बीएचयू के नाम पर सियासत और एक छात्र का दर्द

कैसे लिखूं कि देख रहा हूं कि सोशल मीडिया पर बीएचयू के विशेषज्ञ वो भी हो चुके हैं, जिनको 2014 के बाद पता चला है कि देश में बीएचयू नाम की कोई यूनिवर्सिटी भी है। जिसके नाम में हिंदू लगा है और संस्थापक नरेंद्र मोदी हैं। उनका मानना है कि यहाँ सिर्फ सांप्रदायिकता और जाहिलियत की शिक्षा दी जाती है। लड़कियों के लिए यहाँ स्पेशल जेल बनाया गया है और बीबीसी के अनुसार यहां दिन-रात मुस्लिम खतरे में पढ़ते हैं। मैं कैसे लिखूं ये देखकर कि कल लड़कियों के धरने में कुछ ऐसे भी लड़के थे, जो अकेले में किसी लड़की को देखकर ये बताना नहीं भूलते कि “वो मस्त आइटम हो चुकी है और उसे अब वो सब कुछ कर लेना चाहिए, जो उसने गलती से शादी बाद करने की सोच लिया है।”

मैं कैसे लिखूं उस कथित राष्ट्रवादी छात्रनेताओं की बातें पढ़कर जो कह रहे हैं कि “ये सारी लड़कियां साजिश के कारण आंदोलन कर रही हैं। ऐसी कोई समस्या नहीं है जी” मैं कैसे लिखूं स्त्री विमर्श के एक जानकार रिसर्च स्कॉलर की बातें पढ़कर, जिनके संकाय में एक प्रगतिशील प्रोफेसर ने सरेआम अपनी पत्नी की डंडे से पिटाई कर दी थी। और उसका वीडियो भी इसी फेसबुक पर तैरने लगा था। तब देश के तमाम बुद्धिजीवी, जो आज स्त्री विमर्श और आजादी नामक शब्दों की माला जप रहे हैं और बीएचयू की लड़कियों की सुरक्षा में मरे जा रहे हैं, वो उस समय प्रोफेसर साहब की रक्षा में हथियार लेकर खड़े थे। नहीं जी… सारा दोष तो पत्नी का है। पत्नी ही चरित्रहीन है। प्रोफेसर साहब तो गऊ आदमी हैं। वो तो एक महिला को रीतिकाल पढ़ा रहे थे जिस पर पत्नी ने सख्त आपत्ति की। उन्होंने तो बस उसे डंडे से हल्की पिटाई की है, हत्या थोड़े की है।

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यही सब देख-सुनकर बस चुप रहने का मन करता है। लेकिन कहे बिना रहे भी तो कैसे? बात ये है कि कोई कालेज हो या विश्वविद्यालय, कहीं के भी हालात इतने स्याह नहीं हैं जितना कुछ लोग हमे समझाते हैं और हालात इतने सफेद भी नहीं हैं जितना किसी संस्थान की महानता में गाये जाते हैं। अच्छाइयां-बुराइयां हर जगह समान रूप से मौजूद हैं। लेकिन इस पर ध्यान देना सबसे पहले जरूरी है कि अगर आपने राजदीप सरदेसाई और बरखा दत्त की रिपोर्टिंग देखकर अपने मन मे बीएचयू की छवि बना ली है तो आपने गलत चश्मा लगा लिया है। (पढ़ें: राजदीप सरदेसाई बीएचयू को बदनाम करने में जुटे हैं!) आपका ये जानना जरूरी है कि कि बीएचयू का मतलब कोई एक फैकल्टी, कोई एक हॉस्टल, कोई एक छात्र या कोई एक छात्र संगठन नहीं है। बीएचयू 1350 एकड़ में फैला एशिया का सबसे बड़ा आवासीय विश्वविद्यालय है। यहां दुनिया भर से आए करीब 50 हजार स्टूडेंट और टीचर, स्टाफ एक ही कैंपस में एक साथ रहते हैं। बीएचयू को अगर ठीक से घूमना हो और एक-एक चीज बारीकी से समझना हो तो मैं 2009 से अभी तक नहीं समझ पाया। आप आकर ट्राई मार सकते हैं।

इतना पता है मुझे कि यहाँ बस वो लड़कियां नहीं हैं जो हॉस्टल से रात को निकलने के लिए छटपटा रही हैं। यहाँ ईरान की वो एक लंबी और गोरी सी शोध छात्रा भी हैं जो रात को तुलसी घाट से 12 बजे ध्रुपद मेला देखकर अपने दोस्तों के साथ सकुशल अपने इंटरनेशनल हॉस्टल चली जाती है। यहाँ कोरिया के खू साँग मो भी हैं जो अपनी बीवी के साथ वाद्य सँगीत पर रिसर्च करने की सोच रहे हैं। संस्कृत, पेंटिंग और प्राच्य विद्या पढ़ने वाले हजारों विदेशी छात्र यहां सपत्नीक और सकुशल मौजूद हैं। जिनके छात्रावासों की सुविधाएं और आजादी हम जैसे सुविधाहीन छात्रों को विचलित करती हैं। यहां एक मैत्री जलपान गृह भी है जहां संदीप के समोसे का पैसा कब संगीता दे देती है किसी को पता नहीं चलता है। एक विश्वनाथ मंदिर भी है जहां के हनुमानजी की चाय के साथ उठ रहे कहकहों में कब कोल्ड काफी की गंभीर बातें घुल जाती हैं समझ में नहीं आता।

