देखिए अमित शाह की संपत्ति पर मीडिया का महाझूठ

सोनिया गांधी के पालतू पत्रकार किस तरह से काम करते हैं इसकी मिसाल ये खबर है। कई न्यूज वेबसाइटों के जरिए शनिवार सुबह से खबर फैलाई गई कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की संपत्ति पिछले 5 साल में 300 गुना बढ़ गई है। टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के अखबारों से शुरुआत हुई और थोड़ी ही देर में पूरी मोदी विरोधी मीडिया ने इस खबर को हाथोंहाथ ले लिया। ऐसा जताया गया कि 2012 से अब तक अमित शाह तीनगुने अमीर हो गए, इसका मतलब उन्होंने अवैध तरीके से पैसा बनाया है। क्योंकि वो ऐसा कोई कारोबार भी नहीं करते, जिससे इतनी जबर्दस्त आमदनी हो जाए। दरअसल राज्यसभा के लिए पर्चा भरते वक्त अमित शाह ने ये जानकारी खुद ही अपने हलफनामे में दी है। लेकिन सच्चाई वो नहीं है जो बताई जा रही है।

कांग्रेस के पालतू पत्रकारों का खेल!

पिछले कुछ समय में हमने देखा है कि किस तरह से सोनिया गांधी और कांग्रेस के लिफाफों पर पलने वाले दलाल पत्रकारों की एक पूरी जमात झूठी खबरें फैलाकर सरकार को बदनाम करने की फिराक में रहती है। यह खबर भी इसी कोशिश की एक मिसाल है। सच्चाई यह है कि अमित शाह की निजी संपत्ति में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है। दरअसल उनकी पारिवारिक संपत्ति इस साल ट्रांसफर हुई है। अमित शाह की पारिवारिक संपत्ति उनकी मां के नाम पर थी, जिनका 2010 में निधन हो गया था। 2012 में उनकी संपत्तियों को बेटे अमित शाह के नाम ट्रांसफर करने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। 2012 में जब अमित शाह ने गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए पर्चा भरा था तो प्रॉपर्टी ट्रांसफर की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी। लिहाजा उन्होंने सिर्फ वो संपत्ति बताई जो उन्होंने कमाई थी। इसके बाद अब 2017 में उन्होंने राज्यसभा के लिए पर्चा भरा तो दोबारा अपनी संपत्ति का हलफनामा दिया। अब मां की संपत्ति भी उनके नाम पर ट्रांसफर हो चुकी है, लिहाजा इसमें भारी बढ़ोतरी दिखाई दे रही है। जबकि सच्चाई ये है कि अमित शाह की संपत्ति लगभग उतनी ही है जितनी 2012 में थी। इस खबर को छापने वाले अखबारों ने बड़ी चालाकी से इस बात का कहीं भी जिक्र नहीं किया, ताकि लगे कि अमित शाह ने ये रकम किसी अवैध तरीके से कमाई है।

खबर को लेकर अफवाह भी फैलाई

टाइम्स ऑफ इंडिया समेत कुछ न्यूज वेबसाइटों पर जब यह रिपोर्ट पब्लिश हुई तो कई लोगों ने इस बात की तरफ ध्यान दिलाया कि जिस संपत्ति को अमित शाह की बताया जा रहा है वो उनकी पैतृक संपत्ति है। कानून इसका जिक्र हलफनामे में करना होता है। जब अखबारों को गलती का एहसास हुआ तो उन्होंने फौरन रिपोर्ट को वेबसाइट से हटा दिया। इसके बाद कांग्रेसी पत्रकारों ने इसे मीडिया की आजादी पर हमले का मामला बना दिया और ऐसा जताया मानो टाइम्स ऑफ इंडिया और डीएनए जैसे अखबारों को अमित शाह के दबाव में ये खबर हटानी पड़ी हो। जबकि सच्चाई यह नहीं है। अब इन अखबारों की खबरों की इमेज लेकर उसे सोशल मीडिया के जरिए फैलाया जा रहा है। जबकि यह अखबारों की सरासर गलती थी कि उन्होंने बिना इस तकनीकी पहलू को बताए हुए अमित शाह जैसे बड़े नेता को लेकर अफवाह फैलाने की कोशिश की।

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