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कारोबार में आसानी पर कांग्रेसी झूठ की पोल-खोल

दुनिया भर के देशों के बीच कारोबार करने में आसानी की रैंकिंग पर नई रिपोर्ट आई है। विश्व बैंक की तरफ से जारी होने वाली इस रिपोर्ट से यह पता चलता है कि दुनिया के कौन से देश में कारोबार करना ज्यादा आसान है। इस बात को जानने के लिए एक वैज्ञानिक तरीका इस्तेमाल किया जाता है। इसे ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस कहा जाता है। इस रिपोर्ट में भारत 130 से छलांग लगाकर 100 पर जा पहुंचा है। यहां जानना जरूरी है कि जब नरेंद्र मोदी सरकार सत्ता में आई थी तब यह रैंकिंग 142 थी। पिछले तीन साल में सरकार की कोशिशों की वजह से रैंकिंग में यह सुधार हुआ है। दुनिया के तमाम देशों में भारत सबसे तेज छलांग लगाने वाला देश बन गया है। लेकिन इस अच्छी खबर पर गर्व करने के बजाय कांग्रेस और उसके लिए काम करने वाले चैनल एनडीटीवी ने नया झूठ गढ़ना शुरू कर दिया।

झूठ नंबर-01

कांग्रेस और उसके भाड़े के पत्रकारों ने जो पहला झूठ गढ़ा वो ये कि ये रैंकिंग सच्चाई की सही तस्वीर नहीं दिखा रही। क्योंकि रैंकिंग में जिन मानकों के आधार पर है वो ही गलत है। यह दलील न सिर्फ गलत बल्कि बेवकूफी भरी है। सच्चाई यही है कि जो देश इस रैंकिंग में जितना ऊपर है वो उतना ही बिजनेस फ्रेंडली और उस लिहाज से समृद्ध है। इसके लिए नज़र डालते हैं उन देशों पर जो इस लिस्ट में टॉप पर हैं। न्यूजीलैंड और सिंगापुर इस लिस्ट में सबसे ऊपर हैं। ये दोनों देश आज कारोबार के लिहाज से सबसे पसंदीदा जगहों में से हैं। इनकी अर्थव्यवस्था में इस बात की छाप भी दिखाई देती है। लिस्ट में इसके बाद दक्षिण कोरिया, हॉन्गकॉन्ग, अमेरिका, ब्रिटेन, नॉर्वे, जॉर्जिया और स्वीडेन हैं। ये सभी देश संपन्न और कारोबार के लिहाज से अच्छे देश हैं। इसलिए यह कहना बिल्कुल गलत है कि भारत की रैंकिंग में 30 के सुधार से यहां के लोगों की जिंदगी पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

झूठ नंबर-02

दलील दी जा रही है कि ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस की रिपोर्ट में भारत के सिर्फ 2 शहरों दिल्ली और मुंबई में सर्वे किया गया। यह बात सही है कि दिल्ली और मुंबई को आधार बनाया गया। लेकिन यह भी सच है कि 190 देशों में 179 देशों के तो सिर्फ 1-1 शहरों को ही सर्वे में रखा गया। चीन के भी दो ही शहर सर्वे में थे- शंघाई और बीजिंग। अमेरिका के भी दो शहर ही लिस्ट में हैं- लास एंजिलिस और न्यूयॉर्क। शहरों को सैंपल के तौर पर रखा जाता है जिससे बाकी देश में स्थिति का अंदाजा लगता है। अगर भारत का अंदाजा गलत है तो अमेरिका और चीन की रैंकिंग सही कैसे हो गई?

झूठ नंबर-03

एक और बात कही जा रही है कि वर्ल्ड बैंक रैंकिंग की मेथडोलॉजी में हर साल बदलाव करता है इसलिए इसे सही कैसे मान लें। यह बात सरासर झूठ है। 2011 से इसके पैरामीटर में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया है। जिन मानकों को 2011 में आधार बनाया गया था वही आज भी हैं।

झूठ नंबर-04

लोगों की आंखों में धूल झोंकने के लिए कांग्रेसी पत्रकारों और नेताओं ने झूठ गढ़ा कि अगर रैंकिंग सुधरी है तो उसका नतीजा भारत में हो रहे निवेश में क्यों नहीं दिखाई दे रहा? यह सफेद झूठ बोलते समय उन्होंने विदेशी निवेश के ताजा आंकड़ों पर नज़र डालने की जरूरत नहीं समझी। साल 2016-17 में देश में 60 अरब अमेरिकी डॉलर का विदेशी निवेश हुआ है। जबकि 2014 में मनमोहन सिंह की विदाई के वक्त ये 36 अरब डॉलर पर था। आज रैंकिंग 100 है और तब ये 142 हुआ करती थी। अंतर साफ है।

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