किसी सांझ इसी भव्य विश्वनाथ मंदिर के एक कोने से सालों से आ रही उस सूरदास की आवाज से निकलती रैदास की आवाज “प्रभु जी तुम चंदन हम पानी” कहीं गहरे में बेचैन कर जाती है। तब समझ में आता है कि महामना की कल्पना भी क्या अद्भुत थी। अरे! मनुष्य का जीवन बीएचयू की तरह ही ज्ञान योग, कर्मयोग और भक्ति योग का सुंदर सा संगम होना चाहिए। और वहीं एक मधुबन भी है… जहां एक पत्थर पर एक स्त्री के उरोजों और नितंबों को उकेरकर किसी मूर्तिकार ने समग्रता की बखूबी व्याख्या कर दी है… उसी मूर्ति के नीचे बैठकर आर्ट्स फैकल्टी के पवन कब कॉमर्स फैकल्टी की पूजा को चुम्मा दे देते हैं। इस पर शोध होना अभी भी बाकी है। अभी भी झाड़ियों और झुरमुटों में दर्जनों पवन और पूजा बैठे मिलेंगे। जिनकी आंखों में उमड़ रहे प्रेम के आगे हर शब्द बौने हैं।

आईआईटी, मेडिकल से लेकर मैनेजमेंट के लड़के-लड़कियां तो रात को 12 बजे अपना जन्मदिन अस्सी घाट पर मना लेते हैं। एक शांभवी के गाल में शाश्वत ने केक क्यों लगाया इस पर दो बजे तक बहस भी कर लेते हैं। यहां एक बिड़ला और ब्रोचा भी हैं, एक आचार्य नरेंद्रदेव और झा हॉस्टल भी।
जिसके इतिहास-भूगोल की किताबें बम, गोली, कट्टा, पिस्तौल, गांजा, दारू, धरना, तोड़-फोड़, मार-पीट, छेड़खानी और नेतागिरी के बेहिसाब बातों से भरी हैं। जहां कभी-कभी पढ़ाई छोड़कर सब कुछ होता है..लेकिन इन्हीं हॉस्टलों से निकली प्रतिभाओं ने देश के कितने शीर्ष पदों को सुशोभित किया है इसकी गिनती करना मुश्किल है।

और आपको लगता है यहां बस लड़कियों को ही नॉनवेज नहीं मिलता है? उनके लिए वाई-फाई नहीं है? हॉस्टल से निकलने नहीं दिया जाता है? शॉर्ट्स नहीं पहनने दिया जाता। इसी का मतलब बीएचयू है तो आप भ्रम में जी रहे हैं। आपको कभी कैंपस के बाहर बने मेरे ब्वॉयज हॉस्टल में भी आना चाहिए।
जहां लाइट चली जाए तो लड़के अंधेरे में बांसुरी बजाकर लाइट आने का इंतजार करते हैं। नॉनवेज का नाम लेना भी जहाँ पाप है। जहां सब्जी आलू की है कि टमाटर की इसका अध्ययन इतनी बारीकी से होता है कि खाना खाने के बाद ये एहसास हो जाता है कि जीवन में अगर असफल हुए तो मेस या कैंटीन चलाएंगे। इस कारोबार में फायदा बहुत है।

जहाँ बस साफ-सुथरी रोटी-सब्जी, चावल, दाल के लिए रोज संसद की बहसों को मात करती बहस होती है। रोज कोई लड़का खाना खाकर बीमार पड़ जाता है और रोज सोचता है कि भले खाने बिना मर जाऊंगा, लेकिन आज के बाद मेस में नहीं खाऊंगा। ये अलग बात है कि सुबह 11 बजे उठकर ये सोचता है कि चलो जल्दी से खा लें आधे घंटे बाद क्लास है। जहां वाई-फाई, खेल का सामान और कंप्यूटर आज तीन साल से आ रहे हैं। आगे कितने साल में पहुंचेंगे ये मालवीय जी भी नहीं बता सकते। लेकिन बात ये है कि इन लड़कों का इंटरव्यू लेने कौन आएगा? और ये धरना करने कहाँ जाएंगे? क्या बरखा जी और राजदीप जी आएंगे यहां? नहीं आएंगे। आपको पता है क्यों… क्योंकि इन जैसे मीडिया वालों को न बीएचयू से मतलब है न किसी लड़के-लड़की से। इनको तो बस अपने दो कौड़ी के एजेंडे और तीन कौड़ी की टीआरपी से मतलब है। जिसके लिए लड़कियाँ आसानी से कंधा बन जाती हैं। न ऐसी रिपोर्टिंग से बीएचयू का भला होता है न छात्र-छात्राओं के किसी समस्या की मूल वजह पर ध्यान जाता है।

