अब वामपंथ के ‘तीसरे किले’ पर है बीजेपी की नज़र

बंगाल और केरल से पहले क्या लेफ्ट के तीसरे गढ़ यानी त्रिपुरा पर बीजेपी की जीत के आसार हैं? अगले साल की शुरुआत में त्रिपुरा विधानसभा के लिए चुनाव होने हैं। यह सवाल उठ रहा है कि क्या वाकई बीजेपी पहली बार त्रिपुरा में असम और मणिपुर जैसे पड़ोसी राज्यों वाला चमत्कार दिखा पाएगी। त्रिपुरा में 24 साल से वामपंथी सरकार है। 1993 में यहां लेफ्ट फ्रंट सत्ता में आया था। मौजूदा सीएम माणिक सरकार का ये चौथा कार्यकाल है। लेफ्ट पार्टियों की मजबूती इसी से समझी जा सकती है कि 60 सदस्यों वाली विधानसभा में अभी उनके 51 विधायक हैं। 6 विधायक तृणमूल कांग्रेस के हैं लेकिन वो अपनी ही पार्टी से नाराज हैं और उनके बहुत जल्द बीजेपी में शामिल होने के आसार हैं।

बीजेपी का तेज़ी से उभार

2014 के बाद से त्रिपुरा में बीजेपी के संगठन में मजबूती आई है। राज्य में मौजूद विपक्षी पार्टियों त्रृणमूल और कांग्रेस के कमजोर होने का बीजेपी को सीधा फायदा हुआ है। पिछले कुछ महीने में दोनों ही पार्टियों के कई बड़े नेता बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। मुख्य विपक्षी तृणमूल कांग्रेस के 6 विधायक हैं। ये सभी कांग्रेस से पाला बदलकर टीएमसी में आए थे। ऐसी खबरें हैं कि ये सारे विधायक एक बार फिर पाला बदलकर बीजेपी में आने वाले हैं। सूत्रों के मुताबिक इसका औपचारिक एलान अगले कुछ हफ्तों में हो सकता है। ये विधायक चाहते हैं कि उनकी पार्टी टीएमसी विधानसभा चुनाव में बीजेपी को समर्थन दे। विधानसभा में विपक्ष के नेता सुदीप रॉय बर्मन ने कुछ दिन पहले बयान दिया था कि अगर त्रृणमूल कांग्रेस ने बीजेपी से हाथ नहीं मिलाया तो हम अपने हिसाब से फैसला करने को मजबूर होंगे।

क्यों मुश्किल में है वामपंथ

24 साल के लेफ्ट के शासन के दौरान त्रिपुरा की स्थिति बेहद खराब है। आज इसकी गिनती उत्तर-पूर्व के सबसे पिछड़े राज्यों में होती है। सड़क, बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं खस्ताहाल हैं। ऐसे में लोगों में लेफ्ट सरकार के लिए भारी नाराजगी है। ऐसे वक्त में बीजेपी ने ‘लेफ्ट मुक्त त्रिपुरा’ का नारा दिया है। विकास के तमाम मानकों पर त्रिपुरा देश के सबसे फिसड्डी राज्यों में से है। बीजेपी इन तमाम मुद्दों को जोर-शोर से उछाल रही है। त्रिपुरा में पीएम नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता भी लेफ्ट के लिए मुश्किल का सबब है। खास तौर पर उज्ज्वला और बैंक अकाउंट खोलने जैसी योजनाओं के कारण नरेंद्र मोदी यहां लेफ्ट के तमाम लोकल नेताओं से ज्यादा बड़े नेता बनकर उभरे हैं। उन्होंने राज्य के मामलों में सीधे तौर पर दिलचस्पी भी दिखाई है।

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तीन साल में बदली तस्वीर

2014 लोकसभा चुनाव से पहले त्रिपुरा में बीजेपी के कुल सदस्यों की संख्या 15 हजार के करीब थी, लेकिन 2016 के आखिर तक ये बढ़कर 2 लाख हो गई। पिछले 4-5 महीने में इसके दोगुना होने का अनुमान है। शहरी इलाकों में भारतीय जनता पार्टी तेजी से फैली है, लेकिन गांवों में संगठन का असर अभी कम ही दिखता है। अब यह बीजेपी के स्थानीय नेताओं पर निर्भर करता है कि अगर वो बाकी बचे समय में संगठन को दूर-दराज के इलाके तक ले जाने में कामयाब रहे तो वो पहली बार राज्य में सत्ता की दौड़ में होगी।

माणिक सरकार से दिक्कत

त्रिपुरा सरकार की चाहे जितनी भी आलोचना होती और उसे नाकाम माना जाता हो, लेकिन राज्य के मुख्यमंत्री माणिक सरकार को निजी तौर पर लोग बहुत ईमानदार मानते हैं। इतने सालों में उनकी लोकप्रियता बरकरार है। देश के ‘सबसे गरीब मुख्यमंत्री’ की इमेज का भी माणिक सरकार को भरपूर फायदा मिलता है। उन्हें राज्य में नक्सलवाद के खात्मे का श्रेय भी दिया जाता है। जिसके कारण त्रिपुरा में AFSPA हटाया गया। पिछले कुछ वक्त से बीजेपी यहां माणिक सरकार के कार्यकाल के भ्रष्टाचार पर जोरदार हमले बोलती रही है। उदाहरण के तौर पर नीचे का ये वीडियो त्रिपुरा बीजेपी के नेता सुनील देवधर ने इस साल फरवरी में रिलीज किया था। ऐसे अभियानों का राज्य के लोगों पर अच्छा खासा असर देखने को मिला है।

बीजेपी के आगे बड़ी चुनौती

माणिक सरकार की निजी लोकप्रियता के मुकाबले भाजपा के पास कोई स्थानीय नेता नहीं है। ऐसे में सबकी नजर इस बात पर है कि चुनाव आते-आते अमित शाह किसे मुख्यमंत्री पद के चेहरे के तौर पर आगे करेंगे। अगर वो इस दौरान माणिक सरकार के विकल्प के तौर पर कोई उतना ही भरोसेमंद नाम ढूंढने में कामयाब हो जाते हैं तो लेफ्ट फ्रंट के लिए अगले साल फरवरी में होने वाला चुनाव वाकई मुश्किलों भरा साबित हो सकता है।

हिंदुओं का महत्वपूर्ण स्थान

उत्तर पूर्वी भारत में त्रिपुरा ही है जो अभी तक ईसाई मिशनरियों और इस्लामी असर से बचा हुआ है। यहां 84 फीसदी हिंदू हैं। लेकिन बीते कुछ सालों में धर्म परिवर्तन और आबादी बढ़ाने जैसे मामले भी सामने आते रहे हैं। त्रिपुरा का नाम यहां की देवी त्रिपुर सुंदरी के नाम पर पड़ा था। ये हिंदू धर्म के 51 शक्तिपीठों में से एक है। त्रिपुरा का उल्लेख महाभारत, पुराणों और अशोक के शिलालेखों में भी मिलता है।

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