अब तक 100… कश्मीर में सेना ने बनाया नया ‘रिकॉर्ड’

कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ जंग में सेना ने अपना शतक पूरा कर लिया है। इस साल यहां मारे जाने वाले आतंकवादियों की संख्या 100 के पार पहुंच गई है। पिछले कुछ सालों के रिकॉर्ड को देखते हुए इसे बेहतरीन प्रदर्शन माना जा रहा है। हालांकि इस दौरान सेना और सुरक्षाबलों के 87 जवान भी शहीद हुए हैं। इनमें सबसे ज्यादा संख्या उरी में हुए हमले की है, जहां 20 जवानों की जान गई थी। एनकाउंटर के आंकड़ों पर नजर डालें तो नए आर्मी चीफ जनरल बिपिन रावत के आने के बाद आतंकवादियों के मारे जाने की दर में भारी तेजी आई है। जनरल रावत को कश्मीर में काउंटर-टेरर ऑपरेशन का स्पेशलिस्ट माना जाता रहा है। ये सारे आंकड़े 11 जुलाई की सुबह तक के हैं। इस साल अप्रैल तक एनकाउंटर में मारे गए आतंकवादियों की संख्या सिर्फ 42 थी, लेकिन तब से जुलाई तक इसमें भारी उछाल आया और जुलाई आते-आते शतक पूरा हो गया। मई में 17 और जून में 30 आतंकवादी मार गिराए गए। जबकि 11 जुलाई तक 11 और आतंकी मारे गए।

जनरल रावत ने बदली रणनीति

अखबार मेल टुडे ने सेना के सूत्रों के हवाले से बताया है कि कार्यभार संभालने के बाद अपने कमांडरों से पहली मीटिंग में ही जनरल बिपिन रावत ने साफ कहा था कि वो आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में रक्षात्मक रहने के बजाय आक्रामक रणनीति अपनाएं। अब तक सारा जोर अपनी सुरक्षा पर होता था और आतंकवादी सेना के ठिकानों तक आकर हमला करते थे। लेकिन अब सेना आतंकवादियों के ठिकानों तक पहुंचकर एनकाउंटर कर रही है। पहले भी ऐसे एनकाउंटर होते थे। लेकिन अब इनकी संख्या कई गुना बढ़ गई है। यहां तक कि सेना ने कश्मीर के कुछ इलाकों में घर-घर पर दस्तक देकर तलाशी ली है। एलओसी पर सेना तब गोलीबारी की शुरुआत कर देती है, जब उसे लगता है कि उस पार आतंकवादियों की कोई जमघट हुई है।

आपसी तालमेल पर सारा जोर

अब तक कश्मीर में सेना, अर्धसैनिक बलों और पुलिस के काम में कोई तालमेल नहीं था। अक्सर आतंकवादी इसका फायदा उठाकर वारदात को अंजाम देते थे। लेकिन अब आतंकवाद से लड़ रही सभी एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल के लिए सिस्टम तैयार किया गया है। उदाहरण के तौर पर किसी इलाके में सेना की ड्यूटी चेंज हो रही हो तो उस दौरान अर्धसैनिक बलों या पुलिस की ड्यूटी जारी रहती है। तीनों तरह की एजेंसियां एक-दूसरे को अपनी गतिविधियों के बारे में नियमित जानकारी देती रहती हैं। इस कोऑर्डिनेशन के कारण आतंकवादी संगठनों में भारी दहशत है। ज्यादातर अपने खुफिया ठिकानों तक सीमित रह गए हैं। आतंकी हमलों की संख्या भी पहले से कम हुई है। इस दौरान भारतीय सेना और सशस्त्र बलों को लेकर तरह-तरह के ऐसे बयान दिए गए और खबरें भी फैलाई गईं, जिससे सेना का मनोबल कमजोर होता हो।

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