बात बस इतनी ही है। अब ये आप पर है कि किस बीएचयू को बीएचयू मानते हैं। ये आप पर है कि आपके पैमाने क्या हैं? आप कहाँ देख रहे हैं। आप क्या देख रहे हैं। आप किस समस्या को समस्या मान रहे हैं। दुख इस बात का है कि छेड़खानी जैसी सामाजिक और मानवीय स्तर की समस्या को भी आप वामपंथ और दक्षिणपंथ के चश्मे से देख रहे हैं। इतने संवेदनशील मुद्दे पर भी राजनीति करने से चूक नहीं रहे हैं? आप ही बताइये न लोग कहाँ सुरक्षित हैं? केरल में आरएसएस के संदीप सुरक्षित हैं या कर्नाटक में गौरी लंकेश? बिहार में राजदेव रंजन सुरक्षित हैं या त्रिपुरा में वो युवा पत्रकार, जिसकी कुछ दिन पहले हत्या हो गई। लड़कियां कहाँ असुरक्षित नहीं हैं? क्या अपने घर में सुरक्षित हैं? क्या उस जेएनयू में सुरक्षित हैं जहां की आजादी और प्रगतिशीलता की बार-बार दुहाई दी जाती है? जहाँ कब कामरेड अनमोल किसी लड़की को फिल्म दिखाने के बहाने रेप कर डालते हैं पता ही नहीं चलता। या फिर एंटी रोमियो स्क्वायड वाले यूपी के बलिया जिला में सुरक्षित हैं? जहाँ पता न कब राह चलता एक मनचला एक रागिनी की सरेआम हत्या कर देता है।

गौर से देखिए देश-परदेश, गांव-नगर, शहर के स्कूल-कॉलेज, विश्वविद्यालय, बस-ट्रेन, घर-दुआर आज सब इस तरह की समस्याओं से रोज जूझ रहे हैं।
दुख की बात है कि कोई समस्या के मूल की तरफ ध्यान नहीं देना चाहता। क्योंकि बहुतों को समस्या के खत्म होने में रुचि नहीं है। समस्या के बने रहने में रुचि है। यही समस्या तब और बड़ी हो जाती है जब आप और हम इनमें से अपने मन-मिजाज के अनुसार समस्याएं चुनकर उस पर हल्ला करना शुरू कर देते हैं। अरे आंदोलन और बहस इस पर होना चाहिए कि लड़के किसी लड़की को सेक्स ऑब्जेक्ट के रूप में देखना कब बंद करेंगे? कब सोचना शुरू करेंगे कि रास्ते में जो लड़की जा रही है उसका चेहरा कहीं न कहीं हमारी मां-बहन से भी मिलता है।

डिबेट कब होगी कि समाज में बढ़ती हुई अंधी कामुकता पर रोकथाम कैसे किया जाए? हम कहाँ चूक रहे हैं? क्या घर के संस्कार में दोष है या हमारे एजुकेशन सिस्टम में दोष है जो हमें ज्ञान तो दे रहा है लेकिन विवेक नहीं दे रहा है? देशभर के आईआईटी और आईआईएम में बड़े-बड़े शोध हुए, अब इस पर कब शोध कब होगा कि किसी कालेज के कैंपस को टेक्नोलॉजी से इतना विकसित कैसे बनाया जाए की वहाँ छात्र-छात्रा आजादी और अनुशासन में एक समन्वय बनाकर पढ़ाई कर सकें। ताकि लड़कियां इस तरह रोज अपनी इज्जत बचाने के लिए पढ़ाई छोड़कर धरना प्रदर्शन न करें। बहुत बातें हैं, लेकिन सबसे मुख्य बात ये है कि हमारे समाज की संरचना ही विक्षिप्त हो चुकी है। हर आदमी सोच रहा है कि बस मेरी बेटी-बहन सुरक्षित रहे बाकी के साथ छेड़खानी हो जाए तो कोई बात नहीं। विरोध और समर्थन तो हम जाति, धर्म और पार्टी देखकर करेंगे।

इस सोच को बदलना होगा और इन विकृतियों की जड़ों पर प्रहार करना होगा। इस समाज को सृजनशील बनाना होगा ताकि लोग जरा संवेदनशील भी बन सकें। जरा आदमी बन सकें। तभी कुछ होगा। वरना धरना प्रदर्शन में हल्ला करके कैंडिल तो दामिनी के समय भी खूब जलाए गए थे, दुर्भाग्य से आज भी जला रहे हैं। रेप और छेड़खानी कि घटनाएं न तब रुकी थीं न आज रुकी हैं और लोगों का यही हाल रहा तो कल भी नहीं रुकेंगी।

बड़े दुःख के साथ… एक मित्र के कहने पर कि आपने छात्र होकर भी बीएचयू के बारे में नहीं लिखा।

(अतुल कुमार राय की फेसबुक वॉल से साभार)

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