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कौन थे मनु… जिनके मनुवाद को दिनभर गरियाते हो?

मनु राजा थे। क्षत्रिय थे। मनुस्मृति भी उन्होंने ही लिखी। लेकिन जहर से भरे कुछ लोग मनुवाद के नाम पर ब्राह्मणों को गरियाते हैं। जानते हैं क्यों? इसलिए कि ब्राह्मण सहिष्णु होता है, सौहार्द्र में यकीन करता है। गाली-गलौज में यकीन नहीं करता। अप्रिय भी बर्दाश्त कर लेता है। करता ही है। ये जातिवादी लोग अगर क्षत्रिय को मनुवादी कह कर गरियाएंगे तो क्षत्रिय कभी बर्दाश्त नहीं करेगा। गिरा कर मारेगा। सो इन जहरीले जातिवादियों के लिए ब्राह्मण एक बड़ी सुविधा है अपने नपुंसक विचारों को डायलूट करने के लिए। अब कुछ मूर्ख कहेंगे कि मैं तो बड़ा जातिवादी हूं, कैसा लेखक हूं?

दरअसल ये लोग जो लगातार ब्राह्मणों को गरियाने का शगल बनाए हुए हैं, यह सब करके बड़ी-बड़ी दुकान खोलकर समाज में क्या संदेश दे रहे हैं? आप उनको क्या मानते हैं? कभी सांस भी लेना जुर्म क्यों समझते हैं उनके जहरीले बोल के खिलाफ? इतने नादान और बेजान क्यों हैं आख़िर आप? दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है, इस घोर वैज्ञानिक युग में भी यह मूर्ख ब्राह्मण-ब्राह्मण के पहाड़े से आगे निकलना ही नहीं चाहते। अजब है यह भी। अच्छा कोई मुझे यह भी तो बता दे कि आज की तारीख़ में कौन समाज है जो मनुस्मृति से भी चलता है? मनुस्मृति की ज़रूरत भी किसे है अब? सिवाय इन गाली-गलौज वालों के? यह विज्ञान, यह संविधान, यह क़ानून अब समाज चलाते हैं, मनुस्मृति नहीं।

क्या यह बात भी लोग नहीं जानते? अच्छा कुछ लोग जान दिए जाते हैं इस बात पर कि दलितों को मंदिर में घुसने नहीं दिया जाता? अच्छा आप जो मनुवाद के इतने खिलाफ हैं तो मंदिर जाते भी क्यों हैं? दूसरे ज़रा यह भी तो बता दीजिए कि किस मंदिर में आपको नहीं घुसने दिया गया? किस मंदिर में घुसते समय आपसे पूछा जाता है कि आप किस जाति से हैं? किस मंदिर में यह पूछने का समय है? और डॉक्टर ने कहा है कि आप अपने कामकाज में ब्राह्मण बुलाइए? कि संविधान में लिखा है? कौन सी कानूनी बाध्यता है आख़िर? क्यों बुलाते हैं आप? मत बुलाइये, अपना काम जैसे मन वैसे कीजिए लेकिन आंख में धूल झोंकना बंद कीजिए।

अच्छा डॉक्टर ने कहा है या किसी क़ानून ने कि शादी में या मरने में भी पंडित को बुलाना जरूरी है? बैंडवाला, कैटरिंग वाला या और भी तमाम जोड़ लीजिए अपनी हैसियत से तो पंडित से ज़्यादा पैसा लेते हैं, लेकिन वहां प्राण नहीं निकलता? अच्छा जब जमादार बुलाते हैं मरने में ही सही, तो क्या उसे उसकी मजदूरी नहीं देते? श्मशान के डोम को पैसा नहीं देते कि लकड़ी वाले या कफन वाले या वाहन वाले को पैसा नहीं देते? इलेक्ट्रिक शवदाह गृह की फीस भी नहीं देते? कि डॉक्टर को फीस नहीं देते? वकील को नहीं देते? तो पंडित को देने में प्राण निकलते हैं? मत बुलाइए पंडित को! क्यों बुलाते हैं पंडित? पंडित की गरज से? कि अपनी गरज से? मनुस्मृति या कर्मकांड में इतना जीते क्यों हैं, बाध्यता क्या है? फिर घड़ियाली आंसू भी बहाते हैं। गोली मारिए मनुस्मृति को, मत मानिए मनुस्मृति और कर्म कांड को? यह डबल गेम कब तक? यह दोगला जीवन कब तक और क्यों? किसके लिए? बंद कीजिए यह व्यर्थ का रोना-धोना और लोगों को गुमराह करना, समाज में जहर घोलना, समाज तोड़ना!

(वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय के फेसबुक पेज से साभार)

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