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रोहिंग्या प्रेमियों, हां… हिंदुस्तान हमारे बाप का ही है!

पुराने ज़माने में राजा महाराजा अपने साथ एक भाट कवि अवश्य रखते थे, जो हमेशा उनके साथ मौजूद रहते थे। उनका काम था राजा की प्रशंसा में कविताएं लिखना। इससे होता कुछ नहीं था बस राजाओं के अहम् को संतुष्टि मिलती थी। इसके एवज में उन्हें बेशुमार दौलत मिलती थी। उस इनाम के लालच में ये भाट लोग कुछ भी फेंक देते थे। मान लो किसी युद्ध में राजा का घोड़ा गिर पड़ा तो ये भाट लोग ये नहीं कहेंगे कि घोड़ा थक गया उसे भोजन या पानी की जरूरत है वो ये कहते थे “वाह-वाह सम्राट जी आपका स्टेमिना तो देखो ये घोड़ा मर गया आप अभी तक नहीं थके। वाह सम्राट वाह” और सम्राट जिनके पास मुश्किल से 10 हजार एकड़ की जागीर होती थी खुश होकर गले के हार तोड़ कर दे दिया करते थे।

जैसे-जैसे समय बीतता गया ये साइकोलॉजी की एक कला बन गई। जिससे आपको काम निकलवाना हो उसकी प्रशंसा कीजिए। खुद को उससे निर्बल और बेसहारा बताइए और आसानी से अपना काम निकलवा लीजिए। इस ट्रिक का बेस्ट उदाहरण अल्लामा इक़बाल थे। उन्होंने जितना मूर्ख इस देश के मूल नागरिकों को बनाया उतना शायद ही किसी ने बनाया हो। उन्होंने कहा “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा”। हमारे पूर्वज एकदम फ़्लैट हो लिए। बोले “सही बात है भिया। भोत सई कै रिये हो मियाँ। तुमाये जैसे आदमी की भोत जरूअत ए इतै”। फिर इक़बाल ने कहा “राम है इमाम-ए-हिन्दोस्तां” तो हमारे पूर्वज और फूल के कुप्पा हो गए। बोले “जे बन्दा तौ है भिया खुदा का भेजा हुआ चराग… सारे हिन्दोस्तां में जे फैलाएगा अमन की रौशनी”। और लेके पहुँच गए मिट्टी का तेल। के इस चराग को अब बुझने न देंगे। यह भी पढ़ें: हमने इंसानियत के नाते शरण दी, वो जिहाद करने लगे

तब तक भैया इक़बाल ने बोल दिया “यूनान मिस्र रोमां सब मिट गये जहाँ से… कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी …” बस इत्ते में हमारे पूर्वज फूल के फट गए। इक़बाल को तुरंत गंगा जमना तहजीब का फटा हुआ तहमद घोषित कर दिया गया। वो तो बलास्फेमी का डर कायम था काफिरों में वरना उनका बस चलता तो पैगंबर ही बना के छोड़ते अल्लामा को। खैर हमारे पूर्वज अल्लामा को ‘सेकंड सन ऑफ़ गॉड’ घोषित करने ही वाले थे कि इतने में खबर आ गई कि अल्लामा की औलादें तो पाकिस्तान लेकर हिन्दोस्तां से अलग हो गईं और जाहिल हिन्दोस्तानियों को उन्होंने 15 लाख काफिरों की लाशें तोहफे में भेजी हैं। जो कहते थे कि “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी” वही लोग हमारे जिगर के टुकड़े लाहौर, कराची से हमारी हस्ती मिटा चुके थे। आज भी वहां हमारी कौम के मरे हुए वाशिंदे अपनी रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार तक के लिए महरूम हैं।

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