गोरखपुर का डॉक्टर कफील हीरो नहीं खलनायक है!

शुक्रवार को दिन में टाई-कोट पहने डॉ कफील रोते-बिलखते परिजनों के आसपास खड़े होकर रोनी सूरत बनाकर तस्वीरें खिंचाते रहे। मेडिकल कॉलेज के कई कर्मचारी उनके इस तमाशे के गवाह हैं।

गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में कई बच्चों की मौत के बाद जिस डॉक्टर कफील अहमद को हीरो बनाने की कोशिश हो रही है उनकी सच्चाई भी सामने आ रही है। मेडिकल कॉलेज से जुड़े कई लोगों ने उन मीडिया रिपोर्ट्स पर हैरानी जताई है जिनमें कफील को किसी फरिश्ते की तरह दिखाया गया है। जबकि सच्चाई बिल्कुल अलग है। डॉ कफील मोहम्मद बीआरडी मेडिकल कॉलेज के इन्सेफेलाइटिस डिपार्टमेंट के चीफ नोडल ऑफिसर हैं। वो मेडिकल कॉलेज से ज्यादा अपनी प्राइवेट प्रैक्टिस के लिए जाने जाते हैं। आरोप है कि वो अस्पताल से ऑक्सीजन सिलेंडर चुराकर अपने निजी क्लीनिक पर इस्तेमाल किया करते हैं। न्यूज़लूज़ को मिली जानकारी के मुताबिक कफील और प्रिंसिपल राजीव मिश्रा के बीच गहरी साठगांठ थी और दोनों इस हादसे के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं। लेकिन बच्चों की मौत के बाद उसने मातम मना रहे कुछ मां-बाप के पास खड़े होकर रोनी सी शक्ल बनाकर फोटो खिंचवा ली और अपने करीबी पत्रकारों की मदद से फर्जी खबरें छपवा दीं।

मीडिया में पैठ का उठाया फायदा!

डॉ. कफील मेडिकल कॉलेज की खरीद कमेटी का मेंबर है। उसे भी ऑक्सीजन सप्लाई की स्थिति के बारे में पूरी जानकारी थी। दो दिन पहले जब सीएम योगी आदित्यनाथ मेडिकल कॉलेज के दौरे पर आए थे वो भी उनके इर्द-गिर्द घूम रहा था। लेकिन उसने भी उन्हें ऑक्सीजन की बकाया रकम के बारे में कुछ नहीं बताया। मेडिकल कॉलेज के कई कर्मचारियों और डॉक्टरों ने इस बात की पुष्टि की है कि डॉक्टर कफील वहां होने वाली हर खरीद में कमीशन लेता था और उसका एक तय हिस्सा प्रिंसिपल राजीव मिश्रा तक पहुंचाता था। ऑक्सीजन कंपनी पुष्पा सेल्स के साथ चल रहे विवाद में भी राजीव मिश्रा के साथ कफील का बड़ा हाथ था। हमने जितने लोगों से भी बात की उनमें से ज्यादातर का यही कहना था कि डॉक्टर राजीव मिश्रा, उनकी पत्नी पूर्णिमा शुक्ला और डॉ. कफील अहमद सारे हादसे के असली दोषी हैं।

कफील की भूमिका की जांच जरूरी

मेडिकल कॉलेज के कई कर्मचारियों ने हमें बताया कि शुक्रवार को जब बच्चों की मौत की खबर पर हंगामा मचा तो कफील अपने प्राइवेट अस्पताल में थे। वहां से उन्होंने कुछ सिलेंडरों को अस्पताल भिजवा दिया। क्योंकि ये वो सिलेंडर थे जो वो खुद मेडिकल कॉलेज से चोरी करके ले गए थे। उन्होंने मीडिया को बताया कि इन सिलेंडरों का इंतजाम उन्होंने अपनी जेब से किया है। जबकि ऐसा कुछ नहीं था। एक डॉक्टर जो खुद परचेज कमेटी का मेंबर हो वो ऐसा करने के बजाय सरकारी तरीके से पहले ही सिलेंडर खरीद सकता था। दिन में भी जब मीडिया पहुंची तो बार-बार कफील ही बाहर आकर मीडिया से बात करने लगे। जबकि वो इसके लिए अधिकृत नहीं हैं। बाकी डॉक्टरों का ध्यान बच्चों की देखभाल में था, लेकिन कफील का ध्यान मीडिया पर था। आखिरकार उन्होंने अपने बारे में झूठी खबरें प्लांट करके खुद को पूरे वाकये का हीरो बनवा ही लिया।

ऐसी तमाम फर्जी खबरें मीडिया में छपी हैं। इन्हें देखकर मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर और कर्मचारी हैरान हैं कि खुद प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाला और ऑक्सीजन खरीद के लिए जिम्मेदार व्यक्ति कैसे हीरो बन गया।

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