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पाकिस्तान को छोड़िए भारत की रेस चीन के साथ है!

जिस देश में ‘समृद्ध’ नेताओं की कमाई सरकारी दलाली पर निर्भर हो, जहाँ नौकरशाह रिश्वतखोर और उद्योगपति टैक्स चोर हों, उस देश के बारे में अगर डोनाल्ड ट्रंप ये कहें कि भारत अरबों डालरों के दान और ग्रांट का भूखा है तो बुरा तो बहुत लगता है। लेकिन ट्रंप की बात गलत नही है। डोनाल्ड ट्रंप मुंहफट हैं, बेधड़क हैं, इसलिए किसी अबूझ या कुभाषी की तरह अक्सर नंगा सच बोल जाते हैं। उन्होंने पेरिस की पर्यावरण संधि के बारे में कहा कि भारत को विकसित देशों से सिर्फ अरबों-खरबों की ग्रांट चाहिए। भले ही भारत अपने यहाँ प्रदूषण कम करे या ना करे लेकिन खरबों डॉलर की ग्रांट पर उसकी निगाह है। ट्रंप के इस भारत विरोधी बयान की निंदा होनी चाहिए लेकिन इस ग्रांट का बड़ा हिस्सा लूटने वाले नेता, नौकरशाहों और उद्योगपतियों पर हम पर्दा क्यूँ डालें?

महाशक्ति बनने का सपना देखने वाला ये देश आखिर कब तक अंतरराष्ट्रीय सहायता और दान के लिए हाथ पसारेगा? क्या यही 1.30 अरब भारतीयों का स्वाभिमान है? क्या यही हमारी गैरत और आबरू है? क्या देश को 2.60 अरब हाथ दुनिया से दान और भीख मांगने के लिए दिए गये हैं? हमारे बराबर या हमसे कुछ ही ज्यादा जनसंख्या वाला चीन है, जो तीन दशक पहले अर्थव्यवस्था में हमसे पीछे था लेकिन आज वो दुनिया के आगे हाथ नही फैलाता है। आज हमारा पड़ोसी चीन, अफ्रीका और कईं कमज़ोर एशियाई देशों का पेट पाल रहा है। और एक हम हैं… जो हमेशा दरिद्र पाकिस्तान को अपनी विदेश नीति के केंद्र में रखते हैं। कश्मीर हो आतंकवाद हो, नक्सल समस्या हो… पाकिस्तान सर्वविदित है। इधर घरेलू मामलों में हमारी राजनीति या यूँ कहें कि हर नीति, मुस्लिम, ओबीसी और दलित वोटबैंक पर केंद्रित रहती है। नौकरी हो, सब्सिडी हो, कोई आयोग हो या बड़ा निर्णय हो, पिछड़े, दलित, मुस्लिम हम नहीं भूलते। क्योंकि ये वोट की राजनीति में निर्णायक है। शायद यही वजह है कि हमारी सरकारें पाकिस्तान और वोट बैंक के जाल से कभी आगे बढ़कर इस देश को किसी बहुत ऊंचे लक्ष्य तक नही ले जा सकीं।

हमने अर्थ क्रांति को कभी देश के अजेंडे पर सबसे ऊपर रखा ही नहीं। हमने औद्योगिक उत्पादन को राष्ट्रीय लक्ष्य कभी माना नहीं। हम 21वी शताब्दी में भी खुले में शौच करने वाले लोगों को गली-गली, गांव-गांव ढूंढ रहे हैं। महानायक अमिताभ बच्चन देश के बच्चों से कह रहे हैं कि लोटा लेकर चलने वालों को ढूंढो। गांव-गांव ढूंढो। ये अलग बात है कि आज हमे ढूंढना तो नए जमशेदजी टाटा, घनश्याम दास बिरला या जमना लाल बजाज को है। लेकिन हम ढूंढ किसी और को रहे हैं। हमें ढूंढना तो उन युक्ति और निर्माण पुरुषों को है जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य से लोहा लेकर ब्रिटिश मिलों को पानी पिला दिया था। हमें ढूंढना तो उन्हें है जिन्होंने 100 बरस पहले देश में स्वदेशी कारखानों के नए मंदिर निर्माण किये थे।

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