पाकिस्तान की जीत का लड्डू न खाता तो मारा जाता!

चैंपियंस ट्रॉफी के फाइनल में पाकिस्तान की जीत के बाद जश्न की ये तस्वीरें श्रीनगर की हैं।

हत्यारी भीड़ का उन्माद क्या होता है, मैंने खुद देखा है, सिर्फ 13 साल की उम्र में। 25 अक्टूबर 1991 के दिन। यानी तब तक बाबरी ढांचा भी नहीं गिरा था। 3 दिन बाद मेरा जन्मदिन था, इसीलिए अपने लिए नए कपड़े लेने पुराने भोपाल गया था। पुराना भोपाल मुस्लिम बहुल इलाका है। मैं दुकान में था और शारजाह में मैच चल रहा था, दुकान में टीवी चल रहा था। आकिब जावेद ने रवि शास्त्री को एलबीडब्लू आउट किया, दुकान के आसपास शोर होने लगा। अगली गेंद… अज़हर को भी आकिब ने एलबीडब्लू कर दिया… दुकान के आसपास शोर और तेज़ हो गया… लोग खुशी में ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगे… शारजाह के स्टेडियम में भी शोर था और भोपाल के इस बाजार में भी।

इसी शोर के बीच सचिन तेंदुलकर पिच पर आया। आकिब जावेद ने बॉल फेंकी और सचिन भी एलबीडब्लू आउट होकर पैवेलियन लौट गया। आकिब जावेद की हैट्रिक और उस मैच में भारत की हार तय। दुकान के आसपास आसमान शोर से गूंजने लगा। 100-150 लोगों की उन्मादी भीड़ ने “पाकिस्तान जिंदाबाद” के नारे लगाने शुरू कर दिए। एक लड़का आया और मिठाई बांटने लगा। उसने लड्डू मुझे भी दिया। अगर उस मिठाई को मैं फेंक देता तो शायद वो भीड़ मुझे कुचल देती। तब मैं सिर्फ 13-14 साल का था, चुपचाप और उदास सोचता रहा कि भारत देश ने इस भीड़ का क्या बिगाड़ा है? ये लोग तो आखिर यहीं के रहने वाले हैं।

तब तो नरेंद्र मोदी भी प्रधानमंत्री नही बने थे। तब सताए जाने का कोई बहाना भी नहीं था। तीन दिन बाद मेरा बर्थडे था, लेकिन मैं उस दिन भी बहुत उदास था। इसलिए नहीं कि आकिब जावेद ने हैटट्रिक ली थी बल्कि इसलिए क्योंकि वो “पाकिस्तान जिंदाबाद” का शोर मेरे कानों में गूंज रहा था… आज मैं सोचता हूं क्या बदला 25 साल में? बस भीड़ का धर्म बदल गया। पहले वो ऐसे थे और आज हम ऐसे हो गए। मैं 25 साल बाद इस घटना को इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि भीड़ का मनोविज्ञान समझने के लिए वाकई निष्पक्ष होना पड़ेगा। मैं बार-बार कह रहा हूँ कि “सेकुलर” होने से काम नहीं चलेगा।

(वरिष्ठ पत्रकार प्रखर श्रीवास्तव का लेख, उनके फेसबुक पेज से साभार। ऐसे वक्त में जब भीड़ के हाथों हत्या के कुछ मामलों के आधार पर पूरे हिंदू धर्म को बदनाम करने की साजिश रची जा रही है, ये अनुभव उस सच्चाई को बयान कर रहा है जो आज भी हमारे बीच मौजूद है। चैंपियंस ट्रॉफी मैच के दिन भी देश के कई इलाकों में आतिशबाजी हुई और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगे। सवाल ये है कि उस भीड़ को बेनकाब क्यों नहीं किया जा रहा है।)

कृपया लेख कॉपी-पेस्ट न करें। कई लोग पोस्ट कॉपी करके फेसबुक और व्हाट्सएप पर शेयर कर देते हैं, जिससे वेबसाइट की आमदनी काफी कम हो गई है। राष्ट्रवाद की विचारधारा पर आधारित यह वेबसाइट बंद हो जाएगी तो क्या आपको खुशी होगी? कृपया खबरों का लिंक शेयर करें।
एक अपील: न्यूज़लूज़ के जरिए हम राष्ट्रवादी पत्रकारिता को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। इस वेबसाइट पर होने वाला खर्च बहुत ज्यादा है और हमारी आमदनी काफी कम। हम अपने काम को जारी रख सकें इसके लिए हमें आर्थिक मदद की जरूरत है। ये हमारे लिए ऑक्सीजन का काम करेगी। डोनेट करने के लिए क्लिक करें:

comments

Tags: , , ,