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अमित शाह केस में जज की मौत पर मीडिया का झूठ

अंग्रेजी मैगजीन कारवां ने एक रिपोर्ट छापी है जिसमें सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले की सुनवाई कर रहे सीबीआई के स्पेशल जज बृजगोपाल लोया की मौत को लेकर सवाल खड़े किए गए हैं। इसमें जज की बहन के हवाले से दावा किया गया है कि परिस्थितियों से शक होता है कि ये सामान्य मौत नहीं बल्कि हत्या थी। जज बृजगोपाल लोया की एक दिसंबर 2014 को नागपुर में हार्ट अटैक से मौत हो गई थी। वहां पर वो एक साथी जज स्वप्ना जोशी की बेटी की शादी में गए थे। मैगजीन ने अपनी रिपोर्ट में कई ऐसे दावे किए हैं जिनसे बिना कहे यह समझ में आ जाए कि इस मौत के पीछे जरूर अमित शाह का हाथ है। रिपोर्ट में बड़ी सफाई से कुछ तथ्यों को छिपाया और कुछ खास बातों को उभारा गया है। ताकि यह साबित किया जा सके कि यह सामान्य मौत नहीं थी। जबकि ध्यान से देखें तो ये रिपोर्ट पूरी तरह शरारतपूर्ण और भ्रामक है।

हमेशा से निशाने पर अमित शाह

कारवां मैगजीन में छपी रिपोर्ट में क्या कमियां हैं ये हम आपको आगे बताएंगे, लेकिन पहले यह जानना जरूरी है कि हर चुनाव से पहले मीडिया का एक खास तबका कैसे अमित शाह को टारगेट करता है। 2012 में गुजरात चुनाव से पहले मीडिया ने अमित शाह के खिलाफ अभियान चलाया था, तब अमित शाह को सीबीआई ने 2010 में गिरफ्तार कर लिया गया था। उन्हें लंबे समय तक जेल में रखने की तैयारी थी। लेकिन केस इतना कमजोर था कि तब की केंद्र सरकार के भारी दबाव के बावजूद सीबीआई अमित शाह को ज्यादा दिन हिरासत में नहीं रख पाई और उन्हें सुप्रीम कोर्ट जमानत मिल गई। इसके बाद लोकसभा चुनाव के ठीक पहले अमित शाह के खिलाफ गुलेल.कॉम नाम की एक वेबसाइट के जरिए फर्जी ऑडियो जारी करवा कर यह साबित करने की कोशिश की गई कि अमित शाह ने एक लड़की की जासूसी करवाई। जबकि वो टेप काफी पहले से सीबीआई के पास था और कोर्ट ने उसे खारिज कर चुकी थी। उसी क्रम में अब जज की हत्या की कहानी लॉन्च की गई है।

‘कारवां’ की खबर झूठ आधारित

गुजरात और राजस्थान में सक्रिय कुख्यात अपराधी सोहराबुद्दीन को नवंबर 2005 में गुजरात पुलिस की एक टीम ने मुठभेड़ में मार गिराया था। सोहराबुद्दीन पांच राज्यों में वांटेड था। आरोप लगा कि मुठभेड़ फर्जी है। उस वक्त की कांग्रेस सरकार ने इस तब गुजरात के गृह मंत्री अमित शाह को फंसाने का सुनहरा मौका माना और केस की सीबीआई जांच करवाकर अमित शाह समेत राज्य के तमाम बड़े आईपीएस अफसरों और यहां तक कि राजस्थान के गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया को फंसाने की पूरी कोशिश की। इस केस की सुनवाई गुजरात के बाहर महाराष्ट्र में करवाई जा रही थी। ‘कारवां’ मैगजीन में निरंजन टाकले नाम के रिपोर्टर ने जताया है कि जज बृजगोपाल लोया की मौत का अमित शाह के बरी होने से कोई न कोई कनेक्शन जरूर है। कारवां मैगजीन में छिपी खबर में ढेरों कमियां थीं। इसीलिए किसी और चैनल या अखबार ने इसे हाथ नहीं लगाया। आखिर में मैगजीन के संपादक हरतोस सिंह बल ने कुछ वामपंथी एक्टिविस्टों के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। जिसके बाद द वायर, स्क्रोल, एनडीटीवी जैसे कुछ वामपंथी संस्थानों ने इस फर्जी खबर को आगे फैलाने का काम शुरू कर दिया। आइए देखते हैं इस इस फर्जी खबर को सही साबित करने के लिए कैसी-कैसी दलीलें दी गई हैं और उनका सच क्या है:

