क्या तीन तलाक पर बोल के गलती कर रहे हैं हिंदू?

मुसलमानों में तीन तलाक और फिर हलाला की परंपरा इन दिनों खबरों में है। इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। बीजेपी सरकार खुलकर इसका विरोध करती रही है। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले से इस मुद्दे का जिक्र किया और मुस्लिम महिलाओं से सहानुभूति जताई। लेकिन क्या ऐसा करना उचित है? तीन तलाक और हलाला जैसे मुद्दों पर टीवी चैनलों पर होने वाली बहसों में ज्यादातर हिंदू लोग ही इसका विरोध करते नजर आते हैं। कुछ मुस्लिम महिलाएं जरूर मुखर हैं लेकिन उनकी भी अपनी हद है। जबकि तीन तलाक और हलाला के समर्थन में ज्यादातर मुसलमान एकजुट हैं। यहां तक कि तथाकथित पढ़े-लिखे मुसलमान भी तीन तलाक के बचाव में ही दलीलें देते नजर आते हैं। उन्हें नहीं लगता कि ये उनके समाज की बुराई है और इसका खात्मा होना चाहिए। यह भी पढ़ें: इस्लाम को छोड़ क्यों रहे हैं मुसलमान

तीन तलाक जारी रहना अच्छा है!

तीन तलाक और हलाला ऐसी परंपराएं हैं जिनका ज्यादातर मुस्लिम देशों में भी पालन नहीं होता। लेकिन भारत में मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति और समान नागरिक कानून से बचने के चक्कर में यह बेरोकटोक चल रहा है। हाल ही में एक न्यूज़ चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन में दिखाया कि कैसे मुल्ले-मौलवी हलाला के नाम पर अपना धंधा चला रहे हैं। इस पर होने वाली टीवी बहसों में शामिल मौलवियों ने हिंदुओं में जाति प्रथा से लेकर गोरखपुर में ऑक्सीजन की कमी से बच्चों की मौत तक की दलीलें दीं। मतलब ये हुआ कि वो अपने समाज के अंदर सुधार से ज्यादा उन दूसरे मामलों में रुचि रखते हैं जिनसे उनको फायदा हो सकता है। मसलन आए दिन सुनने को मिलता है कि दलित समाज के लोगों ने इस्लाम कबूल लिया। ये अलग बात कि इस्लाम में भी जाति की जगह फिरके हैं। इस्लाम में कुल 72 फिरके हैं और सारे खुद असली और बाकी को घटिया मानते हैं। आए दिन होने वाला शिया-सुन्नी-अहमदिया जैसे झगड़े इसी की मिसाल हैं। इनमें से ज्यादातर बड़े फिरके हिंदू धर्म से नफरत के आधार पर टिके हैं। यह भी पढ़ें: मुसलमान मर्द से शादी के 3 बड़े खतरे

‘घर वापसी’ की तैयारी जरूरी

ऐसे वक्त में जब दुनिया के ज्यादातर धर्म अपने अंदर की कुरीतियों और बुराइयों को दूर करने के लिए बेचैन हैं, सिर्फ इस्लाम ही है जो इन पर गर्व करता है। इसी जाहिलियत का नतीजा है कि बीते कुछ साल में इस्लाम छोड़ने वालों की संख्या बढ़ी है। अभी ये चलन ज्यादातर यूरोप में देखने को मिलता है, लेकिन बहुत जल्द ये एशिया और अफ्रीका में भी होगा। भारत में हमें इसकी तैयारी अभी से शुरू कर देनी चाहिए। हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध जैसे सनातनी परंपरा के धर्मों को खुद की बुराइयों को छोड़कर ज्यादा आकर्षक बनाने की कोशिश करनी चाहिए। इससे बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं और उनसे जुड़े कुछ पुरुष भी धर्मांतरण के लिए प्रेरित होंगे। तीन तलाक देकर छोड़ी गई कई महिलाएं चोरी-छिपे ही सही आर्य समाज जैसी संस्थाओं के जरिए धर्मांतरण कर भी चुकी हैं। लेकिन अभी ऐसा सिर्फ उन इलाकों में हो रहा है जहां मुसलमानों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं है। धर्मांतरण करने वाले लोगों के पुनर्वास की व्यवस्था भी जरूरी है, ताकि ऐसा न हो कि उन्हें इस्लाम छोड़ने के बाद परेशानियां उठानी पड़ें। यह भी पढ़ें: मीम-भीम एकता पर एक मुस्लिम महिला के चंद सवाल

मुसलमानों का एकता खतरनाक

जब-जब तीन तलाक, हलाला या कॉमन सिविल कोड का मुद्दा उठता है मुसलमानों के सारे फिरके एकजुट होकर विरोध करते हैं। जबकि इसके बिना उनके बीच हमेशा अंदरूनी झगड़े ही चलते रहते हैं। एक विध्वसंक धर्म को इस तरह से एकजुट होने का मौका देना ठीक नहीं है। बेहतर हो कि मुसलमानों को उनके अपने हाल पर छोड़ दिया जाए। बाकी समाज जिस तेजी से तरक्की कर रहे हैं उसका असर मुसलमानों के अंदरूनी असंतोष के तौर पर बहुत जल्द दिखाई देने लगेगा।

मुस्लिम महिलाओं की पढ़ाई जरूरी

यह एक ऐसा मुद्दा है जिसे मुस्लिम कट्टरपंथी अच्छी तरह समझते हैं। वो जानते हैं कि ज्यादातर पढ़ी-लिखी महिलाएं उनको चुनौती दे सकती हैं। इसीलिए पढ़े-लिखे मुस्लिम परिवार भी अपनी लड़कियों को स्कूली शिक्षा के आगे ले जाना पसंद नहीं करते। हाल ही में केंद्र सरकार ने एक योजना शुरू की है, जिसके तहत मुस्लिम लड़कियों को शादी पर 50 हजार रुपये दिए जाएंगे, लेकिन शर्त है कि उन्हें ग्रेजुएट होना जरूरी है। कट्टरपंथियों ने फौरन भांप लिया कि ऐसा हुआ तो आगे चलकर उनका धंधा चौपट हो जाएगा, लिहाजा मौलवियों ने विरोध शुरू कर दिया।

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