्ट में अखबार ने चर्च के हवाले से इस बात की पुष्टि की थी कि सोनिया गांधी ने खुद और अपने बेटे-बेटी को हिंदू या मुसलमान होने से बचाकर रखा है। सोनिया गांधी की तारीफ में छपे इस लेख में उनकी बढ़ती राजनीतिक ताकत का गुणगान किया गया था। यह लेख जब छपा था तो भारत में काफी हंगामा हुआ था। लेकिन कांग्रेस पार्टी ने इसका कभी खंडन नहीं किया। यह लेख आज भी अखबार की वेबसाइट पर पढ़ा जा सकता है।

4. ईसाई मिशनरी से खुला समर्थन

उत्तर प्रदेश चुनाव के वक्त यह बात सामने आई थी कि जहां कहीं भी राहुल गांधी की रैलियां होती थीं, वहां के लिए बसें भरकर भेजने में ईसाई मिशनरी भी जुटी हुई थीं। उत्तर प्रदेश में कई मिशनरी स्कूल और अस्पताल चलते हैं। राहुल गांधी की रैलियों में इन मिशनरीज पूरा हाथ बंटाया था। यह माना जाता है कि 10 साल के यूपीए शासन में देश में ईसाई मिशनरियों को खुलेआम धर्मांतरण की छूट दे दी गई थी।

5. शुरू से ही हिंदू विरोधी मानसिकता

विकीलीक्स के खुलासे में यह बात पता चली थी कि अमेरिकी डिप्लोमेट से बातचीत में राहुल गांधी ने कहा था कि भारत में इस्लामी आतंकवाद से बड़ा खतरा हिंदू आतंकवाद है। यह आरोप लगता रहा है कि राहुल गांधी ने ऐसे ही तमाम दूसरे विदेशी राजदूतों और पत्रकारों के जरिए हिंदू धर्म को लेकर दुष्प्रचार किया। उन्होंने एक बार कहा था कि जो लोग मंदिर जाते हैं वो लड़कियां छेड़ते हैं। इस बयान पर उनका काफी विरोध भी हुआ था।

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