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कांग्रेसी हामिद अंसारी जाते-जाते घोटाला कर गए!

कांग्रेस पार्टी से जुड़े रहे हामिद अंसारी उपराष्ट्रपति पद से विदा हो रहे हैं। ये वो आखिरी संवैधानिक पद था जिस पर अब तक कोई कांग्रेसी बैठा हुआ था। हामिद अंसारी पर आरोप है कि उन्होंने उपराष्ट्रपति रहते हुए अपने मातहत आने वाले राज्यसभा टीवी में बड़े पैमाने पर घोटालों को होने दिया। न्यूज़लूज़ को मिली खबर के मुताबिक हामिद अंसारी ने राज्यसभा टीवी के नाम पर अपने करीबियों को गलत तरीके से फायदा पहुंचाया। राज्यसभा टीवी में यह कथित घोटाला पीएम नरेंद्र मोदी की सरकार आने के पहले से चल रहा था। नई सरकार को भी इसकी पूरी जानकारी थी लेकिन संवैधानिक पद की गरिमा का मामला देखते हुए सरकार ने कभी भी औपचारिक तौर पर इस मामले में दखल नहीं दिया। क्योंकि तकनीकी तौर पर राज्यसभा से जुड़े सभी वित्तीय अधिकार उपराष्ट्रपति के तहत आते हैं। उसे कोई फैसला लेने के लिए केंद्रीय कैबिनेट पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।

कांग्रेस का आखिरी घोटाला?

वैसे तो सत्ता से बाहर होने के तीन साल बीतने के बाद भी मनमोहन सरकार के दौरान हुए घोटालों का बाहर आना जारी है, लेकिन राज्यसभा टीवी घोटाले को एक तरह से आखिरी घोटाला मान सकते हैं। क्योंकि ये आखिरी संस्था थी जिसमें अब तक कांग्रेस का कब्जा था। 2011 में शुरू हुआ राज्यसभा टीवी चैनल शुरुआत से ही घोटालों का अड्डा रहा। हामिद अंसारी ने अपने करीबी अफसर गुरदीप सप्पल को इसका सीईओ बनाया। चैनल के कामकाज की जानकारी रखने वाले एक सूत्र का दावा है कि “गुरदीप सप्पल ने चैनल में योग्यता के बजाय कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं को भर्ती किया। भर्ती के लिए इंटरव्यू तो आयोजित किए गए, लेकिन उनमें आए योग्य और पेशेवर उम्मीदवारों को अपमानित करके भगा दिया जाता था। जिन कांग्रेसी और कम्युनिस्टों को भर्ती किया गया उन्हें तनख्वाह के तौर पर मोटा पैकेज दिया गया। इनमें से ज्यादातर लोग अयोग्य और नौकरी से निकाले गए लोग थे। जबकि इतनी रकम बड़े-बड़े सरकारी अधिकारियों को भी नहीं मिलती।”

क्या है राज्यसभा टीवी घोटाला?

राज्यसभा टीवी का पहला काम है राज्यसभा की कार्यवाही का प्रसारण करना। इसके अलावा वो संसदीय कार्य से जुड़े कार्यक्रम और अन्य समसामयिक कार्यक्रम भी दिखा सकता है। लेकिन इस पर लाखों रुपये का बजट खर्च करके ऐसे कार्यक्रम दिखाए जाते रहे जिनका संसदीय लोकतंत्र से कोई लेना-देना नहीं था। चैनल पर कई कांग्रेसी पत्रकारों को बतौर एक्सपर्ट बुलाकर उन्हें हर महीने मोटी पेमेंट की गई। इसके अलावा कांग्रेस के कई वफादार पत्रकारों को गेस्ट एंकर की तरह रखा गया। इन्हें छोटे से कार्यक्रम के बदले हर महीने लाखों रुपये बतौर फीस दी जाती रही। इन संपादकों में द वायर के एमके वेणु, कैच के भारत भूषण, इंडियास्पेंड.कॉम के गोविंदराज इथिराज और उर्मिलेश जैसे नाम थे। ये सभी कांग्रेस के तनखैया पत्रकार माने जाते रहे हैं। इन सब फिजूलखर्ची के कारण राज्यसभा टीवी का बजट लोकसभा टीवी के मुकाबले कई गुना ज्यादा था।

जनता के पैसे से फिल्म बनवाई!

