जानिए मोदी की इज़रायल यात्रा से खलबली क्यों है?

ये धर्म के गुलाम कब सुधरेंगे? कुछ कट्टरपंथी इस देश की विदेश नीति में अपने धर्म को घुसा रहे हैं। औवेसी जैसे लोग मोदी की इज़राइल यात्रा का विरोध कर रहे हैं। इन्हें इस बात से भी दिक्कत है कि मोदी तेल अवीव तो जा रहे हैं लेकिन फिलीस्तीन के रमल्लाह क्यों नहीं जा रहे हैं। क्यों भाई? क्या ये कोई टूर पैकेज है, बैंकॉक जा रहे हो तो पटाया और फुकेट भी जाओ? अगर आप सोच रहे हैं कि ऐसे लोग कूटनीति की समझ होने की वजह से ऐसा कह रहे हैं तो आप गलत हैं… दरअसल इसके पीछे वजह है इस्लाम और यहूदियों के बीच हुए संघर्ष का 800 साल पुराना इतिहास… सारी दुनिया के मुसलमान सबसे ज्यादा नफरत यहूदियों से करते हैं। भाई लोगों, अगर आपके धर्म का किसी और धर्म से नफरत का रिश्ता है तो इस पचड़े में भारत की विदेश नीति क्यों प्रभावित हो? भाइयों अगर आपके धर्म का यहूदी धर्म से पंगा है वो भी विदेशी धरती के टुकड़े को लेकर तो इससे भारत की विदेश नीति का क्या लेना-देना?

कट्टरपंथी तय करेंगे विदेश नीति?

क्या अब आपके धर्म की सहूलियत और मान्यताओं के आधार पर देश की विदेश नीति बनेगी? कट्टरपंथियों की इसी सोच और उनके वोट बैंक के दवाब की वजह से 1992 तक भारत की पूर्व सरकारों ने इज़रायल के साथ राजनयिक संबंध तक नहीं रखे। याद कीजिए अपना बचपन अस्सी के दशक में आप अक्सर दूरदर्शन पर फलस्तीन के नेता यासेर अराफात को राजीव गांधी के गाल चूमते हुए देखते होंगे। किसी से प्यार से मिलने का अराफात का यही तरीका था। हालांकि मैं यासेर अराफात को लेकर न्यूट्रल सोच रखता हूं लेकिन दुनिया का इतिहास ये बताता है कि उन्होंने फतह नाम से एक ऐसे संगठन की स्थापना की थी जिसे दुनिया का पहला आतंकी संगठन माना जा सकता है। यासेर अराफात का नाम दुनिया की कई खूनी घटनाओं में आया। दुनिया भर में विमानों के अपहरण का आइडिया आतंकियों को यासेर अराफात ने ही दिया था। फिदायीन वाला आइडिया भी कहते हैं अराफात की दी हुई आफत है। कुल मिलाकर आज दुनिया भर के लिए नासूर बन चुका इस्लामी आतंकवाद यासेर अराफत के दिमाग की ही पैदाइश है। इसी अराफात, उनके फलस्तीन और सबसे बढ़कर मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति ने हमें फायदे वाली इजरायली दोस्ती से दूर रखा।

जिससे दुश्मनी, उसी से हथियार!

1992 में नरसिंह राव सरकार ने इसलिए संबंधों की शुरुआत की क्योंकि उस दौर में अरब देशों के साथ इज़रायल के रिश्ते कुछ समय के लिए सुधरने लगे थे। यानी जब ‘अरब के मालिक’ मान गए तो यहां रहने वाले उनके ‘मानसिक गुलाम’ भी मान गए। इन दिनों जब एक बार फिर ‘अरब के मालिक’ इज़राइल से खार खाये बैठे हैं तो यहां बैठे ‘अरब के धार्मिक गुलाम’ मोदी की इज़राइल यात्रा का विरोध करने में जुट गए। लेकिन अरब के इन ‘धार्मिक गुलामों’ को ये नहीं पता है कि जब इस्लामी देशों के बीच सैनिक संघर्ष होता है तब इस्लामी देश चोरी-छिपे इज़रायल से ही हथियार मंगवाते हैं। इस बारे में ईरान का मामला सबसे दिलचस्प है। ईरान के पूर्व शासक अयातुल्ला खुमैनी के समय इराक और ईरान के बीच आठ साल तक युद्ध चला। अयातुल्लाह एक ओर तो इस्रायल को ‘छोटा शैतान’ और अमरीका को ‘बड़ा शैतान’ कहते थे, लेकिन इराक का सामना करने के लिए वे चोरी-छिपे इज़रायल से ही हथियार खरीदते थे। खैर मुद्दे की बात ये है औवेसी भाई कि देश की राजनीति में तो धर्म घुस ही गया है, कम से कम देश की विदेश नीति को धर्म से दूर रखो।

(वरिष्ठ पत्रकार प्रखर श्रीवास्तव के फेसबुक पेज से साभार)

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