रवीश कुमार को निखिल दाधीच का मुंहतोड़ जवाब

माननीय रवीश जी नमस्कार, आपका प्रधानमंत्री जी के नाम लिखा पत्र पढ़ा। आपके पहले के कई पत्र भी मैंने पढ़े हैं लेकिन यकीन मानिए अब आपके पत्र प्रभावित नहीं करते क्योंकि जब अन्तरात्मा पर एजेंडा हावी हो जाए तो अन्तरात्मा की आवाज़ दब जाती है। आपके साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा है। आप डरे हुए नहीं बल्कि परेशान ज्यादा नजर आ रहे है। किसी दूसरे से नहीं बल्कि अपने आप से अपनी स्वयं की अन्तरात्मा से। इंसान कितना भी कुछ भी कर ले उसकी अन्तरात्मा किसी एजेंडे को स्वीकार नहीं करती। वो स्वयं में स्वतंत्र रहना पसंद करती है। मेरे प्रकरण में आपको अपनी हार नजर आती है जबकि इसमें हार या जीत जैसा कुछ नहीं था। आपकी और मेरी विचारधारा बेशक अलग है लेकिन मेरे मन में किसी विपरीत विचारधारा वाले के लिए कोई द्वेष न था न है। मैं जब छोटा था आपकी तब की पत्रकारिता और अब की पत्रकारिता में विरोधाभास नजर आ रहा है। आप परेशान इसलिए हैं कि लोग अब आपको टीवी पर देखना पसंद क्यों नहीं करते।

जवाब आपकी अन्तरात्मा देती होगी लेकिन आप उसको सुनना नहीं चाहते। एक पत्रकार जब तटस्थ पत्रकारिता छोड़ कर एजेंडा लेकर चलने लगता है तो वो पत्रकार नहीं रह जाता। पत्रकार को हमेशा निष्पक्ष रहना चाहिए। आपको मेरे एक अदद ट्वीट से आपत्ति हुई या यूं कहूँ की उसके बाद से आपको मुझ जैसे साधारण इंसान में एक बड़ा शत्रु नजर आने लगा। आपने मेरे खिलाफ एक मुहिम चला दी कि जब तक मोदीजी मुझे अनफॉलो नहीं करते आप चैन से नहीं बैठेंगे। इंसान जब किसी पर आरोप लगाता है तो उसे हमेशा निष्पक्ष रहना होता है। मुझे सोशल मीडिया पर अभद्र भाषा पर आपकी आपत्ति जायज लगी पर सवाल ये है कि ये आपत्ति एकतरफा क्यों है? आपको प्रधानमंत्री जी द्वारा मुझे और अन्य लोगों को फॉलो किये पर आपत्ति है किंतु आप स्वयं मुहम्मद अनस जैसों को फॉलो करते है उनके साथ चाय पीते हैं। उनके किसी पोस्ट को फेसबुक द्वारा हटाने पर उसके समर्थन में खड़े होते हैं। आप दक्षिणपंथ समर्थकों की भाषा पर आपत्ति जताते है लेकिन वामपंथी या अन्य पार्टियों के समर्थकों की निम्नतम स्तर की भाषा पर चुप्पी साध लेते हैं।

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आपको मेरे एक अदद ट्वीट से तकलीफ होती है लेकिन वही शब्द जब अखिलेश प्रताप सिंह जी मेरे और मेरे परिवार के लिए प्रयोग करते है तो आप आंखें मूंद लेते हैं। दिग्विजय सिंह जी, मनीष तिवारी जैसे लोग प्रधानमंत्री के लिए अपशब्द कहते है तो आपको कोई आपत्ति नहीं होती उल्टे आप उन्हें भी फॉलो करते हैं। आश्चर्य!!! तहसीन पूनावाला जैसे लोग स्मृति ईरानी जी के लिए अभद्र भाषा बार बार प्रयोग करते है पर आप चुप रहते है। आप तो महिला सम्मान के हिमायती है फिर क्या कारण है कि स्मृति जी के लिए अभद्र भाषा पर आप कुछ नहीं बोल पाते। केजरीवाल प्रधानमंत्री जी को अपशब्द कहते है तो आपके अंदर का पत्रकार चादर तान कर सो जाता है। मेरे खिलाफ जैसी मुहिम आपने चलाई है वैसी केजरीवाल के समय आपके द्वारा कहीं देखने को नहीं मिली। आपने कभी भी ये मांग नहीं उठाई कि केजरीवाल को प्रधानमंत्री जी अनफॉलो करें। ऐसा क्यों रवीश जी? आप मुझ पर गालीबाज होने का आरोप लगाते है लेकिन खुद गालीबाज के समर्थन में फेसबुक पर लिखते है। खैर मुझे आपके विरोध से कोई आपत्ति नहीं है। मैं आपके विचारों से हो सकता है असहमत होऊं पर आपके विचार रखने की आपकी आजादी का सम्मान अवश्य करूँगा। यही कारण है मैंने आपकी किसी बात पर आपत्ति नहीं की। मेरा मानना है लोकतंत्र में सबको अभिव्यक्ति की आजादी है, बोलने की स्वतंत्रता है। कोई दूसरा इसे कभी नहीं छीन सकता।

आपको अक्सर शिकायत रहती है कि आज का युवा इतना उग्र स्वभाव का क्यों है?, पत्रकारों के प्रति वो नफरत की निगाह से क्यों रखता है? रवीश जी आज का युवा उग्र नहीं है वो शिक्षित और समझदार हो चला है वो खबरों पर आंख मूंद कर भरोसा नहीं करता बल्कि उनका अपने स्तर पर विश्लेषण करता है। वो दादरी में अखलाक के मारे जाने की खबर 24 घंटे देखता है तो उसे भी दुख होता है मगर सिक्के के दूसरी तरफ जब वो मुडबिडरी में प्रशांत पुजारी के मरने की खबर किसी भी जगह नहीं पाता तो उसे बड़ा आश्चर्य होता है। उसे और भी बुरा तब लगता है जब वो अलवर में पहलू खान तक पहुंच जाने वाले मीडिया और पत्रकारों को स्टूडियो से कुछ किलोमीटर दूर दिल्ली के डॉक्टर नारंग के यहां नहीं पाता। ऐसे में उसके मन में आक्रोश होना लाजमी है। इसके जिम्मेदार वो लोग है जो दोमुंही पत्रकारिता करते है। मीडिया को देश के लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है लेकिन बड़े शर्म के साथ कहना पड़ता है कि कुछ लोग पत्रकारों के भेष में इसे दीमक की तरह खाये जा रहे हैं। जिससे ये स्तंभ हाल के समय में कमजोर हो गया है।

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