फर्जीवाड़ा नंबर-1 यह पूरी रिपोर्ट जज की बहन अनुराधा बियानी के हवाले से छापी गई है और दावा किया गया है कि उनकी पत्नी और बेटे डरे होने के कारण सामने नहीं आ रहे। यह बात अपने आप में संदेह पैदा करती है। क्योंकि बहन सीधे तौर पर पार्टी नहीं है। पूरी रिपोर्ट से यह साफ नहीं है कि बहन ने किस आधार पर ये सारे दावे किए हैं। घटना 2014 की है सवाल ये कि बहन ने तभी मुंह क्यों नहीं खोला? उन्होंने 2017 के गुजरात चुनाव तक का इंतजार क्यों किया?

फर्जीवाड़ा नंबर-2 यहां यह जानना जरूरी है कि लोया निचली अदालत के जज थे। अगर वो अमित शाह को दोषी ठहरा भी देते तो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचता। जहां से वो बरी हो सकते थे। या फिर अगर मान लें कि उन्होंने लोया की हत्या करवा दी तो भी क्या अमित शाह ने हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को भी फिक्स कर लिया? आज की स्थिति यह है कि अमित शाह इस केस में सुप्रीम कोर्ट तक से बरी हो चुके हैं। मामले में बार-बार एक ही दलील पेश करने के लिए याचिकाकर्ता हर्ष मंदार को सुप्रीम कोर्ट से फटकार भी लग चुकी है। 1 अगस्त 2016 को सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने फैसले में लिखा है कि “याचिकाकर्ता का इस मामले से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं। अगर ऐसा होता और वो वाकई इस एनकाउंटर से दुखी होता तो अलग बात थी। लेकिन उसने सिर्फ इस मामले को दोबारा जिंदा करने के मकसद से याचिका डाली है। ऐसा लगता है कि याचिका परेशान करने के मकसद से दाखिल की गई है।” कोर्ट ने यह भी माना कि अमित शाह का नाम इस केस में राजनीतिक कारणों से डाला गया है।

फर्जीवाड़ा नंबर-3 इस केस में अमित शाह के अलावा राजस्थान के गृह मंत्री गुलाबचंद कटारिया और कई बड़े आईपीएस अफसरों को फंसाया गया था। उनमें से ज्यादातर कोर्ट से बरी हो चुके हैं। तो क्या वो सभी भी जजों की हत्या से बरी हुए? या फिर उन सभी के जजों को पैसा देकर खरीद लिया गया?

फर्जीवाड़ा नंबर-4 जज बृज गोपाल लोया की मौत के बाद उनका पोस्टमार्टम किया गया था, जिसमें हृदयगति रुकने से मौत की पुष्टि की गई है। अगर किसी को भी इस पर शक था तो वो पोस्टमार्टम रिपोर्ट को कोर्ट में चुनौती दे सकता था। लेकिन न तो बहन और न ही प्रशांत भूषण जैसे लोगों ने उसे कोर्ट में चुनौती दी।

फर्जीवाड़ा नंबर-5 रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जज लोया उस शादी में जाना नहीं चाहते थे दो जज उन्हें जबर्दस्ती लेकर गए थे। उन दोनों जजों ने बाद में लोया के परिवार से संपर्क तक नहीं किया और गायब हो गए। अगर ऐसा था तो क्या कारवां मैगजीन को नहीं चाहिए था कि वो जजों से बात करते कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया? साथ ही उस जज से भी बात होनी चाहिए थी जिनकी बेटी की शादी में वो नागपुर गए थे। मैगजीन के पत्रकार ने इसकी कोशिश भी नहीं की है, क्योंकि इससे उसके झूठ की पोल खुल जाती।

फर्जीवाड़ा नंबर- 6 एक बड़ा झूठ यह भी है कि जिस रवि भवन गेस्ट हाउस में जज ठहरे थे वहां से उन्हें ऑटो से एक निजी अस्पताल ले जाया गया, जहां पर अस्पताल का ईसीजी काम नहीं कर रहा था। क्या रिपोर्टर को नहीं चाहिए था कि वो उस अस्पताल के मालिक से पूछें कि 1 दिसंबर 2014 को उनके अस्पताल का ईसीजी सिस्टम क्यों खराब था। लेकिन रिपोर्टर ने अस्पताल के मालिक या किसी डॉक्टर तक से बात करना जरूरी नहीं समझा। साथ ही यह भी सवाल उठता है कि क्या किसी को मरीज को जल्दी अस्पताल पहुंचाने के लिए ऑटो से ले जाना गलत है? यह बात साथी जजों से पूछी जानी चाहिए कि क्या कारण था कि वो जज साहब को ऑटो से अस्पताल ले गए। हो सकता है वो सही कारण बता दें।