कार्यकाल के आखिरी वक्त में सीईओ गुरदीप सप्पल ने रागदेश नाम से एक फिल्म बनवाई। बताते हैं कि इस फिल्म में राज्यसभा टीवी के बजट से 14 करोड़ रुपये दिए गए। जबकि फिल्म की प्रोडक्शन क्वालिटी को देखकर नहीं लगता कि इस पर 4-5 करोड़ से अधिक खर्च आया होगा। फिल्म के प्रोमोशन पर 8 करोड़ रुपये का बजट दिया गया। जबकि इस पर ज्यादा से ज्यादा 2 करोड़ का खर्च बताया जा रहा है। जिस समय संसद का मॉनसून सत्र चल रहा है उस वक्त सीईओ सप्पल राज्यसभा टीवी की पूरी टीम को लेकर फिल्म का प्रोमोशन करने के लिए मुंबई चले गए। इनमें एडमिन हेड चेतन दत्ता, हिंदी टीम के प्रमुख राजेश बादल, इंग्लिश टीम के हेड अनिल नायर, टेक्निकल हेड विनोद कौल, आउटपुट हेड अमृता राय (दिग्विजय की पत्नी), इनपुट हेड संजय कुमार समेत एडिटोरियल टीम के कम से कम 20 सदस्य शामिल थे। फिल्म के प्रोमोशन के नाम पर इन सभी ने करीब एक महीने तक पूरे देश में सैर-सपाटा किया। राज्यसभा टीवी के इस घोटाले पर न्यूज़लूज पर हम पिछले कुछ समय से रिपोर्ट्स पोस्ट कर रहे हैं। इनमें से एक को आप नीचे पढ़ सकते हैं:

संबंधित रिपोर्ट: राज्यसभा अब कानून नहीं, फिल्में बनाती है!

इस फिल्म में दिग्विजय सिंह की पत्नी अमृता राय ने भी एक्टिंग की है।

संबंधित रिपोर्ट: जनता के पैसे पर हीरोइन बन गईं दिग्विजय सिंह की पत्नी

राज्यसभा टीवी घोटाले से जुड़ी कई और जानकारियां अभी सामने आनी बाकी हैं। चैनल को चलाने में आर्थिक हिसाब-किताब, भर्तियों में घोटाला, तनख्वाह और प्रोफेशनल फीस बांटने में भेदभाव जैसी बातों की पूरी जांच की जरूरत है। ताकि यह पता चल सके कि एक कांग्रेसी की अगुवाई वाली आखिरी संस्था में किस बड़े पैमाने पर जनता की गाढ़ी कमाई को लूटा गया है।

राष्ट्रपति से ज्यादा उपराष्ट्रपति का बजट!

उपराष्ट्रपति भले ही राष्ट्रपति के नीचे का पद है, लेकिन उनका बजट राष्ट्रपति से कहीं अधिक होता है। अगर इस साल के बजट को देखें तो राष्ट्रपति के लिए जहां 66 करोड़ रुपए आवंटित किए गए, वहीं उपराष्ट्रपति के लिए 377.21 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया। यानी करीब-करीब छह गुने से भी ज्यादा। उपराष्ट्रपति राज्यसभा का सभापति होता है। उसका अपना सचिवालय होता है, जिसमें 1500 से ज्यादा अधिकारी और कर्मचारी होते हैं। इसके अलावा राज्यसभा टीवी का मुखिया भी उपराष्ट्रपति ही होता है।

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