फर्जीवाड़ा नंबर-7 इस पूरी कहानी में बेहद रहस्यमय तरीके से एक आरएसएस कार्यकर्ता ईश्वर बाहेती का नाम डाला गया है। दावा किया गया है कि उन्होंने ही परिवार को जज की मौत की जानकारी फोन पर दी थी और तीन दिन बाद वो ही जज का फोन लेकर परिवार को सौंपने के लिए लाए थे। सवाल ये कि अगर आरएसएस या उसके किसी व्यक्ति का इस हत्या से कोई भी संबंध होता तो वो खुद फोन लेकर क्यों जाते। हो सकता है कि किसी कारण वो वहां पर रहे हों और मदद की कोशिश की हो। ईश्वर बाहेती का नाम लिखा गया है लेकिन उनसे संपर्क करके जानने की कोशिश नहीं की गई कि उनका इस मामले से क्या ताल्लुक है। ईश्वर बाहेती फेसबुक और ट्विटर पर भी हैं।

फर्जीवाड़ा नंबर-8 मौत के समय को लेकर भ्रम फैलाने की कोशिश की गई है और कहा गया है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का समय 1 दिसबर 2014 को सुबह 6.15 बजे लिखा है। जबकि रिश्तेदारों का दावा है कि उन्हें सुबह 5 बजे फोन पर जानकारी दी गई थी। क्या यह पोस्टमार्टम करने वाले अस्पताल से नहीं पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने ऐसा क्यों किया? जितना हाईप्रोफाइल यह मामला है उसे देखते हुए परिवार के दावों की भी जांच की जानी चाहिए कि कहीं ऐसा तो नहीं कि 5 बजे फोन आने का उनका दावा गलत हो। बहन का दावा है कि उन्होंने शव पर खून के धब्बे देखे। इस बात की भी जानकारी पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर से ली जा सकती है कि उन्होंने इसका जिक्र अपनी रिपोर्ट में क्यों नहीं किया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर जिस कथित रिश्तेदार के दस्तखत हैं उसकी जांच भी आराम से की जा सकती थी।

फर्जीवाड़ा नंबर-9 जज लोया की बहन ने यह भी दावा किया है कि उस वक्त बांबे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस मोहित शाह ने उनके भाई को 100 करोड़ रुपये की रिश्वत ऑफर की थी। यहीं पर इस कहानी का पूरा झूठ समझ में आ जाता है। लोअर ज्यूडीशियरी के जज को खरीदने के लिहाज से यह रकम बहुत ज्यादा है। अमित शाह अगर चाहते तो इतने में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का फैसला प्रभावित करवा लेते। इतनी बड़ी रकम रखने वाला कोई व्यक्ति निचली अदालत के जज की हत्या क्यों करवाएगा? अगर हत्या ही करवानी होती तो उस जज की भी हत्या करवाई जा सकती थी, जिसने उन्हें गिरफ्तार करवाया था। कारवां की रिपोर्ट में जस्टिस मोहित शाह से भी बात करने की कोशिश नहीं की गई।

फर्जीवाड़ा नंबर-10 हमारी जानकारी के मुताबिक ये रिपोर्ट पहले द वायर में पोस्ट करने की तैयारी की गई थी। लेकिन वो पिछले कुछ दिनों से एक के बाद एक फेक न्यूज मामले में बदनाम हो चुका है, लिहाजा लोगों को भरमाने के लिए इस बार कारवां मैगजीन को चुना गया। कुल मिलाकर यह एक फर्जी खबर है जिसे मुख्यधारा के अखबार और चैनल भी समझ रहे हैं। इस खबर को फैलाने वाले ज्यादातर पत्रकार और मीडिया संस्थान वही हैं जिन पर कांग्रेस के पैसे पर चलने का आरोप लगाया जाता है।

कारवां मैगजीन की रिपोर्ट में ये 10 बड़ी कमियां वो हैं जिनके कारण आम तौर पर खबरें रोक ली जाती हैं। सवाल यह है कि अमित शाह जैसे बड़े नेता के खिलाफ एक ढीली-ढाली मूर्खतापूर्ण रिपोर्ट ऐन गुजरात चुनाव से पहले जारी करवाने के पीछे किसका हाथ है? कहीं अहमद पटेल तो नहीं, जिनके अस्पताल से हाल ही में आईएसआईएस के आतंकवादी पकड़े गए हैं?

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